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ज्ञानेश कुमार को गुस्सा क्यों आता है?

ज्ञानेश कुमार को गुस्सा क्यों आता है?
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पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच केन्द्रीय निर्वाचन आयोग एक बार फिर गलत कारणों से सुर्खियों में आया है। बुधवार को चुनाव आयोग की सोशल मीडिया एक्स पर लिखी एक पोस्ट से सवाल उठने लगे कि क्या एक संवैधानिक संस्था की भाषा और लहजा ऐसा होना चाहिए। दरअसल आयोग के आधिकारिक हैंडल पर लिखा था-

चुनाव आयोग की तृणमूल कांग्रेस को दो टूक। पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव भयरहित, हिंसारहित, धमकी रहित, प्रलोभन रहित, छापा रहित, बूथ और सोर्स जामिंग रहित होकर ही रहेंगे।

पहले तो यह संदेह हुआ कि यह वाकई चुनाव आयोग ने लिखा है या किसी ने आयोग की छवि खराब करने के लिए इस तरह तृणमूल कांग्रेस का नाम लेकर दो टूक बात कही है। क्योंकि पहले चुनाव से लेकर अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ जब चुनाव आयोग ने सीधे किसी दल का नाम लेकर उसके लिए इस भाषा में बयान दिया हो। विपक्ष और आयोग के बीच कई बार रस्साकशी हुई है। बीते कुछ सालों में यह तनाव ज्यादा बढ़ गया है। जिसमें विपक्ष बार-बार चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाता है और इस बार तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी भी विपक्ष ने कर ली थी, जो सफल नहीं हुई। लेकिन इन सबके बावजूद चुनाव आयोग में बैठे लोगों ने किसी एक दल का नाम लेकर ऐसी टिप्पणी नहीं की, जो अब की गई है। इसके बाद अब यही बचता है कि चुनाव आयोग विपक्ष के नेताओं का नाम लेकर उन्हें जवाब देने लगे। क्योंकि निष्पक्षता नाम की चिड़िया शायद डाल से उड़ चुकी है।

यह पोस्ट चुनाव आयोग ने ही डाली है, इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है, क्योंकि इसकी बाकायदा पृष्ठभूमि भी सामने आई है। दरअसल पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद 90.66 लाख वोटरों के नाम हटाने के विरोध में टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल बुधवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिला। डेरेक ओ ब्रायन, सागरिका घोष, साकेत गोखले और मेनका गुरुस्वामी इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। टीएमसी के इस दल ने मुख्यत: दो बातों पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा कि ममता बनर्जी ने अब तक नौ पत्र चुनाव आयोग को लिखे हैं, लेकिन लंबे समय से आयोग चुप बैठा है, पत्रों का जवाब नहीं दे रहा। और दूसरी शिकायत नंदीग्राम में मुख्य चुनाव अधिकारी और एक वरिष्ठ भाजपा नेता के बीच कथित सांठगांठ को लेकर थी। ये कोई ऐसी शिकायतें नहीं हैं, जिनका जवाब नहीं दिया जा सकता। लेकिन चार लोगों के साथ यह बैठक केवल सात मिनट ही चली। टीएमसी का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी बातें नहीं सुनी और सात मिनट की बातचीत के बाद उन्हें गेट आउट कहा। डेरेक ओब्रायन ने कहा, 'चुनाव आयोग ने हमें अपमानित किया और परिसर छोड़ने को कहा। फिर उन्होंने सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी फैलाई। यह भाजपा की साजिश है। लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है।'

आपको बता दें कि चुनाव आयोग की उपरोक्त पोस्ट इस बैठक के बाद ही आई है। आयोग इस बात पर इठला रहा है कि उसने टीएमसी को दो टूक जवाब दे दिया, लेकिन क्या यह शर्मिन्दगी की बात नहीं होनी चाहिए कि एक राजनैतिक दल के सवालों का संतोषजनक जवाब देने की जगह यह ढिंढोरा पीटा जाए कि हमने दो टूक जवाब दे दिया। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि चुनाव आयोग विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मानता है।

बुधवार की बैठक के बारे में टीएमसी के आरोपों पर निर्वाचन आयोग का कहना है कि टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने मीटिंग ने चिल्लाते हुए कहा कि हम यहां बात सुनने नहीं आए हैं। इसके बाद मीटिंग में माहौल गरमा गया और टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल चला गया। हालांकि अब इस दल के सदस्यों ने निर्वाचन आयोग को चुनौती दी है कि वह इस बैठक की ट्रांसक्रिप्ट जारी करे। टीएमसी ने यह भी कहा है कि अगर आयोग इसे जारी नहीं करेगा तो हम इसे जारी करेंगे। अब बैठक किस वजह से पूरी नहीं हुई और किसने पहले आपा खोया, क्यों खोया? और क्या ऐसी तनातनी लोकतंत्र के लिए सही है? इन सारे सवालों के जवाब देश को दिए जाने चाहिए, इसकी पहल चुनाव आयोग से ही होना चाहिए। क्योंकि ऊंगलियां उसी पर उठी हैं।

वैसे बैठक में बहस का एक और वाकया प.बंगाल के संदर्भ में ही पेश आया। जहां बुधवार को ही ज्ञानेश कुमार वर्चुअल मीटिंग ले रहे थे और सभी अधिकारियों से बारी-बारी से पूछ रहे थे कि उनके यहां कितने पोलिंग बूथ आदि हैं। जब यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी और कूचबिहार के पर्यवेक्षक बनाए गए अनुराग यादव से यही सवाल हुआ तो उन्हें जवाब देने में थोड़ी देरी हुई। जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कोई टिप्पणी कर दी। तो अनुराग यादव ने सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि आप हमसे इस तरह से बात नहीं कर सकते। हमने भी इस सेवा में 25 साल गुजारे हैं। अनुराग यादव के इस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाब दिए जाने के बाद कुछ देर के लिए बैठक में सन्नाटा छा गया। फिर दूसरे विषयों को लेकर बात शुरू की गई और किसी तरह बैठक को निपटाया गया। इस प्रसंग के बाद अनुराग यादव को पर्यवेक्षक के पद से हटा दिया गया है। हालांकि आयोग के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें हटाने की वजह बैठक में हुई बहस नहीं थी। लेकिन यह भी कहा गया कि अगर कई बार के दौरे के बावजूद पर्यवेक्षक को यह नहीं पता कि उसके क्षेत्र में कितने बूथ हैं, तो यह सही बात नहीं है।

इन दोनों प्रसंगों में एक चीज सामान्य है कि ज्ञानेश कुमार पर नाराज होने का आरोप लगा है। भले वे इसके लिए सामने वाले पक्ष को जवाबदेह मानें, लेकिन इससे उनकी नाराजगी या भड़कना या आपा खोना जायज नहीं हो जाता।

लोकतंत्र में यकीन और चुनाव को एक पर्व की तरह देखने वालों के लिए यह बड़ी दुखद स्थिति है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था के सामने विश्वनीयता का संकट उसकी अपनी कारगुजारियों के कारण खड़ा हो चुका है। क्या इस संस्था की साख कभी लौट पाएगी?


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