Top
Begin typing your search above and press return to search.

भारत की संप्रभुता पर अमेरिका का हमला

अमेरिका के ईरान पर हमले के बाद दिवंगत आयतुल्लाह अली खामनेई के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने दावा किया कि यह हमला केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा

भारत की संप्रभुता पर अमेरिका का हमला
X

अमेरिका के ईरान पर हमले के बाद दिवंगत आयतुल्लाह अली खामनेई के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने दावा किया कि यह हमला केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, आने वाले वक्त में भारत और चीन जैसी शक्तियां भी अमेरिका के निशाने पर होंगी और उनकी यह बात बुधवार को सच साबित होती दिखी। बुधवार 4 मार्च को अमेरिका ने हिंद महासागर के भारतीय क्षेत्र में ईरान का एक युद्धपोत टॉरपीडो से हमला करके डुबो दिया। ईरान के इस युद्धपोत ने हाल ही में भारत के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास में हिस्सा लिया था और इसी के बाद वापस लौट रहा था। इस सैन्य अभ्यास को इंटरनेशनल फ़्लीट रिव्यू-2026 कहा गया, इसकी मेज़बानी भारत ने की थी और खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सामने भारतीय और ईरानी नौसैनिकों ने एक साथ परेड की थी। लेकिन भारत की संप्रभुता को बड़ी चोट पहुंचाते हुए अमेरिका ने हमला किया और इसमें सफलता का दावा भी किया।

अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दावा किया कि हिंद महासागर में ईरान का एक युद्धपोत अमेरिका ने टॉरपीडो से हमला करके डुबो दिया है। हालांकि, हेगसेथ ने उस ईरानी जहाज़ का नाम नहीं बताया जिसे डुबोया गया है, जबकि श्रीलंकाई नौसेना ने बताया था कि 'आईआरआईएस डेना' हिंद महासागर में डूब गया है, जिसमें सवार कुल 180 में से लगभग 140 लोग लापता हैं। श्रीलंकाई सरकार ने यह भी कहा कि ईरानी युद्धपोत डेना की ओर से उनके पास एक डिस्ट्रेस कॉल (आपातकालीन संदेश) मिला जिसमें सहायता मांगी गई थी। लेकिन अमेरिका और श्रीलंका की बातों के उलट मोदी सरकार ने पहले इस दावे को 'भ्रामक' बताया। पीआईबी की फैक्ट चेक टीम ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि, 'एक अमेरिका बेस्ड चैनल में अमेरिकी सेना के पूर्व अधिकारी कर्नल डगलस मैक्ग्रेगर ने कहा कि अमेरिका भारतीय नौसैनिक अड्डे का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए कर रहा है ये दावा बिलकुल $गलत है।' लेकिन सच क्या है ये अब पूरी दुनिया के सामने है।

प्रधानमंत्री मोदी इस गंभीर संकट के वक्त भी चुप्पी बरते हुए हैं और सरकार हमले की सीधी निंदा करने की जगह गोल-मोल बातें कर रही है, यह बड़ी चिंता की बात है। क्योंकि अब तक सरकार ने विदेश नीति को पलटने का काम किया था, लेकिन अब तो अतिथि देवो भव के सामान्य शिष्टाचार को निभाने की जहमत भी नहीं उठा रही। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर नरेन्द्र मोदी अमेरिका और इजरायल से इतना डर क्यों रहे हैं। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने मोदी सरकार को सही सलाह दी है कि, 'अगर हमने ईरानी जहाज़ को अपने 'मिलन' अभ्यास में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित नहीं किया होता, तो वह वहां मौजूद नहीं होता। हम इस अभ्यास के मेज़बान थे। इस अभ्यास के प्रोटोकॉल के मुताबिक जहाज़ किसी भी तरह का गोला-बारूद नहीं ले जा सकते। यानी ईरान का वो जहाज़ निहत्था था। अमेरिकी पनडुब्बी का हमला पहले से सोचा-समझा था, क्योंकि अमेरिका को इस बात की जानकारी थी कि ईरानी जहाज़ इस अभ्यास में शामिल है। उन्होंने कहा कि भले ही भारत अमेरिका के इस हमले के लिए राजनीतिक या सैन्य रूप से जि़म्मेदार ना हो लेकिन भारत की 'जि़म्मेदारी नैतिक और मानवीय स्तर पर है'। अफसोस यही है कि सरकार इस मूलभूत जिम्मेदारी को निभाने से भी बच रही है।

यह देखकर अफसोस होता है कि नेहरू जी के गुट निरपेक्ष आंदोलन से लेकर इंदिरा गांधी के बांग्लादेश निर्माण तक भारत ने हमेशा वैश्विक राजनीति में मजबूती का परिचय दिया। कभी किसी महाशक्ति के दबाव में नहीं झुका। इसी परंपरा को आगे सभी प्रधानमंत्रियों ने निभाया, चाहे वे किसी भी दल के हों, हमने अमेरिका के सामने समर्पण नहीं किया। 2013 का देवयानी खोबरागड़े मामला यहां याद आता है, जब मनमोहन सिंह सरकार ने अमेरिकी राजनयिकों की सुविधाएं छीनकर 'जैसे को तैसा' जवाब दिया था। लेकिन अब आईआरआईएस डेना पर हमले के बाद मोदी सरकार की 'रणनीतिक चुप्पी' ने भारत की साख खतरे में डाल दी है। अमेरिका की इस मनमानी पर चुप रहना एक तरफ 'अतिथि देवो भव' के हमारे संस्कारों का अपमान है और दूसरी तरफ अपनी संप्रभुता की परवाह न करना भी दिखाता है।

गौरतलब है कि 10 साल पहले फरवरी 2016 में नरेन्द्र मोदी ने एक पोस्ट में बताया था कि हिंद महासागर क्षेत्र मेरी प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताओं में से एक है। इसी तरह का बयान पिछले साल नौसेना प्रमुख ने दिया था कि हिंद महासागर का नाम हमारे नाम पर रखा गया है, अगर हम इसका ख्याल नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा। तो अब सवाल है कि नरेन्द्र मोदी की नजर में ऐसे बयानों का कोई अर्थ अब है भी या नहीं। खुद को हिंद महासागर का असली रक्षक कहने वाले भारत की 'चुप्पी' क्या उसी कूटनीतिक दबाव और समझौतापरस्त होने का संकेत है, जिस पर राहुल गांधी कहते हैं कि पीएम इज़ कॉम्प्रोमाइज़्ड। भारत के लिए यही श्रेयस्कर है कि अपने क्षेत्र में होने वाली ऐसी हिंसक घटनाओं पर वह मूकदर्शक बनकर नहीं रहे। हमें अपनी स्वायत्तता और मेहमान की सुरक्षा को सर्वोपरि रखना होगा।

हिन्द महासागर में आईआरएस-डेना के डूबने की घटना को 'युद्ध की कार्रवाई' कहकर टाल देना भारत के लिए रणनीतिक भूल होगी। अगर आज भारत अमेरिका की इस नापाक हरकत पर चुप रहा तो भविष्य में इसका बड़ा खामियाजा देश भुगतेगा। क्योंकि दुनिया में संदेश यही जाएगा कि अमेरिका के निशाने पर ईरानी युद्धपोत था, लेकिन उसका असली उद्देश्य भारत को 'अपमानित' करना था।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it