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पहली शादी समाप्त किए बिना दूसरी पत्नी का दर्जा नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला का भरण-पोषण दावा खारिज किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पहली शादी समाप्त किए बिना किसी अन्य पुरुष के साथ रहने वाली महिला दूसरे पुरुष से पत्नी के रूप में भरण-पोषण नहीं मांग सकती। अदालत ने पुत्री के भरण-पोषण का अधिकार बरकरार रखा।

पहली शादी समाप्त किए बिना दूसरी पत्नी का दर्जा नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला का भरण-पोषण दावा खारिज किया
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने पहले पति से विधिवत तलाक लिए बिना किसी अन्य पुरुष के साथ रहने लगती है, तो वह दूसरे पुरुष से पत्नी के रूप में भरण-पोषण की हकदार नहीं मानी जाएगी। हालांकि, न्यायालय ने यह भी दोहराया कि संतान के भरण-पोषण का दायित्व पिता पर बना रहता है।

मामला चित्रकूट की एक पारिवारिक अदालत के आदेश से जुड़ा था, जिसमें एक व्यक्ति को महिला और उसकी पुत्री के लिए मासिक भरण-पोषण राशि देने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए संबंधित व्यक्ति ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि महिला का पूर्व विवाह पहले से विद्यमान था और उसने अपने पहले पति से तलाक नहीं लिया था। जिरह में महिला ने स्वयं स्वीकार किया कि दूसरे पुरुष के साथ उसका विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न नहीं हुआ था।

वैध विवाह की शर्त पर जोर

जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने कहा कि भरण-पोषण के लिए “पत्नी” की कानूनी स्थिति का होना आवश्यक है। चूंकि महिला वैध विवाह सिद्ध नहीं कर सकी, इसलिए उसे पत्नी के रूप में भरण-पोषण देने का पारिवारिक अदालत का आदेश टिक नहीं सकता।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 का उद्देश्य जरूरतमंद आश्रितों को संरक्षण देना है, लेकिन इसका लाभ केवल उन व्यक्तियों को मिलता है जो कानून के अनुसार पात्र हों।

बेटी के अधिकार सुरक्षित

मामले में प्रस्तुत डीएनए रिपोर्ट से यह सिद्ध हुआ कि बच्ची संबंधित व्यक्ति की जैविक पुत्री है। इस आधार पर न्यायालय ने पुत्री के पक्ष में पारिवारिक अदालत द्वारा दिया गया भरण-पोषण आदेश यथावत रखा।

अदालत ने कहा कि पिता का दायित्व अपनी संतान का पालन-पोषण करना है, चाहे संतान वैध विवाह से जन्मी हो या नहीं। इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए बेटी के भरण-पोषण को बरकरार रखा गया।

इस निर्णय को पारिवारिक कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण व्याख्या माना जा रहा है, जो वैध वैवाहिक संबंध और संतान के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है।


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