यूरोप में भीषण हीटवेव का कहर, फ्रांस में 1,000 लोगों की मौत, 16 देशों में टूटा तापमान का रिकॉर्ड
यूरोप में रिकॉर्डतोड़ हीटवेव का कहर। फ्रांस में भीषण गर्मी से 1,000 लोगों की मौत, जर्मनी, स्पेन, ब्रिटेन समेत 16 देशों में तापमान ने तोड़े रिकॉर्ड, स्कूल बंद और जंगलों में आग।

फ्रांस में गर्मी बनी जानलेवा
फ्रांस में हालात सबसे ज्यादा गंभीर बताए जा रहे हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक अतिरिक्त मौतों का अर्थ है कि सामान्य वर्षों की तुलना में इस अवधि में करीब एक हजार अधिक लोगों की जान गई। मृतकों में लगभग 85 प्रतिशत बुजुर्ग हैं और ज्यादातर लोगों की मौत घरों में हुई। राजधानी पेरिस और उसके आसपास के इलाकों में सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। वहीं, भीषण गर्मी के चलते एयर कंडीशनर और पंखों की मांग अचानक बढ़ गई है, जिससे कई दुकानों पर खरीदारी के दौरान अफरा-तफरी जैसी स्थिति देखने को मिली।
16 देशों में रिकॉर्डतोड़ तापमान
रविवार को यूरोप के लगभग 19 करोड़ लोगों ने 35 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान झेला। स्पेन में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया, जबकि जर्मनी में 41.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो वहां का नया रिकॉर्ड माना जा रहा है। ब्रिटेन में जून महीने के 50 वर्ष पुराने तापमान रिकॉर्ड लगातार तीन बार टूट चुके हैं। डेनमार्क जैसे ठंडे देश में भी तापमान 37 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसने मौसम वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया।
सड़कें पिघलीं, स्कूल बंद और जंगलों में आग
अत्यधिक गर्मी का असर केवल लोगों के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। जर्मनी और डेनमार्क में कई सड़कों की सतह पिघलने लगी है, जिससे भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगानी पड़ी। फ्रांस में 1,300 से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जबकि ब्रिटेन में करीब 1,000 स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हुई है। स्पेन, पुर्तगाल और इटली में सूखे और तेज गर्मी के कारण जंगलों में आग फैलने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कई इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ा दबाव
ब्रिटेन, फ्रांस और इटली के अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और सांस संबंधी समस्याओं वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कई अस्पतालों ने आपातकालीन व्यवस्था लागू कर दी है। सरकारों ने लोगों से दोपहर के समय घरों से बाहर न निकलने, पर्याप्त पानी पीने और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखने की अपील की है।
वैज्ञानिकों ने जताई चिंता
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। उनका मानना है कि भविष्य में ऐसी भीषण हीटवेव पहले की तुलना में अधिक बार आएंगी और अधिक समय तक बनी रहेंगी। इसके कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा और परिवहन व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत में 40°C सामान्य, यूरोप में क्यों बन जाता है संकट?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत और यूरोप की परिस्थितियां काफी अलग हैं। भारत में अधिकांश घर और भवन गर्म मौसम को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं, जहां हवा के आवागमन की पर्याप्त व्यवस्था रहती है। वहीं यूरोप में भवन ठंड से बचाने के लिए डिजाइन किए गए हैं, जिससे गर्मी अंदर फंस जाती है।
इसके अलावा भारतीय लोगों का शरीर लंबे समय से अधिक तापमान का अभ्यस्त है, जबकि यूरोप के लोगों के लिए अचानक 40 डिग्री सेल्सियस का तापमान गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर देता है। यूरोप में अधिक नमी के कारण पसीना जल्दी नहीं सूखता, जिससे शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता और हीट स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
जलवायु परिवर्तन पर फिर बढ़ी बहस
लगातार बढ़ती गर्मी ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यूरोप समेत दुनिया के कई हिस्सों में इस तरह की चरम मौसम घटनाएं और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं।


