‘सरकारें आएंगी-जाएंगी, मगर देश और लोकतंत्र रहना चाहिए’, अटल बिहारी वाजपेयी का ऐतिहासिक भाषण
अटल बिहारी वाजपेयी की 8वीं पुण्यतिथि पर 1996 के ऐतिहासिक संसद भाषण की चर्चा। जानिए कैसे उन्होंने सत्ता से ऊपर देश और लोकतंत्र को महत्व दिया था।

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 8वीं पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई नेताओं ने नई दिल्ली स्थित ‘सदैव अटल’ स्मारक पहुंचकर पूर्व प्रधानमंत्री को नमन किया। अटल बिहारी वाजपेयी एक कुशल राजनेता होने के साथ-साथ प्रभावशाली वक्ता और कवि भी थे। संसद में उनके भाषणों को आज भी भारतीय राजनीति के यादगार क्षणों में गिना जाता है।
ऐसा ही एक भाषण उन्होंने 31 मई 1996 को लोकसभा में विश्वास मत के दौरान दिया था। उस समय उनकी सरकार बहुमत साबित करने में असफल रही थी और महज 13 दिन बाद प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की स्थिति बन गई थी। हालांकि, उस समय दिया गया उनका भाषण भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक मर्यादा और सिद्धांतों की मिसाल बन गया।
‘सत्ता का खेल चलता रहेगा, देश रहना चाहिए’
विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता के संघर्ष को लोकतंत्र से ऊपर न रखने का संदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि सत्ता का खेल चलता रहेगा, सरकारें आती-जाती रहेंगी और राजनीतिक दल बनते-बिगड़ते रहेंगे, लेकिन देश और उसका लोकतंत्र कायम रहना चाहिए।
उनका यह संदेश आज भी भारतीय संसदीय राजनीति में बार-बार उद्धृत किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण के दौरान कहा था कि देश कई चुनौतियों से गुजर रहा है और जब भी जरूरत पड़ी, उनकी पार्टी ने तत्कालीन सरकार के साथ राष्ट्रीय हित में सहयोग किया।
राजनीतिक कटुता पर भी दी थी नसीहत
अपने भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीतिक मतभेदों को दुश्मनी में बदलने से बचने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि संसद में चल रही बहस समाप्त होने के बाद देश के सामने एक नया अध्याय शुरू होगा, इसलिए राजनीतिक कटुता को बढ़ने नहीं देना चाहिए।
उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को लेकर लगाए गए आरोपों का भी उल्लेख किया था। वाजपेयी ने संघ के सामाजिक कार्यों, खासकर वंचित और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा एवं सेवा से जुड़े कामों का जिक्र करते हुए उसके प्रति सम्मान की बात कही थी।
1996 में 13 दिन, 1998 में 13 महीने और फिर पूरे 5 साल
अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक सफर सत्ता और विपक्ष दोनों के अनुभवों से भरा रहा। वर्ष 1996 में उनकी सरकार केवल 13 दिन चली। बहुमत का आंकड़ा पूरा नहीं होने पर उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
इसके बाद 1998 में वह दोबारा प्रधानमंत्री बने, लेकिन सहयोगी दलों के समर्थन वापस लेने के कारण उनकी सरकार करीब 13 महीने बाद गिर गई। इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनाव में जनता ने एक बार फिर उनके नेतृत्व पर भरोसा जताया और इस बार उन्होंने गठबंधन सरकार के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया।
अटल बिहारी वाजपेयी का 1996 का भाषण इसलिए खास माना जाता है क्योंकि उस समय सरकार बचाने की पूरी कोशिश करने के बजाय उन्होंने सत्ता से अधिक लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता देने का संदेश दिया था। यही वजह है कि उनके निधन के वर्षों बाद भी उनके संसदीय भाषण भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक विरासत का अहम हिस्सा बने हुए हैं।


