Top
Begin typing your search above and press return to search.

अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा

नेशनल मेडिकल कमीशन ने मंगलवार देर रात जम्मू-कश्मीर के रियासी में स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस की मान्यता रद्द कर दी

अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा
X

नेशनल मेडिकल कमीशन ने मंगलवार देर रात जम्मू-कश्मीर के रियासी में स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस की मान्यता रद्द कर दी। इस खबर को पढ़ते ही शौक़ बहराइची का मशहूर शेर याद आ गया कि-

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था।

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।।

देश में पहले से अच्छे उच्च शिक्षा संस्थानों की भारी कमी है। धार्मिक स्थलों के निर्माण, सौंदर्यीकरण, रख-रखाव पर अरबों रुपए खर्च किए जाते हैं, सरकार में बैठे लोगों का रोजमर्रा का खर्च लाखों में होता है, फिजूल के प्रचार कार्यक्रमों में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन जब उच्च कोटि के अस्पतालों और शिक्षा संस्थानों के निर्माण और उन्नयन की बारी आती है तो सरकार के पास धन की कमी दिखाई जाती है। छात्रों को पढ़ने और शोध कार्यों के लिए आसानी से धन मुहैया कराने की जगह सरकार का ध्यान शिलान्यासों और हरी झंडी दिखाने में लगा रहता है। ऐसे में एक मेडिकल कॉलेज की मान्यता रद्द कर देना ऐसा फैसला है, जिस पर सिर ही पीटा जा सकता है।

मान्यता रद्द करने के पीछे मानकों का पालन न होने को कारण बताया जा रहा है। लेकिन असल मुद्दा यही है कि पिछले काफी वक्त से इस मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम छात्रों को मिले दाखिले पर हिंदू संगठन आपत्ति जता रहे थे और इसके लिए बाकायदा संघर्ष समिति बनाकर आंदोलन किया जा रहा था। दरअसल इस मेडिकल कॉलेज के पहले एमबीबीएस बैच के 50 छात्रों में से 42 मुस्लिम, एक सिख और केवल 8 हिंदू छात्र जम्मू क्षेत्र से होने की जानकारी सामने आई थी। अधिकतर छात्र कश्मीर से थे। इसी पर हिंदूवादी संगठन हंगामा मचा रहे थे कि जब मेडिकल कॉलेज हिंदुओं के दिए दान से चल रहा है, तो उसमें मुस्लिम छात्रों को दाखिला क्यों दिया जा रहा है। आंदोलनकारी बाकायदा कॉलेज को बंद करने की मांग ही कर रहे थे। जो अब शायद मानकों के बहाने से पूरी कर दी गई है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस फैसले पर निराश होते हुए कहा है कि उन बच्चों ने मेहनत करके सीट हासिल की है, यह किसी का उन पर एहसान नहीं है- न मेरा, न यूनिवर्सिटी का। उन्होंने परीक्षा पास करके सीट प्राप्त की है। अब अगर आप उन्हें वहां नहीं पढ़ाना चाहते, तो कहीं और उनका इंतजाम कीजिए। वे किसी के एहसान पर नहीं आए हैं। वहीं महबूबा मुफ्ती ने कहा कि बीमारी का इलाज करने के बजाय, मरीज को बिना किसी गलती के दंडित किया जा रहा है। अधिक चिंताजनक बात यह है कि यदि एसएमवीडी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के साथ ऐसा किया जा सकता है, तो इसे अन्य जगहों पर भी दोहराया जा सकता है, जिससे मेहनती युवाओं का भविष्य गंभीर खतरे में पड़ जाएगा।

गौरतलब है कि नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने एसएमवीडी से एमबीबीएस कोर्स चलाने की इजाजत वाले आदेश को वापस ले लिया है। इसके बाद से ही छात्र और उनके शिक्षक चिंतित हैं। फैकल्टी सदस्यों ने आरोप लगाया कि हिंदुत्ववादी संगठनों के आंदोलन ने एनएमसी के फैसले को प्रभावित किया है। बता दें कि 2 जनवरी को एनएमसी ने संस्थान का औचक निरीक्षण किया और महज 15 मिनट में फैसला लिया कि 2025-26 सत्र के लिए एमबीबीएस कोर्स चलाने के लिए दी गई अनुमति वापस ली जाती है। एक बयान में कहा गया है कि यह फैसला अधोसंरचना में गंभीर कमियों के आधार पर लिया गया है।

मेडिकल एजुकेशन रेगुलेटर के अनुसार, पिछले दो हफ्तों में खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लिनिकल मटीरियल की कमी और फैकल्टी एवं रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी की कई शिकायतें मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई। बोर्ड ने मंगलवार को एक आदेश जारी किया।

रिपोर्ट के अनुसार कॉलेज में शिक्षकों की संख्या करीब 39 प्रतिशत कम थी। ट्यूटर, डेमोंस्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर भी 65 प्रतिशत कम मिले। मरीजों की संख्या भी निर्धारित मानकों से काफी कम मिली। दोपहर 1 बजे तक ओपीडी में सिर्फ 182 मरीज मौजूद थे, जबकि कम से कम 400 मरीज होने चाहिए थे। अस्पताल में केवल 45 प्रतिशत बेड पर मरीज थे, जबकि मानक 80 प्रतिशत का है। आईसीयू में भी क्षमता से आधे मरीज थे। इसके अलावा कई विभागों में लैबोरेटरी हीं थीं, रिसर्च लैब नहीं थी, लेक्चर थिएटर मानकों के अनुरूप नहीं थे और लाइब्रेरी में सिर्फ 744 किताबें थीं जबकि 1500 किताबें जरूरी हैं। केवल 2 ऑपरेशन थिएटर काम कर रहे थे जबकि कम से कम 5 थिएटर होने चाहिए थे। पैरा-क्लीनिकल विषयों के लिए उपकरण भी पर्याप्त नहीं थे।

मान लिया कि इस रिपोर्ट के मुताबिक संस्थान में ढेर सारी कमियां थीं, लेकिन उन कमियों को दूर किया जाना चाहिए या संस्थान ही बंद होना चाहिए। एनएमसी का कहना है कि जिन छात्रों का दाखिला हो चुका है, उनका वर्ष बर्बाद नहीं होगा और उन्हें जम्मू और कश्मीर के दूसरे मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में समायोजित किया जाएगा। लेकिन इस प्रक्रिया में छात्रों को जिस मानसिक तकलीफ से गुजरना पड़ेगा, उसका निदान क्या है, यह भी मोदी सरकार को बताना चाहिए।

हालांकि इस सरकार से अब शिक्षा के क्षेत्र में कुछ भी अच्छा करने की उम्मीद नहीं रखना चाहिए। एक मेडिकल कॉलेज के बंद होने पर जो लोग ढोल बजाकर, मिठाई बांटकर खुशियां मनाएं, वो असल में देश को शिक्षित होते देखना ही नहीं चाहते हैं। उनका मकसद केवल हिंदुत्व का भगवा झंडा बुलंद करना है, फिर इसके लिए देश का भविष्य खतरे में पड़े, उन्हें परवाह नहीं है। भाजपा जम्मू और कश्मीर इकाई के अध्यक्ष सत शर्मा ने कहा है कि, 'हम नेशनल मेडिकल कमीशन के मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड के फैसले का स्वागत करते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने अनुमति रद्द करके छात्रों का भविष्य सुरक्षित किया है।'

अब जो लोग कॉलेज की मान्यता रद्द होने को छात्रों का भविष्य सुरक्षित होना मान रहे हैं, वो देश को किस तरह विश्वगुरु बनाना चाहते हैं, समझा जा सकता है।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it