12 साल बाद रंगमंच पर लौटे पंकज त्रिपाठी, बेटी आशी के साथ ‘ला इलाज’ का मंचन, दिया ‘नो मीन्स नो’ का संदेश
मंच पर पंकज त्रिपाठी और उनकी बेटी आशी की केमिस्ट्री ने दर्शकों को प्रभावित किया। एक ओर जहां नाटक की शुरुआत ने हास्य के क्षणों से सभागार में ठहाके गूंजाए, वहीं कहानी के गंभीर मोड़ पर दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ते चले गए।

नई दिल्ली। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने करीब 12 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद रंगमंच पर दमदार वापसी की है। भारत रंग महोत्सव के अवसर पर शनिवार को मंडी हाउस स्थित कमानी सभागार में उन्होंने अपनी बेटी आशी त्रिपाठी के साथ नाटक ‘ला इलाज’ का मंचन किया। इस प्रस्तुति ने न केवल दर्शकों को भावुक किया, बल्कि समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश भी दिया—‘नो मीन्स नो’ (ना का मतलब ना)।
पिता-पुत्री की जुगलबंदी ने जीता दिल
मंच पर पंकज त्रिपाठी और उनकी बेटी आशी की केमिस्ट्री ने दर्शकों को प्रभावित किया। एक ओर जहां नाटक की शुरुआत ने हास्य के क्षणों से सभागार में ठहाके गूंजाए, वहीं कहानी के गंभीर मोड़ पर दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ते चले गए। पंकज ने कहा कि आशी के साथ मंच साझा करना एक पिता के रूप में सिखाने का प्रयास नहीं, बल्कि दो कलाकारों के रूप में साथ बढ़ने की प्रक्रिया है। उनके मुताबिक थिएटर वह माध्यम है जो कलाकार को धैर्य, अनुशासन और कला के प्रति सम्मान सिखाता है।
प्रेम, जुनून और आत्मसम्मान की कहानी
निर्देशक फैज मोहम्मद खान के निर्देशन में प्रस्तुत नाटक ‘ला इलाज’ प्रेम, जुनून और आत्मसम्मान की गहरी पड़ताल करता है। कहानी एक स्थानीय बैंड पार्टी और बस्ती के परिवेश में बुनी गई है। नाटक का केंद्रीय संदेश स्पष्ट है—जबरन किया गया प्रेम कभी सार्थक नहीं हो सकता। ‘नो मीन्स नो’ की अवधारणा को बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। कहानी स्त्री की स्वतंत्रता, उसकी इच्छा और आत्मसम्मान के सवालों को केंद्र में रखती है। अंत में यह संदेश दिया गया कि एक स्त्री सहने के लिए नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से जीवन के फैसले लेने के लिए जन्मी है।
संगीत और लोक कला का प्रभावी प्रयोग
प्रस्तुति में संगीत, ढोलक की थाप और स्थानीय लोक कलाओं का प्रयोग किया गया। इन तत्वों ने नाटक को जीवंत बनाया और संदेश को दर्शकों तक सहज रूप से पहुंचाया। पंकज त्रिपाठी और उनकी टीम ने लोक-संस्कृति की जड़ों से जुड़े माध्यमों के जरिए सामाजिक मुद्दों को मंच पर उतारा, जिससे प्रस्तुति का प्रभाव और गहरा हो गया।
जड़ों की ओर लौटने का भावनात्मक सफर
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के सुल्तान कुरैशी और ‘मिर्जापुर’ के कालीन भैया जैसे यादगार किरदारों से लोकप्रियता हासिल करने वाले पंकज त्रिपाठी के लिए यह वापसी केवल एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि जड़ों की ओर लौटने का भावनात्मक सफर है। उन्होंने स्वीकार किया कि फिल्मों और वेब सीरीज की व्यस्तता तथा आर्थिक स्थिरता की तलाश में वे लंबे समय तक थिएटर से दूर रहे। उनका मानना है कि सिनेमा ने उन्हें शोहरत और पहचान दी, लेकिन रंगमंच वह स्थान है जो कलाकार को विनम्र और ईमानदार बनाए रखता है।
रूपकथा रंगमंच की स्थापना
पंकज त्रिपाठी ने अपनी पत्नी मृदुला त्रिपाठी के साथ मिलकर ‘रूपकथा रंगमंच’ की स्थापना की है। ‘ला इलाज’ इसी बैनर के तहत प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “रूपकथा रंगमंच मेरा और मेरी पत्नी का साझा विचार था। हमारी जिंदगी की शुरुआत भी थिएटर से हुई थी और हमारे प्रेम की नींव भी रंगमंच ही रहा।” उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली, पटना और कोलकाता जैसे शहरों में रहते हुए थिएटर ही उनका सहारा था। आज जो पहचान उन्हें बड़े पर्दे पर मिली है, उसकी नींव रंगमंच ने ही रखी।
“मंच से काफी कुछ मिला, उसे लौटाने आया हूं”
पंकज त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में कहा, “जब रंगमंच से हमें इतना कुछ मिला है, तो हमारा दायित्व है कि हम भी कुछ लौटाएं। यह थिएटर को हमारी तरफ से एक रिटर्न गिफ्ट है।” उन्होंने यह भी बताया कि साहित्य, खासकर फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां और ‘राग दरबारी’ जैसे उपन्यासों ने उनके अभिनय दृष्टिकोण को गहराई दी है। उनके अनुसार, उनके अभिनय में आज भी थिएटर की खुशबू है और यही उनकी असली पहचान है।
आशी के लिए सीखने का मंच
पंकज के लिए यह मंचन उनकी बेटी आशी के अभिनय सफर की शुरुआत का महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। उन्होंने कहा कि थिएटर आशी को धैर्य, अनुशासन और कला के प्रति सम्मान सिखाएगा। मंच पर लाइव प्रदर्शन कलाकार को त्वरित प्रतिक्रिया और आत्ममंथन का अवसर देता है, जो किसी भी अभिनेता के विकास के लिए जरूरी है।
दर्शकों की प्रतिक्रिया
कमानी सभागार में उपस्थित दर्शकों ने प्रस्तुति को सराहा। नाटक के सामाजिक संदेश और पिता-पुत्री की प्रस्तुति ने विशेष प्रभाव छोड़ा। रंगमंच प्रेमियों के लिए यह प्रस्तुति एक यादगार अनुभव रही, जहां मनोरंजन और सामाजिक चेतना का संतुलन देखने को मिला।
कला के प्रति समर्पण
करीब एक दशक बाद रंगमंच पर पंकज त्रिपाठी की वापसी केवल एक अभिनेता की वापसी नहीं, बल्कि कला के प्रति उनके समर्पण का प्रमाण है। ‘ला इलाज’ के माध्यम से उन्होंने न केवल ‘नो मीन्स नो’ जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश को मंच पर उतारा, बल्कि यह भी दिखाया कि सिनेमा की चमक-दमक के बीच रंगमंच की आत्मा आज भी जीवित है। पिता-पुत्री की इस प्रस्तुति ने यह साबित किया कि थिएटर केवल अभिनय का माध्यम नहीं, बल्कि विचार और संवेदना का मंच भी है, जहां से समाज को आईना दिखाया जा सकता है।


