महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में मोदी सरकार, विपक्ष से मदद की क्यों दरकार
महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 में पारित किया गया था। यह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है। लेकिन, परिसीमन की प्रक्रिया अभी पूरी न होने के कारण इसे अब तक लागू नहीं किया जा सका है।

नई दिल्ली। भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार देश में बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण कानून लागू करने की तैयारी कर रही है। सूत्रों ने इसकी जानकारी दी है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस कानून को 2011 की जनगणना के आधार पर लागू करने की योजना बना रही है।
इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि महिला आरक्षण लागू होने की स्थिति में लोकसभा की सीटें बढ़कर 816 हो जाएंगी। इसका प्रस्ताव रखा गया है।रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रस्तावित ढांचे के तहत लोकसभा की कुल सीटें वर्तमान 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती हैं। इनमें से लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
यह कदम भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को ऐतिहासिक रूप से बढ़ाने वाला माना जा रहा है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच मोदी सरकार का यह अहम दांव माना जा रहा है, जिसमें विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस से मदद मांगकर उसे भी सियासी रूप से मजबूर करने की कोशिश हो रही है।
महिला आरक्षण अधिनियम 2023 का क्या है प्रावधान
दरअसल, साल 2023 में पारित इस कानून में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया था। हालांकि, इसे लागू करने की शर्त नई जनगणना और परिसीमन (Delimitation) से जोड़ी गई थी, जिसके कारण अब तक यह प्रभावी नहीं हो पाया है। बता दें कि मूल कानून में यह शर्त थी कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा, जब नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। अब सरकार इस शर्त को संशोधित कर जल्द से जल्द कानून लागू करने के विकल्प तलाश रही है।
संविधान संशोधन की होगी जरूरत
सूत्रों का दावा है कि सरकार इस मामले में तेजी से आगे बढ़ना चाहती है। उसका लक्ष्य है कि मौजूदा बजट सत्र में ही एक विधेयक पेश किया जाए, ताकि कानून में संशोधन करके संसद के निचले सदन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सके। ऐसे में अगर सरकार परिसीमन से पहले महिला आरक्षण लागू करना चाहती है तो इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा। इसके तहत संसद के दोनों सदनों में बहुमत आवश्यक होगा, जिसमें उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में दो-तिहाई समर्थन जरूरी है। यह प्रक्रिया भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368 के तहत पूरी की जाएगी।
राजनीतिक सहमति की चुनौती
हालांकि, संसद में सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है। बावजूद इसके सरकार को उम्मीद है कि वह इस कानून को दो तिहाई बहुमत से पारित करा लेगी। विपक्षी दलों से शुरुआती संपर्क से यह भी संकेत मिलता है कि सरकार इस संवैधानिक संशोधन को आसानी से पारित कराने के लिए व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिशों में जुटी है। अधिकारियों को उम्मीद है कि कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद, यह विधेयक संभवतः अगले हफ़्ते सबसे पहले राज्यसभा में पेश किया जाएगा। अहम बात यह है कि BJP के पास लोकसभा में 240 और राज्यसभा में 103 सांसद हैं। ऐसे में,साफ है कि विपक्षी दलों के समर्थन के बिना दोनों में से किसी भी सदन में इस संशोधन को दो तिहाई बहुमत से पारित नहीं कराया जा सकता।
आगे क्या होगा?
इस बीच, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है, ताकि कानून के क्रियान्वयन की रूपरेखा पर व्यापक सहमति बन सके। उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री से इस दिशा में पहल करने को कहा है। सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट की मंजूरी के बाद इस संशोधन विधेयक को पहले राज्यसभा में पेश किया जा सकता है। सरकार का लक्ष्य है कि इसे व्यापक समर्थन के साथ संसद से पारित कराया जाए, ताकि लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण को वास्तविकता में बदला जा सके।
बता दें कि महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 में संसद से पारित किया गया था। यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करता है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी एक नए स्तर पर पहुंच सकती है। हालांकि, इसके लिए राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया की जटिलताओं को पार करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।


