यूएनएचआरसी को भारत की दो टूक- साख बचानी है तो छोड़े दोहरा रवैया, मानवाधिकार के नाम पर राजनीति बंद करे
संयुक्त राष्ट्र में भारत ने UNHRC को दोहरे मापदंड छोड़ने और मानवाधिकारों के नाम पर राजनीति बंद करने की नसीहत दी। भारत ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और निष्पक्ष समीक्षा की मांग की।

उन्होंने कहा कि किसी देश को बातचीत और सहयोग की प्रक्रिया में शामिल किए बिना उसके खिलाफ विशेष आदेश जारी करने से जमीनी स्तर पर सुधार नहीं होता। इससे परिषद के भीतर मतभेद बढ़ते हैं और उसकी साख कमजोर होती है।
बातचीत और सहयोग से ही सुरक्षित होंगे मानवाधिकार
भाविका मंगलानंदन ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के फरवरी में दिए गए बयान का भी उल्लेख किया। जयशंकर ने मानवाधिकार परिषद के 61वें उच्चस्तरीय सत्र में कहा था कि मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए संवाद, क्षमता निर्माण और वास्तविक साझेदारी सबसे प्रभावी तरीके हैं।
भारत का कहना है कि मानवाधिकारों के मुद्दे पर राजनीतिक लाभ उठाने या चुनिंदा देशों पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। परिषद को ऐसी कार्यप्रणाली अपनानी चाहिए, जिससे सभी सदस्य देशों का भरोसा बना रहे।
सभी देशों के लिए समान समीक्षा व्यवस्था की वकालत
भारत ने यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू (UPR) को मानवाधिकारों की समीक्षा के लिए प्रभावी मंच बताया। इस व्यवस्था के तहत संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समीक्षा की जाती है। इसमें किसी देश को अलग दर्जा दिए बिना समान आधार पर चर्चा और सुधार की सिफारिश की जाती है।
भारत 2026-28 के कार्यकाल के लिए सातवीं बार मानवाधिकार परिषद का सदस्य बना है। ऐसे में परिषद की कार्यप्रणाली में निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर भारत ने अपना रुख स्पष्ट किया।
आतंकवाद को मानवाधिकारों के लिए गंभीर खतरा बताया
भारत ने आतंकवाद को मानवाधिकारों के सामने मौजूद सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक करार दिया। खासतौर पर जीवन के अधिकार पर इसके खतरे को रेखांकित करते हुए परिषद से आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की अपील की गई।
विकास के अधिकार को भी मिले बराबर प्राथमिकता
भारत ने कहा कि नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को भी समान महत्व मिलना चाहिए। विकास का अधिकार भी मानवाधिकारों का अहम हिस्सा है। गरीबी, बढ़ता कर्ज और संसाधनों तथा आधुनिक तकनीक तक सीमित पहुंच विकासशील देशों में लोगों के अधिकारों के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं।
पारदर्शिता और पर्याप्त बजट की मांग
भारत ने परिषद के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने और सुधार प्रक्रिया को सदस्य देशों के नेतृत्व में आगे बढ़ाने की मांग की। साथ ही कहा कि मानवाधिकारों से जुड़े कार्यक्रमों के लिए संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट से पर्याप्त धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। परिषद की प्राथमिकताएं कुछ देशों या संगठनों के स्वैच्छिक वित्तपोषण पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।


