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टाइप कास्टिंग से टकराव: जानें ‘तारे जमीं पर’ के बाद क्यों पीछे हटीं टिस्का चोपड़ा
टिस्का चोपड़ा का कहना है कि तारे ज़मीं पर के बाद उन्हें जिस तरह के ऑफर मिलने लगे, उन्होंने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया।

मुंबई। हिंदी सिनेमा में टाइपकास्टिंग का मुद्दा नया नहीं है। किसी एक भूमिका में कलाकार के प्रभावशाली प्रदर्शन के बाद अक्सर उन्हें उसी तरह के किरदारों तक सीमित कर दिया जाता है। यह समस्या खासतौर पर महिला कलाकारों के साथ ज्यादा देखने को मिलती है। अभिनेत्री टिस्का चोपड़ा भी इस दौर से गुज़री हैं। तारे जमीं पर और दिल तो बच्चा है जी जैसी फिल्मों में मां की भूमिकाओं में सराहना मिलने के बाद उनके पास लगातार एक जैसे किरदारों के प्रस्ताव आने लगे, जिससे उन्होंने खुद को पीछे खींच लिया।
फिल्म बिजनेस की "मदर इंडिया’ बन गई थी
टिस्का चोपड़ा का कहना है कि तारे जमीं पर के बाद उन्हें जिस तरह के ऑफर मिलने लगे, उन्होंने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया। टिस्का बताती हैं, “तारे जमीं पर के बाद मैं फिल्म बिजनेस की ‘मदर इंडिया’ बन गई थी। हर कोई मेरे पास ऐसे रोल लेकर आता था, जिसमें कहा जाता बहुत अच्छा है, बहुत अलग है, इसमें आपका बच्चा थोड़ा असामान्य है।” उनके मुताबिक, लगभग हर स्क्रिप्ट में मां का किरदार तो होता था, लेकिन उसमें नयापन या चुनौती कम ही दिखाई देती थी। ऐसे में उन्होंने कई प्रस्ताव ठुकराने का फैसला किया।
खुद लिया पीछे हटने का फैसला
टिस्का मानती हैं कि इस स्थिति के लिए वह किसी सिस्टम को दोष नहीं देतीं। उनका कहना है कि यह फैसला उन्होंने खुद लिया। “मैं उन्हें तिरछी नजरों से देखती थी और फिर अलविदा कह देती थी। और करूं भी क्या। मैंने अपने कदम स्वयं पीछे कर लिए, क्योंकि यह निर्णय मुझे लेना था। मैं सिस्टम को इसके लिए दोष नहीं दे सकती हूं।” उनका मानना है कि कलाकार के तौर पर अपने रास्ते खुद तय करना जरूरी होता है, भले ही उसके लिए कुछ मौके छोड़ने पड़ें।
बागी स्वभाव और अपने फैसले
टिस्का खुद को बागी स्वभाव का बताती हैं। वह कहती हैं कि वह भीड़ के साथ चलने के बजाय अपने फैसलों पर भरोसा करती हैं। “मैं अपने अलग निर्णय ले सकती हूं। मुझे जो करना है, उसके लिए मैं अपना आपा नहीं खोती हूं।” यही वजह रही कि उन्होंने एक जैसी भूमिकाओं में फंसने के बजाय खुद को नए रास्तों पर आज़माने का फैसला किया।
खुद की फिल्में बनाने की ओर कदम
लगातार सीमित किरदारों के प्रस्ताव मिलने के बाद टिस्का ने अभिनय के साथ-साथ फिल्म निर्माण की दिशा में भी कदम बढ़ाए। उन्होंने अपनी खुद की फिल्में बनानी शुरू कीं, ताकि कहानी और किरदारों को लेकर उनके पास रचनात्मक आज़ादी हो। उनका मानना है कि अगर किसी कलाकार को मनचाहा काम नहीं मिल रहा, तो उसे नए विकल्प तलाशने चाहिए, न कि मजबूरी में वही करते रहना चाहिए जो बार-बार ऑफर हो रहा है।
मां की भूमिका से नहीं, उसके ढांचे से आपत्ति
टिस्का साफ करती हैं कि उन्हें मां की भूमिका निभाने से कोई समस्या नहीं है। उन्होंने दिल तो बच्चा है जी, अंकुर अरोड़ा मर्डर केस और रहस्य जैसी फिल्मों में मां के किरदार निभाए हैं। टिस्का कहती हैं कि अगर आप इन फिल्मों को देखें, तो हर मां अलग है। उनके मुताबिक, असली सवाल यह नहीं है कि किरदार मां का है या नहीं, बल्कि यह है कि वह मां किस तरह की है, फिल्म में क्या कर रही है और कहानी कितनी दिलचस्प है।
किरदार की गहराई है सबसे अहम
टिस्का का मानना है कि किसी भी भूमिका को स्वीकार करने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसमें अभिनय की कितनी गुंजाइश है। “मुझसे मां की भूमिकाएं कराओ, लेकिन सवाल ये उठता है कि वो किस तरह की मां है और फिल्म की कहानी में उसका क्या महत्व है।” उनके इस रुख ने उन्हें भले ही कुछ व्यावसायिक मौकों से दूर रखा हो, लेकिन उन्होंने अपने करियर की दिशा खुद तय की।
टाइपकास्टिंग पर एक अहम संदेश
टिस्का चोपड़ा की कहानी हिंदी सिनेमा में टाइपकास्टिंग पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। उनका मानना है कि कलाकार को अपने फैसलों की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए और अगर जरूरत पड़े तो तय ढर्रे से बाहर निकलने का साहस भी दिखाना चाहिए। यही रवैया उन्हें एक अलग और सम्मानजनक पहचान देता है।
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