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"गृहिणियां हैं राष्ट्र निर्माता", सड़क हादसों में मुआवजे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाया ऐतिहासिक नियम, ₹30,000 महीना तय की वैल्यू

बिना वेतन वाले घरेलू कामकाज के आर्थिक और सामाजिक महत्व को मान्यता देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को घर संभालने वाली महिलाओं को 'राष्ट्र निर्माता' बताया।

गृहिणियां हैं राष्ट्र निर्माता, सड़क हादसों में मुआवजे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाया ऐतिहासिक नियम, ₹30,000 महीना तय की वैल्यू
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नई दिल्ली। बिना वेतन वाले घरेलू कामकाज के आर्थिक और सामाजिक महत्व को मान्यता देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को घर संभालने वाली महिलाओं को 'राष्ट्र निर्माता' बताया।

साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि मोटर दुर्घटना में उनकी मृत्यु होने पर 'घरेलू देखभाल के नुकसान' के नाम से मुआवजे का एक अलग हिस्सा दिया जाए।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने हरियाणा में वर्ष 2001 में सड़क हादसे में जान गंवाने वाली एक महिला के परिवार को मिलने वाले मुआवजे को 8.43 लाख रुपए से बढ़ाकर 62.77 लाख रुपए कर दिया। साथ ही अदालत ने भविष्य में गृहिणियों से जुड़े ऐसे मामलों में मुआवजा तय करने के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश भी जारी किए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी गृहिणी के योगदान को केवल पैसों में मापना बेहद कठिन है। वह परिवार की रीढ़ होती है और उसके काम का मूल्य पारंपरिक आय के आधार पर नहीं आंका जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "गृहिणियां वास्तव में राष्ट्र निर्माता हैं और उन्हें उसी सम्मान के साथ पहचाना जाना चाहिए।"

यह मामला 25 नवंबर 2001 का है, जब सिरसा से फतेहाबाद जा रही एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। वर्ष 2003 में मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) ने परिवार को 2.42 लाख रुपए का मुआवजा दिया था। बाद में दिसंबर 2024 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर 8.43 लाख रुपए कर दिया। हालांकि परिवार इससे संतुष्ट नहीं था और सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अदालत ने माना कि गृहिणियों के लिए पहले तय की जाने वाली काल्पनिक आय बहुत कम थी, जिससे उनके योगदान का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता था। इसलिए अब ऐसे मामलों में गृहिणी की न्यूनतम मासिक आय 30,000 रुपए मानी जाएगी। इस राशि में हर तीन साल में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी की जाएगी।

इसी आधार पर अदालत ने मृतक महिला के योगदान की पुनर्गणना करते हुए कुल मुआवजा 62.77 लाख रुपए तय किया।

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने पर भी चिंता जताई। अदालत ने पाया कि ऐसे मामलों की अपीलें हाईकोर्ट में औसतन आठ साल और ट्रिब्यूनल में लगभग छह साल तक लंबित रहती हैं। अदालत ने सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से पुराने मामलों को प्राथमिकता देने और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त बेंच गठित करने का अनुरोध किया है।

साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि दुर्घटना दावा याचिकाओं के साथ उम्र, आय, दिव्यांगता प्रमाणपत्र और चिकित्सा बिल जैसे आवश्यक दस्तावेज शुरू से ही जमा किए जाएं, ताकि बार-बार स्थगन की जरूरत न पड़े और पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की प्रति सभी हाईकोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों को भेजने का भी निर्देश दिया है।



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