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कैसी होली खेलना पसंद है, बिहार से मुंबई तक के सफर के बारे में अभिनेता अविनाश तिवारी ने बताया

अविनाश अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं कि गांव में मनाई गई होली की तस्वीरें आज भी उनके मन में बसी हैं। वे बताते हैं, मुझे धुंधली-सी याद है कि हम कीचड़ में होली खेलते थे। मिट्टी में पानी डालकर पूरे गांव के बच्चे और बड़े एक साथ रंगों में सराबोर हो जाते थे।

कैसी होली खेलना पसंद है,  बिहार से मुंबई तक के सफर के बारे में अभिनेता अविनाश तिवारी ने बताया
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मुंबई। Holi 2026: फिल्म ‘ओ रोमियो’ से चर्चा में आए अभिनेता अविनाश तिवारी (Actor Avinash Tiwari) मानते हैं कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों, दोस्ती और साझा खुशियों का उत्सव है। बिहार के गोपालगंज से ताल्लुक रखने वाले अविनाश की स्मृतियों में गांव की मिट्टी से सनी होली आज भी उतनी ही ताजा है, जितनी बचपन में थी। अभिनय की दुनिया में कदम रखने के बाद भले ही उनकी होली का अंदाज थोड़ा संयमित हुआ हो, लेकिन रंगों के प्रति उनका उत्साह और अपनापन अब भी कायम है। होली के अवसर पर अविनाश ने अपने बचपन की शरारतों, कैमरों के दौर में त्योहार मनाने की चुनौतियों और जिंदगी के प्रति अपने नजरिये पर खुलकर बात की।

गांव की गलियों से मुंबई के सरकारी क्वार्टर्स तक

अविनाश अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं कि गांव में मनाई गई होली की तस्वीरें आज भी उनके मन में बसी हैं। वे बताते हैं, मुझे धुंधली-सी याद है कि हम कीचड़ में होली खेलते थे। मिट्टी में पानी डालकर पूरे गांव के बच्चे और बड़े एक साथ रंगों में सराबोर हो जाते थे। घर-घर जाकर सबको रंग लगाते थे। वह अपनापन आज भी याद आता है। बाद में जब उनका परिवार मुंबई आ गया और वे सरकारी क्वार्टर्स में रहने लगे, तो वहां भी होली का माहौल कम नहीं था। बिहार और उत्तर प्रदेश के परिवारों की बड़ी संख्या के कारण त्योहार का उत्साह वैसा ही बना रहता। अविनाश मुस्कुराते हुए कहते हैं, घर पर मेहमानों का तांता लगा रहता था। मम्मी तरह-तरह के पकवान बनाती थीं। हमारे लिए तो होली एक मिशन की तरह होती थी। दो दिन पहले से रंग भरे गुब्बारे तैयार किए जाते थे। बिल्डिंग की ‘टीम’ बनती थी और दूसरी बिल्डिंग के बच्चों से रंगों की जंग छिड़ जाती थी।

“अब वो बेफिक्री नहीं रही”

जब उनसे पूछा गया कि आज की होली में क्या कमी महसूस होती है, तो वे साफ कहते हैं- “अब वो बेफिक्री नहीं रही।” अभिनेता बनने के बाद जिंदगी में आए बदलाव का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, “पहले आप खुलकर मस्ती कर सकते थे। अब हर जगह कैमरा लगा है। पता नहीं कौन-सी बात पर कौन कैसी प्रतिक्रिया दे दे। इसलिए थोड़ा सतर्क रहना पड़ता है।” इसके बावजूद होली उनका सबसे पसंदीदा त्योहार है। वे बताते हैं कि इस दिन अमिताभ बच्चन के गाने ‘रंग बरसे’ और ‘होरी खेले रघुवीरा’ जरूर बजते हैं। वे हंसते हुए कहते हैं, बच्चन साहब के ये गाने बज जाएं तो समझिए होली पूरी हुई।

बचपन की शरारत और ‘धुलाई’ की याद

होली की शरारतों का जिक्र आते ही अविनाश ठहाका लगाते हैं। वे बताते हैं कि एक बार शाम को नए कपड़े पहनकर उन्होंने बालकनी से पिचकारी चलानी शुरू कर दी। वे हंसते हुए याद करते हैं, रंग वापस मेरे कपड़ों पर ही आ गया। फिर मैंने सोचा खुद पर रंग डाल देता हूं और घर में बोल दूंगा कि किसी और ने रंग दिया है। लेकिन तभी मम्मी-पापा आ गए। उसके बाद जो मेरी धुलाई हुई। उनके मुताबिक, सुबह कीचड़ और रंगों से खेलना और शाम को नए कपड़े पहनकर अबीर लगाना, यह बचपन की होली का तय कार्यक्रम था।

