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महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को छोड़कर पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किसी राज्य में ठोस कार्रवाई नहीं

देश में पत्रकारों के लिए सुरक्षा संबंधित कानून बनाने की लंबे समय से की जा रही मांग के बावजूद दो राज्यों को छोड़कर अभी तक किसी ने इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास और ठोस कार्रवाई नहीं की है ।

महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को छोड़कर पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किसी राज्य में ठोस कार्रवाई नहीं
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नई दिल्ली । देश में पत्रकारों के लिए सुरक्षा संबंधित कानून बनाने की लंबे समय से की जा रही मांग के बावजूद दो राज्यों को छोड़कर अभी तक किसी ने इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास और ठोस कार्रवाई नहीं की है ।

गैर सरकारी संगठन ‘द विजेन फाऊंडेशन’ ने इस दिशा में काम करने वाले संस्थाओं और पत्रकार संगठनों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश में पत्रकारों के खिलाफ होने वाली हिंसा पर तुलनात्मक अध्ययन किया है । इस अध्ययन का प्रकाशन भारतीय प्रेस दिवस के मौके पर 16 नवंबर को किया जायेगा।

संगठन ने कहा है कि देश में केवल महाराष्ट्र सरकार ने पत्रकार सुरक्षा पर कुछ प्रावधान पारित किए हैं । छत्तीसगढ़ भी इस प्रक्रिया में है। हालांकि अभी वहां प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र दो नवंबर को “ पत्रकारों पर हिंसा के मामले में माफी नहीं” दिवस के रुप में मनाता है । संगठन देश में इस दिवस के बारे में जागरुकता और जानकारी बढ़ाने के लिए पत्रकारों के बीच एक सर्वेक्षण कर रहा है । सर्वेक्षण गूगल लिंक के जिरये किया जा रहा । सर्वेक्षण से हासिल निष्कर्ष को “ देश में पत्रकारों पर हिंसा एवं सुरक्षा ” संबंधी अध्ययन रिपोर्ट में शामिल किया जायेगा।

उल्लेखनीय है अंतर्राष्ट्रीय संगठन रिपोर्टरस विदआउट बाउंड्रीज (आरएसएफ) ने 2019 में भारत को कुल 180 देशों में 140 वां स्थान दिया है । पिछले साल विश्व में पत्रकारों पर हमले के मामले में देश 138 वें पायदान पर था । वर्ष 2018 और 2019 में कम से कम 10 मीडिया कर्मियों की ड्यूटी के दौरान हत्या की गई। इसमें 14 जून 2018 को राइजिंग कश्मीर के मुख्य संपादक सुजात बुखारी की हत्या भी शामिल है । वर्ष 2017 सितंबर में महिला पत्रकार गौरी लंकेश की कथित रुप से हत्या की गई ।


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