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अपनी जिद पर फिल्‍म परदेस में माधुरी दीक्षित की जगह महिमा चौधरी को लाए थे सुभाष घई, बताया कैसे चुने थे फिल्म के किरदार

सुभाष घई ने अपनी साल 1997 में रिलीज हुई फिल्म ‘परदेस’ से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि जब वह इस फिल्म की कहानी पर काम कर रहे थे, तो उन्होंने सबसे पहले माधुरी दीक्षित को कहानी सुनाई थी।

अपनी जिद पर फिल्‍म परदेस में माधुरी दीक्षित की जगह महिमा चौधरी को लाए थे सुभाष घई, बताया कैसे चुने थे फिल्म के किरदार
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मुंबई। फिल्म इंडस्ट्री के कार्पोरेटाइजेशन को लेकर अक्सर यह बहस होती रही है कि इससे फिल्म निर्माण की प्रक्रिया कितनी बदली है। मशहूर फिल्मकार और ‘कर्मा’ तथा ‘राम लखन’ जैसी सुपरहिट फिल्मों के निर्देशक सुभाष घई मानते हैं कि कॉरपोरेट ढांचे के आने से इंडस्ट्री में कुछ सकारात्मक बदलाव जरूर आए हैं, लेकिन इसके साथ ही रचनात्मक स्वतंत्रता पर भी असर पड़ा है। उनके मुताबिक, फिल्म निर्माण अब ज्यादा अनुशासित और व्यवस्थित तो हो गया है, लेकिन क्रिएटिव फैसलों में पहले जैसी आज़ादी नहीं रही।

अनुशासन और बजट कंट्रोल का फायदा

सुभाष घई का कहना है कि कार्पोरेटाइजेशन के बाद फिल्मों के निर्माण में पेशेवराना रवैया बढ़ा है। उन्होंने बताया कि अब हर विभाग के लिए लक्ष्य तय होता है, काम एक निश्चित समय-सीमा में पूरा किया जाता है और बजट पर भी सख्त नियंत्रण रहता है। इससे प्रोड्यूसर्स और निवेशकों को भरोसा मिलता है कि उनका पैसा सही दिशा में इस्तेमाल हो रहा है। घई के अनुसार, पहले के दौर में फिल्में कई बार तय समय से काफी देर से पूरी होती थीं, जिससे लागत बढ़ जाती थी। कॉरपोरेट सिस्टम ने इस समस्या को काफी हद तक कम किया है।

क्रिएटिविटी पर पड़ा असर

हालांकि, सुभाष घई मानते हैं कि इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत रचनात्मकता को चुकानी पड़ी है। उनका कहना है कि आज स्टूडियो सिस्टम और कॉरपोरेट सोच के कारण फिल्मों के क्रिएटिव फैसले अक्सर मार्केट और स्टार वैल्यू के हिसाब से लिए जाते हैं, न कि कहानी की जरूरत के मुताबिक। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि गड़बड़ी क्रिएटिविटी की तरफ हुई है और फिल्मकार के पास प्रयोग करने की गुंजाइश पहले जैसी नहीं रही।





‘परदेस’ से जुड़ा किस्सा

इस संदर्भ में सुभाष घई ने अपनी साल 1997 में रिलीज हुई फिल्म ‘परदेस’ से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि जब वह इस फिल्म की कहानी पर काम कर रहे थे, तो उन्होंने सबसे पहले माधुरी दीक्षित को कहानी सुनाई थी। माधुरी को कहानी पसंद भी आई और वह फिल्म करना चाहती थीं। इसके अलावा, फिल्म के दूसरे हीरो के तौर पर सलमान खान के नाम का सुझाव भी आया था।

घई के मुताबिक, उस समय उनके ऑफिस और टीम की सोच यह थी कि अगर फिल्म में शाह रुख खान, सलमान खान और माधुरी दीक्षित जैसे बड़े स्टार्स हों, तो प्रोजेक्ट बेहद मजबूत हो जाएगा। कॉरपोरेट नजरिए से यह एक परफेक्ट कास्ट मानी जाती।

नई सोच और कड़ा विरोध

लेकिन कहानी लिखने और उस पर गहराई से विचार करने के बाद सुभाष घई इस नतीजे पर पहुंचे कि ‘परदेस’ की कहानी में किसी नई लड़की का चेहरा होना चाहिए, न कि किसी बड़ी स्टार का। इसके साथ ही उन्होंने यह भी तय किया कि फिल्म के दूसरे हीरो के रूप में भी किसी नए चेहरे को लिया जाए।

उन्होंने बताया कि इस फैसले को लेकर उन्हें अपने ही ऑफिस में काफी विरोध झेलना पड़ा। घई ने कहा, “मैंने साफ कहा कि मुझे स्टार्स नहीं चाहिए। मेरे लिए स्टार्स में शाह रुख खान काफी हैं। बाकी फिल्म में नई लड़की और नया लड़का ही होना चाहिए।” आखिरकार, उन्होंने अपनी बात पर अड़े रहते हुए उसी तरह से फिल्म बनाई, जैसी वह चाहते थे।

रचनात्मक स्वतंत्रता का उदाहरण

सुभाष घई का मानना है कि यह फैसला केवल रचनात्मक स्वतंत्रता की वजह से ही संभव हो पाया। उन्होंने कहा कि अगर वह फिल्म किसी बड़े स्टूडियो या कॉरपोरेट सेटअप के साथ बना रहे होते, तो शायद उन्हें शाह रुख खान, सलमान खान और माधुरी दीक्षित के साथ ही फिल्म बनानी पड़ती। स्टूडियो सिस्टम में अक्सर जोखिम लेने से बचा जाता है और सुरक्षित विकल्प चुने जाते हैं।

आज के दौर पर सवाल

घई के इस अनुभव से यह साफ होता है कि कार्पोरेटाइजेशन ने जहां इंडस्ट्री को प्रोफेशनल बनाया है, वहीं फिल्मकारों के लिए स्वतंत्र प्रयोग करना मुश्किल भी हो गया है। उनका मानना है कि अगर फिल्मों को लंबे समय तक यादगार बनाना है, तो कहानी और किरदारों को स्टार पावर से ऊपर रखना होगा।


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