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वेदांता हादसा, वही पुराने सवाल

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता पावर प्लांट में हुए बड़े हादसे ने बिहार से बंगाल तक कई परिवारों पर बड़ा दुख बरपाया है।

वेदांता हादसा, वही पुराने सवाल
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छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता पावर प्लांट में हुए बड़े हादसे ने बिहार से बंगाल तक कई परिवारों पर बड़ा दुख बरपाया है। 14 अप्रैल की दोपहर में प्लांट की बॉयलर यूनिट के पास अचानक एक बड़ा धमाका हुआ, जिसने पल भर में कई जिंदगियों को लील लिया। घोषित तौर पर इस हादसे में अब तक 20 लोगों की जान जा चुकी है और कम से कम 36 लोग बुरी तरह घायल हुए हैं। लेकिन हताहतों का असली आंकड़ा क्या है, यह दावे से कौन कह सकता है, क्योंकि सात सौ डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा तापमान वाला बॉयलर जब फटा तो उस वक्त बड़ी संख्या में श्रमिक पेंटिंग और तकनीकी काम कर रहे थे। जिनमें से कुछ वहीं मारे गए, कुछ अस्पतालों में इलाज के दौरान मरे, और कुछ तो अंतिम संस्कार से पहले ही राख में तब्दील हो गए। मुर्दाघर के बाहर अपने परिजनों की शिनाख्त में लोग भटकते रहे, क्योंकि शवों की पहचान भी मुश्किल हो गई थी। कुछ श्रमिकों के परिजनों का दावा है कि प्लांट के भीतर काम करने गए कई लोग अब भी लापता हैं।

बहरहाल इस हादसे के बाद जैसा कि रिवाज है, कंपनी ने, राज्य सरकार ने और इस बार तो केंद्र सरकार ने भी मृतकों के परिजनों और घायलों के लिए मुआवजे का ऐलान किया है। वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दुख जताते हुए लिखा, 'छत्तीसगढ़ के सिंघीतराई प्लांट में हुए दुखद हादसे से गहरा दुख हुआ है। इस हादसे से प्रभावित हर व्यक्ति मेरा परिवार है। आपके आंसू मेरे हैं, आपका दर्द मेरा है। हमारा पूरा सहयोग, हर तरह से आपके साथ है।' इसमें कोई दो राय नहीं कि कंपनी के मालिक को इस तरह के हादसे पर दुख है, लेकिन हताहतों के परिजनों पर जो बीती है, जो आंसू उनकी आंखों में हैं, वो मालिकान के कैसे हो सकते हैं। अगर ऐसा होता तो शायद ऐसे हादसे होने की नौबत ही नहीं आती।

फिलहाल यह पता नहीं है कि बॉयलर किस वजह से फटा, इसलिए किसी पर सीधे दोषारोपण नहीं हो सकता। लेकिन अक्सर ऐसी औद्योगिक दुर्घटनाओं में यही देखा जाता है कि जरा सी लागत बचाने के फेर में रख-रखाव में चूक होती है, या अकुशल लोगों को काम पर रखा जाता है। इसमें जब कोई गड़बड़ होती है तो उसमें सबसे पहले श्रमिक ही प्रभावित होता है। कभी दुर्घटना का शिकार होकर किसी का अंग-भंग होता है, या जान चली जाती है, तो कुछ लाख रूपए का मुआवजा देकर बात आयी-गयी की जाती है। जो इंसान आठ-दस घंटे श्रम करके भी एक लाख रुपए इक_ा नहीं कर पाता, उसे या उसके परिवार को अगर एकमुश्त कई लाख रूपए मिल जाएं, तो फिर कौन नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाएगा। फिर पूंजीवादी व्यवस्था का जाल भी ऐसा है कि गरीब को इंसाफ मिलने की उम्मीद रंचमात्र भी नहीं रहती है। इसलिए श्रमिकों के हक में यदा-कदा आवाज उठने के बाद भी उनकी जीवनस्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।

