Top
Begin typing your search above and press return to search.

महिलाओं के खतना पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, वकील ने कहा- यौन सुख बढ़ाने के लिए है FGM, भड़के जस्टिस

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कहा है क धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा के अधीन है। कोर्ट ने यह टिप्पणी दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित FGM प्रथा की वैधता पर सुनवाई के दौरान की।

महिलाओं के खतना पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, वकील ने कहा- यौन सुख बढ़ाने के लिए है FGM, भड़के जस्टिस
X

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा पर भी तीखी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ वर्गों में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा को लेकर मौखिक रूप से चिंता जताई। दरअसल, FGM को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई अब सबरीमाला मामले के साथ ही की जाएगी।

इसका मुख्य कारण यह है कि संविधान के धार्मिक आजादी से जुड़े (अनुच्छेद 25 और 26) जो मुद्दे वर्तमान में 9 जजों की पीठ के विचाराधीन हैं, उनका सीधा प्रभाव इस मामले पर भी पड़ेगा। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रथा महिलाओं के गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है। दूसरी ओर इस प्रथा के समर्थकों का कहना है कि यह उनकी धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है और उन्हें अनुच्छेद 25 के तहत इसे जारी रखने का अधिकार है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि एक तरफ अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता है तो दूसरी तरफ मानवीय गरिमा, स्वास्थ्य और महिलाओं की यौन स्वायत्तता। FGM का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने बेंच को बताया कि यह प्रथा 7 साल की छोटी बच्चियों पर की जाती है और इससे उनके शरीर में ऐसा बदलाव आता है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता, जिसका असर उनकी यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ता है।

उन्होंने दलील दी कि कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर वे इसका पालन नहीं करेंगे तो उन्हें समाज से निकाल दिया जाएगा। लूथरा ने तर्क दिया कि इस प्रथा को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता और इसलिए इसे अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। वहीं, जस्टिस जॉयमाल्य बागची की मौखिक टिप्पणी इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है क्योंकि उन्होंने कहा कि इस प्रथा को रोकने के लिए शायद बहुत जटिल संवैधानिक व्याख्याओं की जरूरत ही न पड़े क्योंकि इस प्रथा पर आर्टिकल 25 के तहत स्वास्थ्य के आधार पर ही रोक लगाई जा सकती है।

जस्टिस बागची ने याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 25, जो धार्मिक स्वतंत्रता देता है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के दायरे में ही मिलेगी। जस्टिस बागची ने कहा, 'जहां तक महिलाओं के खतना (FGM) का सवाल है, हमें शायद दूसरे अधिकारों पर विचार करने की भी जरूरत न पड़े। इसके लिए सिर्फ स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य शब्द ही काफी हो सकते हैं।' इस बात से सहमति जताते हुए लूथरा ने कहा कि इस प्रथा में क्लिटोरिस के आस-पास की त्वचा को हटा दिया जाता है जिससे कम से कम 10,000 तंत्रिका-सिरों (nerve endings) को ऐसा नुकसान पहुंचता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

लूथरा ने आगे कहा कहा, 'यह महिलाओं के शरीर के एक बहुत जरूरी अंग को काटना है और इसका सीधा असर उनकी शारीरिक, प्रजनन और भावनात्मक सेहत पर पड़ता है। जहां कोई प्रथा किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता में दखल देती है और किसी जरूरी अंग को नुकसान पहुंचाती है तो वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत तय सीमाओं यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है उन्होंने यह भी बताया कि 59 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत नैतिकता के आधार पर भी सवालों के घेरे में आएगी। जस्टिस बागची ने कहा कि इस प्रथा का पालन न करने पर समाज से बहिष्कृत किए जाने के परिणामों के साथ-साथ इस धार्मिक प्रथा का किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक समग्रता पर पड़ने वाले प्रभाव की भी जांच किए जाने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति वराले ने इसके प्रभाव को कई गुना बताते हुए चिंता व्यक्त की जबकि न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि इस प्रथा का मूल उद्देश्य महिलाओं की कामुकता (sexuality) को नियंत्रित करना था। लूथरा ने दलील दी कि बेंच को समुदाय के भीतर काम करने वाले ढांचे (power structures) और उन सामाजिक मजबूरियों पर भी विचार करना चाहिए जिनका सामना लोगों को करना पड़ता है।

इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पूछा कि क्या लूथरा यह सुझाव दे रहे हैं कि अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है तो अनुच्छेद 25 और 26 के बावजूद कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए जिसका जवाब लूथरा ने हां में दिया। उन्होंने इस बात पर खास जोर दिया कि इस प्रथा का शिकार होने वाले लोग नाबालिग हैं जो कानूनी रूप से सहमति देने में असमर्थ हैं। साथ ही बेंच ने स्पष्ट किया कि इसकी तुलना पुरुषों के खतना से करना गलत है। इसी बीच अधिवक्ता निजाम पाशा ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) का पालन न करने की स्थिति में किसी भी सदस्य को समुदाय से निष्कासित नहीं किया जाता। उन्होंने इस प्रक्रिया को अंग-भंग (mutilation) के रूप में परिभाषित किए जाने पर भी कड़ा विरोध जताया। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह एक तथ्यात्मक पहलू है जिस पर अलग से विचार किया जाएगा।

पाशा ने तर्क दिया कि समुदाय के भीतर इस प्रथा को न अपनाने के कोई सांसारिक या सामाजिक दुष्परिणाम नहीं हैं। भले ही व्यक्तिगत रूप से कुछ सदस्यों की यह आध्यात्मिक मान्यता हो सकती है कि इसके कुछ धार्मिक परिणाम हो सकते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने एक महत्वपूर्ण सवाल किया कि क्या दाऊदी बोहरा धर्मगुरु के निर्देशों का पालन न करने पर किसी प्रकार की सजा दी जाती है।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it