स्टारडम और अकेली होली का दौर

अभिनेता बनने के बाद कुछ साल ऐसे भी आए जब होली का रंग फीका पड़ गया। वे स्वीकार करते हैं, हम दोस्तों के साथ कहीं और होली खेलने जाते थे, पर वहां लोग किसी और जगह जा चुके होते थे। बिल्डिंग में खेलना नहीं चाहता था, क्योंकि लगता था कि अब कुछ ‘बड़ा’ करना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि गाड़ी में घूमते रह जाते थे। बहुत अकेलापन महसूस होता था। कई वर्षों तक ऐसा ही चलता रहा, लेकिन फिर उन्होंने फैसला लिया कि त्योहार दिखावे के लिए नहीं, अपने लोगों के साथ मनाया जाना चाहिए। वे बताते हैं, चार-पांच साल बाद हमने तय किया कि अब दोस्तों के साथ ही होली मनाएंगे। एक दोस्त के स्टूडियो में होली शुरू की। अब अपने बांद्रा वाले घर की छत पर सबको बुला लेता हूं। वहां जमकर रंग खेलते हैं। वे हंसते हुए जोड़ते हैं, “भांग भी रहती है, लेकिन सीमित मात्रा में।”

इंटरनेट मीडिया और ‘परफेक्ट तस्वीर’ का दबाव

आज के दौर में त्योहारों का एक बड़ा हिस्सा इंटरनेट मीडिया पर दिखाई देता है। क्या उन पर तस्वीरें पोस्ट करने का दबाव रहता है? अविनाश इस सवाल पर स्पष्ट कहते हैं, “मैं थोड़ा प्राइवेट इंसान हूं। पहली कक्षा से चले आ रहे चार करीबी दोस्त हैं। उन्हें देखने में किसी की खास दिलचस्पी नहीं होती। अगर मुझ पर रंग अच्छे लग रहे हैं तो एक तस्वीर डाल देता हूं, वरना नहीं।” वे मानते हैं कि आजकल लोग पोस्ट करने से पहले बहुत सोचते हैं, लेकिन उन्हें दिखावे की जरूरत महसूस नहीं होती। “मुझे अभी तक लगा नहीं कि सोशल मीडिया पर सब कुछ दिखाना जरूरी है,” वे कहते हैं।

गिले-शिकवे और रिश्तों की अहमियत

होली को अक्सर मनमुटाव दूर करने का पर्व कहा जाता है। क्या उनके जीवन में भी ऐसा हुआ? अविनाश कहते हैं, “जो लोग आज भी साथ हैं, उनके साथ डेढ़ मिनट से ज्यादा कोई मनमुटाव टिकता ही नहीं। अगर कुछ चुभता है तो मैं सामने से कह देता हूं। लड़ाई हो जाए, आंसू निकल आएं, लेकिन बात दिल में नहीं रखता।” वे बताते हैं, वे मानते हैं कि रिश्तों को बचाए रखने के लिए संवाद जरूरी है। “अगर कोई शख्स मेरे लिए अहम है तो उसे खुद से दूर नहीं जाने देता।



“आपकी झोली छलके, मेरी भी भर जाए”

जब उनसे पूछा गया कि अगर इंडस्ट्री के लोगों को कोई रंग और संदेश भेजना हो तो क्या कहेंगे, तो उनका जवाब बेहद सरल और सकारात्मक था। वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, हैप्पी होली से ज्यादा मैं क्या कहूं? बस यही कि मेरे जितने दोस्त हैं, वे ताउम्र खुश रहें। उनकी झोली में इतना गिरे कि छलक कर मेरी झोली भी भर जाए। उनका मानना है कि खुशी एकमात्र ऐसी चीज है, जो बांटने से बढ़ती है। वे कहते हैं, अगर आसपास कोई नाखुश होता है तो मैं उससे प्रभावित हो जाता हूं। मेरे आसपास लोग खुश रहें, वही मेरी खुशी है।

रंगों से आगे का संदेश

अविनाश तिवारी की बातों में बार-बार एक बात उभरकर सामने आती है- त्योहार का असली अर्थ लोगों के साथ होना है। गांव की कीचड़ भरी होली से लेकर बांद्रा की छत पर दोस्तों के साथ मनाए जाने वाले रंगोत्सव तक, उनकी यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, भावनात्मक भी है। स्टारडम के बावजूद उन्होंने यह महसूस किया कि दिखावे से ज्यादा मायने रखता है अपनापन। होली के बहाने वे यह भी याद दिलाते हैं कि रिश्तों में संवाद और सच्चाई जरूरी है। गिले-शिकवे मन में रखने से बेहतर है कि उन्हें उसी वक्त सुलझा लिया जाए। अविनाश के शब्दों में, खुशी जितनी बांटो, उतनी ही बढ़ती है। रंगों के इस त्योहार पर उनका यही संदेश है- अपनों के साथ रहिए, मनमुटाव मिटाइए और जीवन में ऐसे रंग भरिए, जो केवल चेहरे पर नहीं, दिलों में भी दिखें।


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