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‘आंखों देखी’ की कहानी 15 दिनों में हुई पूरी, रजत कपूर ने बताया कैसे पारिवारिक यादों ने दी फिल्म को नई पहचान

हाल ही में रजत कपूर ने इस फिल्म के निर्माण और लेखन से जुड़ी कई दिलचस्प बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि फिल्म का विचार उनके मन में कई वर्षों तक रहा, लेकिन पूरी पटकथा लिखने में उन्हें केवल 15 दिन लगे।

‘आंखों देखी’ की कहानी 15 दिनों में हुई पूरी, रजत कपूर ने बताया कैसे पारिवारिक यादों ने दी फिल्म को नई पहचान
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मुंबई: हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में समय के साथ और अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। वर्ष 2013 में रिलीज हुई निर्देशक रजत कपूर की फिल्म ‘आंखों देखी’ ऐसी ही फिल्मों में शामिल है। संजय मिश्रा, सीमा पाहवा और रजत कपूर जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म को अपनी अलग कहानी, संवेदनशील प्रस्तुति और जीवन दर्शन के कारण आज भी हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में गिना जाता है। हाल ही में रजत कपूर ने इस फिल्म के निर्माण और लेखन से जुड़ी कई दिलचस्प बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि फिल्म का विचार उनके मन में कई वर्षों तक रहा, लेकिन पूरी पटकथा लिखने में उन्हें केवल 15 दिन लगे।

कई वर्षों तक मन में पलता रहा विचार

रजत कपूर के अनुसार, किसी भी फिल्म का निर्माण केवल लेखन तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पीछे कई वर्षों की सोच और अनुभव होते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी अधिकांश फिल्मों को बनने में आठ से दस वर्ष तक का समय लग जाता है। उन्होंने कहा कि ‘आंखों देखी’ का मूल विचार लंबे समय से उनके मन में था, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि इस सोच को कहानी का रूप कैसे दिया जाए। यही कारण था कि यह विचार कई वर्षों तक उनके साथ बना रहा।

संयुक्त परिवार ने दी कहानी को नई दिशा

रजत कपूर ने बताया कि वर्ष 2011 में उन्हें अपने दादा के घर रहने वाले संयुक्त परिवार के बीच समय बिताने का अवसर मिला। वहीं से फिल्म की कहानी को नया आयाम मिला। उनके अनुसार, उस परिवार में उन्होंने रिश्तों की गर्माहट, भाई-भाई के मतभेद, चाचाओं का अपनापन, बेटी की शादी की तैयारियां और पारिवारिक जीवन के अनेक छोटे-बड़े पहलुओं को बहुत करीब से देखा। इन अनुभवों ने फिल्म के पात्रों और वातावरण को वास्तविक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

व्यक्तिगत यादों से जुड़े कई दृश्य

रजत कपूर ने बताया कि फिल्म में दिखाई गई कई जगहें और घटनाएं उनके निजी जीवन से प्रेरित थीं। उन्होंने कहा कि फिल्म में दिखाई गई धर्मशाला वही स्थान है, जहां वास्तविक जीवन में उनकी बुआ की शादी हुई थी। उनका मानना है कि जब किसी कहानी में व्यक्तिगत अनुभव और भावनाएं शामिल होती हैं तो वह दर्शकों से अधिक गहराई से जुड़ पाती है। यही वजह है कि ‘आंखों देखी’ के कई दृश्य बेहद स्वाभाविक और वास्तविक महसूस होते हैं।

सिर्फ 15 दिनों में पूरी हुई पटकथा

निर्देशक के अनुसार, संयुक्त परिवार की अवधारणा स्पष्ट होते ही फिल्म की कहानी तेजी से आगे बढ़ी। उन्होंने बताया कि इसके बाद पूरी पटकथा मात्र 15 दिनों में तैयार हो गई। रजत कपूर का कहना है कि कई बार वर्षों तक चलने वाली सोच एक सही दिशा मिलने के बाद बहुत कम समय में आकार ले लेती है। ‘आंखों देखी’ का लेखन भी इसी प्रक्रिया का परिणाम था।

निर्देशक के रूप में अलग पहचान

रजत कपूर लंबे समय से हिंदी सिनेमा में प्रयोगधर्मी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। ‘आंखों देखी’ से पहले उन्होंने ‘प्राइवेट डिटेक्टिव: टू प्लस टू प्लस वन’, ‘रघु रोमियो’, ‘मिक्स डबल्स’ और ‘मिथ्या’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया था। उनकी फिल्मों की विशेषता यह रही है कि वे आम जीवन, मानवीय रिश्तों और सामाजिक विषयों को सरल लेकिन प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर प्रस्तुत करते हैं। ‘आंखों देखी’ को भी इसी कारण उनकी सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिना जाता है।

‘आरके/आरके’ को नहीं मिला डिजिटल मंच

रजत कपूर ने अपनी वर्ष 2021 में रिलीज हुई फिल्म ‘आरके/आरके’ का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस फिल्म को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया। उनके अनुसार, फिल्म के लिए कोई ओटीटी खरीदार नहीं मिला, जिससे उसके दर्शकों तक व्यापक पहुंच बनाने में कठिनाई हुई। उन्होंने इस अनुभव को फिल्म निर्माण की व्यावसायिक चुनौतियों का हिस्सा बताया।

अनुभवों से जन्म लेती हैं यादगार फिल्में

रजत कपूर का मानना है कि एक अच्छी फिल्म केवल कल्पना से नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक अनुभवों से बनती है। ‘आंखों देखी’ इसका उदाहरण है, जहां व्यक्तिगत यादों, संयुक्त परिवार की संस्कृति और जीवन के सामान्य अनुभवों ने मिलकर एक ऐसी कहानी को जन्म दिया, जिसे आज भी दर्शक और समीक्षक समान रूप से सराहते हैं।


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