Top
Begin typing your search above and press return to search.

ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और संभल विवादों में मध्यस्थता से दूरी, पक्षकारों ने न्यायिक फैसले पर जताया भरोसा

ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और संभल मस्जिद विवादों में हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने मध्यस्थता के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। सभी पक्षों ने इन संवेदनशील मामलों के समाधान के लिए न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा जताया है।

ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और संभल विवादों में मध्यस्थता से दूरी, पक्षकारों ने न्यायिक फैसले पर जताया भरोसा
X

नई दिल्ली। वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल जामा मस्जिद से जुड़े बहुचर्चित विवादों में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने आपसी समझौते के माध्यम से समाधान की प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया है। संबंधित पक्षों का कहना है कि इन मामलों का निपटारा केवल न्यायालय के समक्ष उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही होना चाहिए।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से संबद्ध एक पहल के तहत सभी पक्षकारों को पत्र भेजकर स्वैच्छिक मध्यस्थता और सहमति-आधारित समाधान की संभावना पर विचार करने का आग्रह किया गया था। इस पहल का उद्देश्य लंबे समय से लंबित मामलों का सौहार्दपूर्ण निस्तारण करना था।

संवैधानिक और जनहित से जुड़े प्रश्नों का हवाला

विवादों से जुड़े याचिकाकर्ताओं और मस्जिद प्रबंधन समितियों ने अपने जवाब में कहा कि ये केवल स्थानीय संपत्ति संबंधी विवाद नहीं हैं, बल्कि इनमें संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक आस्थाओं और व्यापक जनहित से जुड़े प्रश्न शामिल हैं। इसलिए उनका मानना है कि ऐसे मामलों का अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा ही किया जाना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का भी मत है कि पूजा स्थलों के स्वामित्व और धार्मिक अधिकारों से जुड़े विवादों में न्यायिक प्रक्रिया पारदर्शिता और स्थायित्व प्रदान करती है। पक्षकारों ने यह भी स्पष्ट किया कि वे शांतिपूर्ण समाधान के पक्षधर हैं, लेकिन औपचारिक मध्यस्थता मंच को उपयुक्त विकल्प नहीं मानते।

विशेष लोक अदालत में शामिल होने की संभावना कम

दोनों पक्षों के रुख के बाद अगस्त में प्रस्तावित विशेष लोक अदालत में इन मामलों के जाने की संभावना काफी कम हो गई है। अब इन विवादों पर सुनवाई और अंतिम निर्णय नियमित न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ने की उम्मीद है।

इन प्रकरणों में पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की व्याख्या सहित कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भविष्य में समान प्रकृति के मामलों के लिए भी मार्गदर्शक साबित हो सकता है।

फिलहाल सभी पक्ष अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं और यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वे न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए उसी के माध्यम से समाधान चाहते हैं।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it