Top
Begin typing your search above and press return to search.

भारतीय सिनेमा को लेकर अभिषेक बच्चन ने कहा, हमें अपनी जड़ों से ईमानदार रहना होगा

हाल ही में एक इंटरव्यू में अभिषेक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय फिल्म उद्योग को अपनी ताकत पहचाननी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि आंकड़ों के आधार पर भारत दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, इसलिए खुद को किसी अन्य सिनेमा के पैमाने से आंकना उचित नहीं।

भारतीय सिनेमा को लेकर अभिषेक बच्चन  ने कहा, हमें अपनी जड़ों से ईमानदार रहना होगा
X
मुंबई। भारतीय फिल्मों की तुलना अक्सर हॉलिवुड प्रोजेक्ट्स से की जाती है और यह सवाल उठता है कि हम ‘उन जैसी’ फिल्में कब बनाएंगे। अभिनेता अभिषेक बच्चन का मानना है कि यह सवाल ही गलत दिशा में ले जाता है। उनके अनुसार भारतीय सिनेमा को किसी और इंडस्ट्री की नकल करने की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, मूल्यों और विशिष्टताओं को और मजबूती से प्रस्तुत करने की जरूरत है। हाल ही में एक इंटरव्यू में अभिषेक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय फिल्म उद्योग को अपनी ताकत पहचाननी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि आंकड़ों के आधार पर भारत दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है, इसलिए खुद को किसी अन्य सिनेमा के पैमाने से आंकना उचित नहीं।

“हम दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री हैं”


अभिषेक बच्चन ने कहा, “हम दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री हैं। मैं यह बात सिर्फ अहंकार में नहीं कह रहा, बल्कि डाटा इसके समर्थन में है।” उन्होंने बताया कि भारत में हर साल लगभग एक हजार फिल्में बनती हैं। इसके अलावा वेब सीरीज और ओटीटी फिल्मों जैसे अनगिनत स्ट्रीमिंग प्रोडक्ट्स का निर्माण भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश होने के कारण भारतीय सिनेमा का दर्शक वर्ग भी अत्यंत विशाल है। अभिषेक के अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर काम करने वाली इंडस्ट्री के लिए यह कहना कि “हम फलां इंडस्ट्री जैसे कब बनेंगे” या “हम स्क्विड गेम जैसा शो कब बनाएंगे”, सही सोच नहीं है। उनका मानना है कि हर देश और संस्कृति की अपनी अलग पहचान होती है, और उसी पहचान में उसकी असली ताकत छिपी होती है।

नकल नहीं, मौलिकता ही पहचान


हॉलिवुड या कोरियन कंटेंट से तुलना पर प्रतिक्रिया देते हुए अभिषेक ने कहा कि भारतीय सिनेमा को किसी और की शैली अपनाने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “हम धुरंधर जैसी फिल्में बनाते हैं। उनके आंकड़े देखिए, वे किसी भी दूसरी फिल्म को फीका कर सकते हैं।” उनका मानना है कि कला और सिनेमा का सबसे महत्वपूर्ण तत्व ईमानदारी है। यदि कोई फिल्म अपनी जड़ों और मूल्यों से समझौता करती है, तो वह अपनी आत्मा खो देती है। अभिषेक के शब्दों में, “जिस पल हम अपने भारतीय मूल्यों के साथ समझौता करते हैं, हम वहीं हार जाते हैं।”

भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता


अभिषेक बच्चन ने फिल्म ‘आरआरआर’ का उदाहरण देते हुए कहा कि पश्चिमी देशों में इस फिल्म को इसलिए सराहा गया क्योंकि इसमें भारतीय संस्कृति और भावनाओं को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वही कंटेंट सफल होता है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हो। उन्होंने कहा कि दुनिया को भारतीय सिनेमा का मेलोड्रामा, भावनात्मक गहराई और ‘पोएटिक जस्टिस’ जैसे तत्व अलग पहचान देते हैं। ‘पोएटिक जस्टिस’ का जिक्र करते हुए अभिषेक ने बताया कि भारतीय फिल्मों में अक्सर अंत में पात्रों को उनके कर्मों का फल मिलता है। यह शैली भारतीय दर्शकों के साथ-साथ वैश्विक दर्शकों को भी आकर्षित करती है, क्योंकि इसमें नैतिकता और भावनात्मक संतुलन का स्पष्ट संदेश होता है।

मेलोड्रामा और भावनाएं हैं हमारी ताकत


भारतीय सिनेमा की खासियतों पर बात करते हुए अभिषेक ने कहा कि हमें अपने सिनेमा के मेलोड्रामा, गीत-संगीत, पारिवारिक मूल्यों और भावनात्मक प्रस्तुति को अपनाने में संकोच नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यही तत्व हमें अन्य फिल्म उद्योगों से अलग बनाते हैं। यदि हम इन्हें छोड़कर किसी और शैली की नकल करने की कोशिश करेंगे, तो हमारी विशिष्ट पहचान धुंधली पड़ जाएगी। उनका मानना है कि वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने का सही तरीका यह नहीं है कि हम किसी दूसरे की तरह बनने की कोशिश करें, बल्कि यह है कि हम अपनी मौलिकता को और निखारें और उसे दुनिया के सामने आत्मविश्वास के साथ रखें।

परिवार से मिलती है प्रेरणा


इंटरव्यू के दौरान अभिषेक बच्चन ने अपने जीवन की प्रेरणाओं पर भी बात की। उन्होंने अपने पिता, हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन, को अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा बताया। अभिषेक ने कहा कि उनके पिता का अनुशासन, मेहनत और अपने काम के प्रति समर्पण उन्हें लगातार प्रेरित करता है। साथ ही उन्होंने अपनी बेटी आराध्या का भी जिक्र किया और कहा कि वह उनके लिए नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच का स्रोत हैं। उनके अनुसार, परिवार से मिलने वाला समर्थन और प्रेरणा ही उन्हें अपने काम में बेहतर करने के लिए उत्साहित करती है।

आत्मविश्वास से आगे बढ़ने का संदेश


अभिषेक बच्चन का मानना है कि भारतीय सिनेमा को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें अपनी ताकत पहचाननी होगी और यह स्वीकार करना होगा कि हमारी कहानियां, हमारे मूल्य और हमारी प्रस्तुति शैली ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वैश्विक सफलता के लिए किसी और की राह अपनाने की आवश्यकता नहीं है। यदि भारतीय फिल्में अपनी जड़ों से जुड़ी रहें और ईमानदारी से अपनी संस्कृति को प्रस्तुत करें, तो वे दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं। अभिषेक का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय सिनेमा अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। ऐसे में उनका संदेश स्पष्ट है—हमें किसी और जैसा बनने की नहीं, बल्कि अपने जैसा बनने की जरूरत है। ‘पोएटिक जस्टिस’ का जिक्र करते हुए अभिषेक ने बताया कि भारतीय फिल्मों में अक्सर अंत में पात्रों को उनके कर्मों का फल मिलता है। यह शैली भारतीय दर्शकों के साथ-साथ वैश्विक दर्शकों को भी आकर्षित करती है, क्योंकि इसमें नैतिकता और भावनात्मक संतुलन का स्पष्ट संदेश होता है।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it