बहरहाल, इस हादसे के बाद वेदांता कंपनी ने मृतकों के परिजनों के लिए 35 लाख रुपए मुआवजा और साथ ही रोजगार सहायता देने की घोषणा की है। वहीं घायलों के परिवारों के लिए 15 लाख रुपए देने की घोषणा की है। वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा है कि इस मामले में जो भी दोषी होंगे उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही सरकार की तरफ से मृतकों के परिवारों को 5-5 लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर इस हादसे पर दुख जताया है, साथ ही मृतक के परिजनों को पीएमएनआरएफ की ओर से 2 लाख रुपये और घायलों को 50,000 रुपये देने का ऐलान किया है। चूंकि मृतकों में बंगाल से आए मजदूर भी शामिल हैं, शायद इस वजह से अभी प्रधानमंत्री को अचानक मजदूरों का दर्द दिखाई दिया है। इसके अलावा सक्ती कलेक्टर अमृत विकास तोपनो ने पूरे मामले की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए हैं ताकि यह साफ हो सके कि आखिर इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई। कंपनी ने भी अपने स्तर पर अंदरूनी जांच शुरू कर दी है। इस जांच में यह समझने की कोशिश की जाएगी कि हादसा तकनीकी गड़बड़ी से हुआ या फिर किसी की लापरवाही इसकी वजह बनी साथ ही प्लांट में सुरक्षा इंतजाम कितने मजबूत थे इसकी भी पड़ताल की जाएगी।

जांच के ऐसे ऐलान सुनकर उम्मीद बंधती है कि वाकई दोषियों की शिनाख्त होगी, लेकिन सच यही है कि औद्योगिक हादसों के बाद किसी को सजा मिली हो, ऐसे प्रकरण बेहद कम हुए हैं। अक्सर पूंजीतंत्र प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था में अपने लिए बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता ढूंढ लेता है और भीतर बैठे लोग ही उसकी मदद करते हैं।

सोशल मीडिया का जमाना है, इसलिए बहुत सारी खबरें आम जनता तक पहुंच जाती है। वर्ना सत्ता और शक्तिसंपन्न लोगों की कोशिश यही रहती है कि ऐसी खबरें दब जाएं, या प्रकाशित-प्रसारित हों भी तो उनमें पूरा सच बयां न हो। यही हाल जांच समितियों का भी किया जाता है जिनमें नाम के लिए कुछ सेवानिवृत्त लोगों को बिठा दिया जाता है, उसके बाद समय बिताने का सिलसिला शुरु होता है। वक्त बीतने के साथ हादसे की बात होनी कम हो जाती है और जांच कब ठंडे बस्ते में चली जाती है, पता ही नहीं चलता। इसलिए वेदांता पावर प्लांट का हादसा भी कितने वक्त तक लोगों को याद रहता है और कब तक इसका कारण पता चलता है, ये देखना होगा।

वैसे याद दिला दें कि अभी तीन महीने पहले जनवरी में रियल इस्पात प्लांट बलौदा बाजार में भी 7 मजदूरों की मौत हुई थी। उससे पहले लुधियाना के वेरका मिल्क प्लांट और महाराष्ट्र की अमुदान केमिकल्स जैसी जगहों पर भी ऐसे ही धमाके हुए थे। दो साल पहले रायगढ़ के पतरापाली में जिंदल कारखाने में गर्म राख की चपेट में आने से एक ठेका श्रमिक की मौके पर ही मौत हो गई थी और वहीं दो अन्य घायल हो गए थे।

बार-बार ऐसे हादसों के होने के कुछ सामान्य कारण हो सकते हैं, जैसे बॉयलर का पुराना होना, उसके रख-रखाव में लापरवाही, कम वेतन पर अकुशल लोगों को संचालित करने देना, जिन्हें भावी संकट का अनुमान ही नहीं हो पाता, मुनाफा कमाने के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता आदि। अगर वेदांता हादसे में ऐसा ही कोई कारण सामने आता है, तो क्या उसमें कभी असली दोषी को पकड़ा जा सकेगा, यह बड़ा सवाल है।


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