लुटनिक के बयान पर भारत का जवाब - मोदी-ट्रंप ने 2025 में 8 बार बात की; तो व्यापार समझौता क्यों अटका?
भारत का कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर गंभीर, निरंतर और सार्थक बातचीत हुई है और कई मौकों पर सहमति बेहद करीब पहुंची थी। ऐसे में यह कहना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक फोन कॉल न करने की वजह से समझौता नहीं हो सका, वास्तविकता से परे है।

वार्ताओं की जानकारी रखने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, जून 2025 के बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हुई लगभग हर टेलीफोन वार्ता में द्विपक्षीय व्यापार समझौता प्रमुख एजेंडा रहा है। एक अधिकारी के अनुसार, “दोनों नेता व्यापार, निवेश, टैरिफ, आपूर्ति श्रृंखला और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करते रहे हैं। यह कहना कि इस विषय पर संवाद नहीं हुआ या भारत की ओर से रुचि नहीं दिखाई गई, पूरी तरह गलत है।” यह भी बताया गया कि बातचीत केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं थी, बल्कि दोनों देशों के वाणिज्य विभागों, व्यापार प्रतिनिधियों और तकनीकी टीमों के बीच भी कई दौर की चर्चा हुई।
लुटनिक ने अपने बयान में यह भी कहा कि भारत के साथ व्यापार समझौता ब्रिटेन के बाद और इंडोनेशिया व मलेशिया से पहले होना था। उनके मुताबिक, ब्रिटेन के साथ मई 2025 में और इंडोनेशिया-मलेशिया के साथ अक्टूबर 2025 में समझौते किए गए, जबकि भारत पीछे रह गया। हालांकि, भारतीय पक्ष का कहना है कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते बहुस्तरीय और जटिल होते हैं, जिनमें समयसीमा केवल राजनीतिक इच्छा पर नहीं, बल्कि तकनीकी और आर्थिक संतुलन पर भी निर्भर करती है। भारत का रुख शुरू से यह रहा है कि समझौता जल्दबाजी में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप और उनके सहयोगियों की ओर से समय-समय पर भारत को लेकर दिए जा रहे बयान नई दिल्ली में “अनावश्यक दबाव बनाने की कोशिश” के तौर पर देखे जा रहे हैं। हालांकि, भारत ने इन बयानों का जवाब देते समय कूटनीतिक मर्यादाओं का पूरा ध्यान रखा है। आधिकारिक प्रतिक्रिया में न तो किसी व्यक्तिगत टिप्पणी की गई और न ही सार्वजनिक टकराव का रास्ता चुना गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसमें वह सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय संवाद और बातचीत के जरिए मुद्दों को सुलझाने में विश्वास करता है।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता दोनों देशों के लिए रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। अमेरिका भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए तेजी से उभरता हुआ बाजार है। इस समझौते से टैरिफ में कटौती, निवेश बढ़ाने, तकनीक हस्तांतरण, सप्लाई चेन को मजबूत करने और रोजगार सृजन जैसे कई लाभ मिलने की उम्मीद है। यही वजह है कि पिछले एक साल से इस पर गहन बातचीत चल रही है।
फिलहाल यह व्यापार समझौता ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है, लेकिन भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह अब भी पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौते में रुचि रखता है। विदेश मंत्रालय के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि भारत बातचीत के दरवाजे बंद नहीं कर रहा, बल्कि सही समय और संतुलित शर्तों का इंतजार कर रहा है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि अमेरिका में आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों और ट्रंप प्रशासन की आक्रामक बयानबाजी के बावजूद, भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी इतनी मजबूत है कि व्यापार समझौते पर बातचीत पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
होवार्ड लुटनिक के बयान ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर नई बहस छेड़ दी है, लेकिन तथ्यों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर भारत का पक्ष अधिक संतुलित और ठोस नजर आता है। मोदी-ट्रंप के बीच लगातार संवाद, कई दौर की बातचीत और भारत की स्पष्ट कूटनीतिक प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि समझौते में देरी किसी एक फोन कॉल या असहजता का परिणाम नहीं, बल्कि जटिल वैश्विक व्यापार वार्ताओं की वास्तविकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले महीनों में दोनों देश इस गतिरोध को कैसे सुलझाते हैं और क्या भारत-अमेरिका व्यापार साझेदारी एक नई ऊंचाई तक पहुंच पाती है या नहीं।


