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एसआईआर के विरोध में चौतरफा आंदोलन

राहुल गांधी ने चार महीने पहले मई में कहा था कि मोदी सरकार एक साल के भीतर गिर जाएगी।

एसआईआर के विरोध में चौतरफा आंदोलन
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राहुल गांधी ने चार महीने पहले मई में कहा था कि मोदी सरकार एक साल के भीतर गिर जाएगी। तब उनके बयान का खूब मजाक भाजपा ने बनाया था, क्योंकि उस समय भाजपा ने बंगाल, असम चुनावों में बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन राहुल गांधी ये कहते रहे कि उन्हें सिस्टम के अंदर से खबरें मिल रही हैं, जो मोदी सरकार के खिलाफ हैं। फिर 30 सितंबर को भी राहुल गांधी ने कहा कि बहुत जल्द देश में बड़ा बदलाव देखने मिलेगा। एक बार फिर राहुल की बात पर भाजपा ने खिल्ली उड़ाई, लेकिन दिल्ली से लेकर मुंबई और पूरे देश में जिस तरह मोदी सरकार के खिलाफ अपना विरोध जनता दिखा रही है, उसके बाद राहुल गांधी की बात ही सच होती दिख रही है। एसआईआर के मुद्दे पर ज्ञानेश कुमार को बचाने की जितनी कोशिश नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं, उतना ज्यादा उनकी सरकार के गिरने का खतरा बढ़ रहा है।

इंडिया गठबंधन ने 30 सितंबर की बैठक में ऐलान किया था कि देश भर में वोट चोरी के मुद्दे पर मोर्चा खोला जाएगा, इसके अलावा कॉकरोच जनता पार्टी ने भी मुंबई में 2 अक्टूबर को प्रदर्शन किया और 10 अक्टूबर से फिर से जंतर-मंतर पर बैठने की चेतावनी दी है, अभिजित दिपके ने तो साफ कहा है कि पुलिस उन्हें जहां रोकेगी, वहीं जंतर-मंतर बन जाएगा। इधर नागरिक समाज की तरफ से भी मोदी सरकार के खिलाफ विरोध तेज हो चुका है। शुक्रवार को गांधी जयंती पर नेहा बोरा, योगेन्द्र यादव, मनोज झा, संजय सिंह जैसे तमाम लोगों को पुलिस ने रोका, घसीटा, हाथों से उन पर वार किया, लेकिन उन्हें और उनके साथ खड़े हो चुके युवाओं को पुलिस नहीं रोक पाई। शनिवार को फिर जंतर-मंतर पर जबरदस्त प्रदर्शन देखने मिला।

2024 से पहले का वक्त होता तो ऐसी चुनौतियों को मोदी-शाह हवा में उड़ा सकते थे, लेकिन इस बार मामला संगीन हो गया है। एक के बाद एक आंदोलन, धरने और प्रदर्शन चल ही रहे हैं। यह सब राहत दे रहे हैं कि देश में लोकतंत्र को बचाने के लिए अब जनता ही उठ खड़ी हुई है। ज्ञानेश कुमार के कारण चुनाव आयोग की साख तो पूरी तरह मिट्टी में मिल ही चुकी है, खुद उनकी अपनी साख भी हमेशा के लिए बर्बाद हो गई है। अब से पहले कभी देश में चुनाव आयुक्त के पद पर बैठे व्यक्ति के लिए गद्दार, चोर, देशद्रोही जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया। चुनाव में गड़बड़ियों के आरोप कई बार लगे, विरोधी पार्टियों ने दबंगई करने, बूथ कब्जा करने जैसे गंभीर आरोप भी एक दूसरे पर लगाए, लेकिन आरोपों का कीचड़ चुनाव आयोग पर कभी नहीं उछला। लेकिन मोदी-शाह और ज्ञानेश कुमार ने तो खुद को कीचड़ में सना दिया है। अब जनता जब इस कालिख पर ऊंगली उठा रही है तो चुनाव आयोग अपने फैसलों को पलट रहा है, मगर अब देर हो चुकी है।

