गोविदा को हीरो बनाने में प्रोड्यूसर पहलाज निहलानी का था अहम योगदान, बनाई थी कई ब्लॉकब्स्टर फिल्में
सूत्रों के अनुसार पहलाज निहलानी काफी समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। हालत बिगड़ने पर उन्हें नानावटी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था। हालांकि, कुछ दिनों बाद उन्हें घर लाया गया, जहां उनकी स्थिति लगातार कमजोर होती गई और अंततः उनका निधन हो गया।

मुंबई : Pahlaj निहलानी Death: हिंदी सिनेमा के मशहूर फिल्म निर्माता और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी का 76 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। उनके निधन की पुष्टि उनके पूर्व सहयोगी शशि शेखर ने की। बताया जा रहा है कि लंबे समय से बीमार चल रहे निहलानी ने मुंबई के विलेपार्ले स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। कुछ दिन पहले ही उन्हें नानावटी अस्पताल से छुट्टी देकर घर लाया गया था, जहां वे लगातार उपचाराधीन थे। उनके निधन की खबर सामने आते ही फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई और कई फिल्मी हस्तियों तथा करीबी सहयोगियों ने दुख व्यक्त किया।
बीमारी से लंबे समय से जूझ रहे थे निहलानी
सूत्रों के अनुसार पहलाज निहलानी काफी समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। हालत बिगड़ने पर उन्हें नानावटी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था। हालांकि, कुछ दिनों बाद उन्हें घर लाया गया, जहां उनकी स्थिति लगातार कमजोर होती गई और अंततः उनका निधन हो गया।
80-90 के दशक में बॉक्स ऑफिस के बड़े नाम
पहलाज निहलानी का नाम हिंदी सिनेमा के उस दौर से जुड़ा है जब कमर्शियल फिल्मों का बोलबाला था। 80 और 90 के दशक में उन्होंने एक के बाद एक कई सफल और लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण किया। उनकी डेब्यू फिल्म हाथकड़ी (1982) में संजय दत्त और रेखा थे। इसके बाद इल्जाम (1986) आई, जिसमें गोविंदा को पहली बार हीरो बनने का मौका मिला। इसने गोविंदा को स्टार बना दिया। शोला और शबनम (1992) गोविंदा और दिव्या भारती के साथ सुपरहिट रही। 1993 में रिलीज हुई गोविंदा और चंकी पांडे स्टारर फिल्म ‘आंखें’ उनके करियर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की और उस दौर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हो गई।
फिल्म ट्रेड एक्सपर्ट और पहलाज निहलानी को काफी करीब से जानने वाले अतुल मोहन ने बताया, 'उस समय ये कहा जाता था कि पहलाजजी जिससे हाथ मिला लें, उसकी किस्मत बदल जाती है! इस तरह का उनका ऑरा था।' अतुल मोहन ने उन्हें इंडस्ट्री का ट्रू लीडर बताया और कहा कि उन्होंने प्रोड्यूसर्स के हकों के लिए खूब लड़ाई लड़ी और उन्हें सम्मान दिलाया।
गोविंदा के करियर में अहम भूमिका
पहलाज निहलानी को गोविंदा के शुरुआती करियर को स्थापित करने में अहम योगदान के लिए भी जाना जाता है। गोविंदा की पहली फिल्म ‘लव 86’ थी, लेकिन बतौर लीड एक्टर उनकी पहचान ‘इल्जाम’ से बनी, जिसे निहलानी ने ही प्रोड्यूस किया था। यह फिल्म सुपरहिट रही और गोविंदा को स्टारडम दिलाने में महत्वपूर्ण साबित हुई।
CBFC अध्यक्ष के रूप में विवादित कार्यकाल
फिल्म निर्माण के अलावा पहलाज निहलानी अपने कार्यकाल के दौरान केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के अध्यक्ष के रूप में भी चर्चा में रहे। 2015 से 2017 तक इस पद पर रहते हुए उनका कार्यकाल काफी विवादों से घिरा रहा। इस दौरान फिल्मों पर सख्त सेंसरशिप और कई दृश्यों को हटाने के फैसलों को लेकर वे लगातार सुर्खियों में रहे। खासकर ‘उड़ता पंजाब’, ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ और जेम्स बॉन्ड फिल्म ‘स्पेक्ट्र’ को लेकर हुए विवादों ने फिल्म इंडस्ट्री और उनके बीच तनाव को बढ़ा दिया था। उनकी नीतियों को लेकर फिल्म निर्माताओं में असंतोष भी देखा गया, हालांकि वे अपने फैसलों पर अडिग रहे।
प्रोड्यूसर्स के अधिकारों के लिए लंबा योगदान
पहलाज निहलानी लगभग तीन दशकों तक ‘एसोसिएशन ऑफ मोशन पिक्चर एंड टीवी प्रोग्राम प्रोड्यूसर्स’ के अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने फिल्म और टेलीविजन जगत के निर्माताओं के अधिकारों और हितों के लिए काम किया। उन्हें इंडस्ट्री के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने वाले व्यक्तियों में गिना जाता है।
स्वास्थ्य से जुड़ा पुराना किस्सा
करीब पांच साल पहले भी पहलाज निहलानी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। उस समय उन्हें क्रोनिक फूड पॉइजनिंग के कारण गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। बताया जाता है कि उस दौरान उन्हें खून की उल्टियां हुई थीं और वे लगभग 5–6 दिनों तक आईसीयू में रहे थे। उस समय उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया था कि केवल अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ही उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे थे।
हिंदी सिनेमा में एक युग का अंत
पहलाज निहलानी के निधन के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने एक ऐसे निर्माता को खो दिया है, जिसने न केवल बॉक्स ऑफिस पर कई यादगार फिल्में दीं, बल्कि इंडस्ट्री के संगठनात्मक और प्रशासनिक ढांचे में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जाना हिंदी सिनेमा के एक पूरे दौर के अंत के रूप में देखा जा रहा है।


