प.बंगाल और तमिलनाडु में कौन बनेगा मुख्यमंत्री
पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद अब सरकार गठन की हलचल तेज है, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चा में प.बंगाल और तमिलनाडु हैं।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद अब सरकार गठन की हलचल तेज है, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चा में प.बंगाल और तमिलनाडु हैं। प.बंगाल में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला है और वहां अब तक यही माना जा रहा है कि सुवेन्दु अधिकारी ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। क्योंकि पिछले सत्र में वे नेता प्रतिपक्ष थे। लेकिन मोदी-शाह की चौंकाने वाली राजनीति के कारण इस बारे में स्पष्ट तौर पर कोई दावा नहीं किया जा रहा। यह भी कहा जा रहा है कि किसी महिला चेहरे को भाजपा आगे लाएगी। इससे एक तरफ ममता बनर्जी के मुकाबले एक महिला नेता को बंगाल में खड़ा किया जाएगा और दूसरी तरफ भाजपा अपने नारी वंदन वाले सियासी पैंतरे को भी धार देगी। हालांकि भाजपा की सरकार गठन की तैयारियों के बीच मंगलवार को जब ममता बनर्जी ने यह ऐलान किया कि वे इस्तीफा नहीं देंगी, तो इस पर सवाल उठने शुरु हो गए कि क्या ऐसा संभव है कि कोई विधानसभा चुनाव हारने के बाद पद से हटने तैयार न हो। लेकिन ममता बनर्जी ने एक बात और भी कही थी कि अब वे आजाद चिड़िया की तरह हैं, जिन पर कोई जिम्मेदारी नहीं है, तो वे अब सड़क पर उतर कर लड़ाई लड़ेंगी। यानी इस्तीफा न देने वाली बात अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने के संकेत के तौर पर कही गई है।
संविधान के अनुच्छेद 172 की व्यवस्था है कि किसी राज्य में पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद विधानसभा स्वत:भंग हो जाती है। वर्तमान बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 8 मई 2021 से शुरू हुआ था और यह 7 मई को समाप्त हो रहा है। इसके बाद राज्यपाल को नयी विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। अर्थात नए विधायकों को शपथ दिलाई जाएगी और नयी सरकार का गठन किया जाएगा। कल के बाद ममता बनर्जी का यूं भी सरकार पर कोई हक नहीं रहेगा। इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल के पास सैद्धांतिक शक्ति होती है, जिसके अनुसार, मुख्यमंत्री राज्यपाल की इच्छा तक अपने पद पर रहता है। यानी विधानसभा कार्यकाल समाप्त होने और चुनाव हारने के बाद भी अगर ममता बनर्जी कहें कि मैं पद से नहीं हटूंगी तो राज्यपाल उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं। लेकिन इसकी नौबत नहीं आएगी, क्योंकि खुद ममता बनर्जी ऐसे असंवैधानिक तरीके आजमा कर अपने संघर्ष को कमजोर नहीं करेंगी। अब कल के बाद भाजपा किसे विधायक दल का नेता चुनती है, यह देखना होगा।
इधर तमिलनाडु में भी सरकार गठन की पहल खासी दिलचस्प हो चुकी है। इस बार पहली बार चुनावी मैदान में उतरी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसके नेता थलापति विजय दो-दो सीटों से जीते। लेकिन टीवीके बहुमत के 118 के आंकड़े को पार नहीं कर सकी। टीवीके के पास 108 सीटें हैं और विजय जब एक सीट से इस्तीफा देंगे तो टीवीके के पास 107 सीटें रहेंगी। ऐसे में उसे सरकार बनाने के लिए अन्य दलों का सहयोग लेना होगा। नतीजों वाले दिन ही विजय के पिता चंद्रशेखर ने कांग्रेस को साथ आ कर सरकार बनाने का न्यौता दिया था। राहुल गांधी ने विजय को जीत की बधाई भी दी थी। इसके अलावा विजय ने भी मल्लिकार्जुन खड़गे से बात की थी। इसके बाद कांग्रेस हाईकमान ने फैसला तमिलनाडु राज्य ईकाई पर छोड़ दिया था। अब तमिलनाडु कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए टीवीके को समर्थन देने पर सहमति जताई है। एआईसीसी के तमिलनाडु प्रभारी गिरीश चौडनकर की तरफ से बुधवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, 'हमारा समर्थन इस शर्त पर होगा कि टीवीके इस गठबंधन से उन सांप्रदायिक ताक़तों को दूर रखे जो भारत के संविधान में विश्वास नहीं करतीं।Ó इस तरह कांग्रेस ने साफ कर दिया कि अगर विजय एआईएडीएमके या बीजेपी की तरफ झुकाव दिखाते हैं तो वह समर्थन वापस भी ले लेगी। हालांकि ऐसा होने की उम्मीद कम ही है।
ध्यान रहे कि तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के साथ गठबंधन में थी और पिछले विधानसभा चुनाव के अलावा लोकसभा चुनाव भी दोनों ने मिल कर लड़ा था। राहुल गांधी और एम के स्टालिन के बीच हमेशा मधुर संबंध दिखे हैं, दोनों नेताओं ने कई मौकों पर एक-दूसरे की सार्वजनिक तौर पर तारीफ की है। लेकिन अब डीएमके के खिलाफ खड़ी टीवीके को समर्थन देने पर बहुत से लोग कांग्रेस पर सवाल उठा रहे हैं। राहुल गांधी पर तंज कसे जा रहे हैं कि वो खुद अपना गठबंधन तोड़ रहे हैं तो किस तरह विपक्षी एकता की बात कर सकते हैं। लेकिन यहां सवाल व्यावहारिकता का है। अगर कांग्रेस ने टीवीके के साथ आने का फैसला नहीं किया होता तो फिर भाजपा यहां पर महाराष्ट्र, हरियाणा या गोवा जैसा खेल खेलती और एआईएडीएमके के सहारे विधायकों को तोड़-फोड़ कर सरकार में आ जाती। भाजपा के हालिया इतिहास के बाद ऐसी आशंका निराधार नहीं है। शायद टीवीके भी इस बात को जानती है इसलिए उसने अपने सभी विधायकों को रिसॉर्ट भेज दिया है। वैसे डीएमके नेता कनिमोझी ने कहा है कि कांग्रेस को जो सही लगा उसने वही किया। टीवीके भी धर्मनिरपेक्ष राजनीति की बात करती है, ऐसे दलों का स्वागत है। इस बयान से अनुमान है कि राज्य में भले अब डीएमके और कांग्रेस साथ दिखाई न दें, लेकिन लोकसभा में दोनों साथ हैं। वैसे भी राष्ट्रीय स्तर पर बने गठबंधन में कई बार घटक दल राज्य स्तर पर एक-दूसरे के बरक्स खड़े होते हैं, तो कांग्रेस ने टीवीके के साथ जाकर कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिस पर सवाल उठाए जाएं। कांग्रेस के लिए फायदे की बात ये है कि अब आंध्रप्रदेश और पुड्डुचेरी को छोड़ कर पूरे दक्षिण भारत में उसकी सत्ता हो जाएगी।
अब कांग्रेस के पांच विधायकों के साथ टीवीके के पास 112 विधायक हो जाएंगे, बाकी छह विधायकों को जुटाने का काम वीसीके के दो, कम्युनिस्ट पार्टियों के चार और डीएमडीके के एक विधायक को साथ लेकर किया जा सकता है। हालांकि अभी इन दलों की तरफ से समर्थन की पुष्टि होना बाकी है।


