खंडाला के घर को लेकर शबाना-जावेद में होती थी तकरार, ‘अंकुर’ बनाम ‘शोले’ की दिलचस्प कहानी आई सामने
शबाना आजमी ने बताया कि शुरुआत में वह खंडाला में एक छोटा-सा वीकेंड कॉटेज बनाना चाहती थीं, जहां दोनों शहर की भागदौड़ से दूर कुछ सुकून के पल बिता सकें। लेकिन जावेद अख्तर की सोच कुछ और थी।

मुंबई। सपनों का घर बनाना हर किसी की ख्वाहिश होती है, लेकिन उसकी कल्पना और आकार को लेकर अक्सर परिवार के भीतर ही मतभेद उभर आते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ था अभिनेत्री शबाना आजमी और गीतकार-लेखक जावेद अख्तर के बीच, जब दोनों ने खंडाला में अपना घर बनाने का फैसला किया। हाल ही में इस घर से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा सामने आया, जिसमें ‘अंकुर’ और ‘शोले’ का जिक्र भी शामिल है। यह खुलासा फराह खान के कुकिंग शो के दौरान हुआ, जब वह अपने मौसा जावेद अख्तर के खंडाला स्थित घर पहुंचीं। शो में जावेद अख्तर और शबाना आजमी ने अपने घर के निर्माण से जुड़ी यादों को साझा किया।
कॉटेज बनाम आलीशान बंगला
शबाना आजमी ने बताया कि शुरुआत में वह खंडाला में एक छोटा-सा वीकेंड कॉटेज बनाना चाहती थीं, जहां दोनों शहर की भागदौड़ से दूर कुछ सुकून के पल बिता सकें। लेकिन जावेद अख्तर की सोच कुछ और थी। शबाना ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तो एक छोटा-सा कॉटेज बनाना चाह रही थी, लेकिन फिर मुझे पता चला कि यहां तो एक बड़ा-सा आलीशान बंगला बनाने की योजना चल रही है। बस फिर क्या था, हमारी रोज लड़ाई होने लगी।” घर के आकार और डिजाइन को लेकर दोनों के बीच लगातार मतभेद होते रहे। शबाना सादगी और सीमितता की पक्षधर थीं, जबकि जावेद कुछ भव्य और अलग सोच रहे थे।
‘अंकुर’ और ‘शोले’ का उदाहरण
इस बहस के बीच एक दिलचस्प मोड़ तब आया, जब जावेद अख्तर के करीबी मित्र फरहान मुजीब ने दोनों को एक अनोखी सलाह दी। शबाना के मुताबिक, “उन्होंने कहा—देखो, शबाना ‘अंकुर’ हो और जावेद ‘शोले’ हैं। दोनों का मिलाप नहीं हो सकता। अगर घर बनाना है तो ‘शोले’ बनाओ।” यह तुलना शबाना आजमी की चर्चित फिल्म ‘अंकुर’ और जावेद अख्तर द्वारा सलीम खान के साथ लिखी गई सुपरहिट फिल्म ‘शोले’ से की गई थी। एक ओर ‘अंकुर’ की सादगी और यथार्थवाद, तो दूसरी ओर ‘शोले’ की भव्यता और व्यापकता। शबाना ने बताया कि इस सलाह के बाद उन्होंने जावेद के निर्णय के आगे समर्पण कर दिया और आखिरकार खंडाला में एक भव्य बंगला बनकर तैयार हुआ।
संघर्ष के दिनों की यादें
घर की चर्चा के दौरान जावेद अख्तर ने अपने शुरुआती संघर्षों को भी याद किया। उन्होंने कहा, “करियर के शुरुआती दौर में मैं फुटपाथ पर सोया हूं। ऐसे में जब आज इस हवेली में सोकर उठता हूं, तो खुद से पूछता हूं—ये क्या हो रहा है?” उन्होंने आगे कहा कि सपने और कल्पनाएं अक्सर उन्हीं के पास होती हैं, जिनके पास कुछ नहीं होता। “जिनके पास कुछ होता है, वे इन चीजों की कल्पना नहीं करते। फंतासी उन्हीं की होती है, जिनके पास संसाधन नहीं होते,” जावेद ने कहा। उनके इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि खंडाला का यह घर सिर्फ एक आलीशान बंगला नहीं, बल्कि संघर्ष से सफलता तक की उनकी यात्रा का प्रतीक भी है।
परिवारिक रिश्तों की झलक
इस एपिसोड में परिवारिक रिश्तों की भी झलक देखने को मिली। जावेद अख्तर की पहली शादी लेखिका हनी ईरानी से हुई थी, जो फराह खान की मां मेनका ईरानी की बहन हैं। इस तरह फराह और जावेद के बीच पारिवारिक संबंध हैं, जो शो के दौरान सहज और आत्मीय माहौल में दिखाई दिए।
सपनों का घर, अलग-अलग नजरिया
यह किस्सा बताता है कि सपनों का घर बनाना केवल वास्तुशिल्प या डिजाइन का मामला नहीं होता, बल्कि इसमें व्यक्तित्व, जीवन दर्शन और अनुभवों की भी झलक होती है। जहां शबाना आजमी की सोच सादगी की ओर झुकी हुई थी, वहीं जावेद अख्तर के लिए यह घर उनके संघर्ष और उपलब्धियों का प्रतीक बन गया। अंततः खंडाला में बना यह आलीशान घर दोनों की साझी जिंदगी का हिस्सा है- एक ऐसा स्थान जहां कला, साहित्य और सिनेमा की कई यादें जुड़ी हैं।
संघर्ष से सफलता तक की कहानी
जावेद अख्तर और शबाना आजमी दोनों ही भारतीय सिनेमा और साहित्य के प्रमुख नाम हैं। उनके जीवन में संघर्ष, सफलता और रचनात्मकता का लंबा सफर शामिल है। खंडाला का यह घर उसी यात्रा का एक अध्याय है- जहां एक ओर ‘अंकुर’ की संवेदनशीलता है, तो दूसरी ओर ‘शोले’ की व्यापकता। इस दिलचस्प प्रसंग ने यह भी दिखाया कि मतभेदों के बावजूद संवाद और समझदारी से लिए गए फैसले किस तरह एक खूबसूरत नतीजे तक पहुंच सकते हैं।


