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रक्षा क्षेत्र में सुधारों का असर: सैन्य उपकरणों के बड़े निर्यातक के रूप में उभरा भारत, 12 वर्षों में 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपए पहुंचा रक्षा निर्यात

भारत के रक्षा क्षेत्र में वर्ष 2014 से 2026 के बीच बड़ा बदलाव देखने को मिला है। बुधवार को जारी एक आधिकारिक फैक्ट शीट के अनुसार, देश का वार्षिक रक्षा निर्यात 2013-14 में केवल 686 करोड़ रुपए था, जो बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। आज भारत के सैन्य उपकरणों की मांग दुनिया के 80 से अधिक देशों में है।

रक्षा क्षेत्र में सुधारों का असर: सैन्य उपकरणों के बड़े निर्यातक के रूप में उभरा भारत, 12 वर्षों में 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपए पहुंचा रक्षा निर्यात
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नई दिल्ली। भारत के रक्षा क्षेत्र में वर्ष 2014 से 2026 के बीच बड़ा बदलाव देखने को मिला है। बुधवार को जारी एक आधिकारिक फैक्ट शीट के अनुसार, देश का वार्षिक रक्षा निर्यात 2013-14 में केवल 686 करोड़ रुपए था, जो बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। आज भारत के सैन्य उपकरणों की मांग दुनिया के 80 से अधिक देशों में है।

'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' अभियानों के तहत सरकार ने कई बड़े नीतिगत सुधार किए हैं। घरेलू नवाचार को बढ़ावा दिया गया है और एक मजबूत रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया गया है। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी) 2020 और रक्षा खरीद मैनुअल (डीपीएम) 2025 जैसी महत्वपूर्ण पहलों के जरिए प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, स्वदेशी सामग्री के उपयोग को बढ़ावा मिला और निजी क्षेत्र तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के लिए नए अवसर खोले गए।

फैक्ट शीट के अनुसार, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों के विकास में अहम भूमिका निभाई है। डीआरडीओ ने उद्योगों के साथ मिलकर कई नई तकनीकों को युद्धक्षेत्र में उपयोग के लिए तैयार प्रणालियों में बदलने का काम किया है।

देश का रक्षा बजट 2013-14 में 2.53 लाख करोड़ रुपए था, जो बढ़कर 2026-27 में 7.85 लाख करोड़ रुपए हो गया है। वहीं, स्वदेशी रक्षा उत्पादन 2014-15 के 46,429 करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 1.78 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है।

रक्षा बजट में लगातार वृद्धि के जरिए सैन्य आधुनिकीकरण और स्वदेशी उत्पादन को समर्थन दिया गया है। अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के लिए धनराशि भी दोगुने से अधिक बढ़ी है, जिसमें उद्योगों, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ाई गई है। सृजन डीप, सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची और उदार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति जैसी पहलों ने निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दिया है।

रणनीतिक साझेदारियों और स्वदेशी रक्षा प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत कर रहा है और वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार रक्षा साझेदार के रूप में उभर रहा है। सरकार का कहना है कि पिछले एक दशक के प्रयासों ने वर्ष 2047 के विजन को ध्यान में रखते हुए आत्मनिर्भर और भविष्य के लिए तैयार रक्षा तंत्र की मजबूत नींव रखी है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन 2014-15 में 13,716.14 करोड़ रुपए था, जो बढ़कर 2026-27 में 29,100.25 करोड़ रुपए हो गया है। यह 112 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।

सरकार ने 2022-23 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के लिए खोल दिया था, ताकि नवाचार को व्यापक स्तर पर बढ़ावा मिल सके। वर्ष 2024 में इस उद्देश्य के लिए रक्षा विभाग ने 1,757 करोड़ रुपए आवंटित किए थे।

इसके अलावा, बयान में कहा गया है कि सरकार ने रक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता और सहयोग बढ़ाने के लिए डीआरडीओ की कई विश्वस्तरीय अनुसंधान एवं विकास सुविधाएं निजी उद्योगों के लिए भी उपलब्ध कराई हैं। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने आवश्यक मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) तैयार की हैं और डीआरडीओ की 24 प्रयोगशालाओं की परीक्षण सुविधाओं को रक्षा परीक्षण पोर्टल पर उपलब्ध कराया है। इससे निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को रक्षा तकनीकों के विकास और परीक्षण में सहायता मिल रही है।



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