पूरे देश में एसआईआर रोकने की मांग तेज हो चुकी है और अपना वोट कटने से नाराज लाखों लोग सड़कों पर उतर गए हैं तो अब चुनाव आयोग अपने फैसलों को पलट रहा है। चुनाव आयोग ने निर्देश दिया है कि मतदाता सूची में छूट गए लोगों और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं या युवा मतदाताओं का पंजीकरण करने के लिए एक विशेष अभियान चलाया जाए। यानी पहले नाम काटे गए और अब जुड़वाने की कवायद आयोग करवा रहा है। इधर दिल्ली में चुनाव आयोग ने निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों यानी ईआरओ के लिए ईसीआईनेट पोर्टल में कुछ नए विकल्प जोड़े हैं। इन विकल्पों के बाद अब ईआरओ किसी नोटिस पाने वाले मतदाता को बिना दस्तावेज जमा कराए और कुछ मामलों में बिना सुनवाई तय किए भी अंतिम मतदाता सूची के लिए योग्य घोषित कर सकते हैं। पहले किसी नोटिस के बाद मतदाता को दस्तावेज जमा करने और सुनवाई की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। लेकिन इस पर काफी विवाद उठा था, तो अब आयोग ने फिर पलटी मारी है। जिस तरीके से चुनाव आयोग में फैसले लिए जा रहे हैं, उसे देखकर नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का दौर याद आता है। तब भी ऐसे बार-बार नियम बदले गए थे, जिसमें जनता को तकलीफ हुई और देश को भी बड़े नुकसान हुए। आर्थिक नुकसान तो फिर भी किसी तरह पूरा किया जा सकता है, मगर एसआईआर के नाम पर करोड़ों लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया तो लोकतंत्र नहीं बचाया जा सकेगा, यह तय है।

इस बीच वकीलों के संगठन लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पांच पूर्व न्यायाधीशों के साथ एसआईआर की वैधता की जांच के लिए आयोग बनाया है। यह आयोग जांच करेगा कि चुनाव आयोग की एसआईआर की प्रक्रिया संविधान और कानून के अनुरूप है या नहीं और इससे पात्र मतदाताओं के अधिकारों पर क्या असर पड़ा। देशभर में जनसुनवाई, मतदाता सूची से नाम जोड़ने-काटने के आंकड़ों का विश्लेषण और कानूनी समीक्षा होगी। दिसंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एमबी लोकुर इस आयोग के अध्यक्ष होंगे। उनके अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एके पटनायक, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बदर दुर्रेज अहमद, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रेखा शर्मा और पटना हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अंजना प्रकाश सदस्य होंगी।

दिसंबर में आयोग की रिपोर्ट में क्या निकल कर सामने आता है, यह देखने का इंतजार तो रहेगा ही। लेकिन ऐसे आयोग के गठन का मतलब यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट के रवैये पर भी देश में निराशा फैली है। एसआईआर में देश भर के 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं को ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से बाहर कर दिया गया है। इनमें करीब 5.8 करोड़ ऐसे मतदाता शामिल हैं, जिनके नाम 10 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट सूचियों में शामिल नहीं हो पाए हैं। मतलब इन लोगों के लिए अब कोई उम्मीद ही नहीं है कि वो किसी भी तरह वोट दे पाएंगे। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि अगर मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए तो वह हस्तक्षेप करेगा। लेकिन हाल में जब बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव से पहले करीब 18,000 मतदाताओं की अपीलें ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में नाम शामिल न होने के खिलाफ याचिका पर जल्द सुनवाई की अपील की गई तो बार एंड बेंच के मुताबिक, सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था, 'ये सिर्फ उपचुनाव हैं, बस।'

वोट कटने जैसे गंभीर मुद्दे पर इस तरह के जवाब शीर्ष अदालत और मुख्य न्यायाधीश की तरफ से आना बता रहा है कि चुनाव चोरी की जड़ें कहां तक पैठ जमा चुकी हैं। अब वो जड़ें उखाड़ी जा रही हैं, जिनमें मोदी सरकार जाती हुई दिख रही है।


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