डॉ.बुशरा बानो के साथ खड़े रहने का वक्त
प.बंगाल की आईपीएस अधिकारी डॉ. बुशरा बानो प. मेदिनीपुर के खड़गपुर में एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस के तौर पर काम कर रही थीं।

प.बंगाल की आईपीएस अधिकारी डॉ. बुशरा बानो प. मेदिनीपुर के खड़गपुर में एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस के तौर पर काम कर रही थीं। अब उनका तबादला कर दिया गया है। उन्हें स्टेट आर्म्ड पुलिस की चौथी बटालियन का डिप्टी कमांडेंट नियुक्त किया गया है। सरकारी-प्रशासनिक सेवाओं में तबादले आम बात है, इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन डॉ.बुशरा बानो का तबादला महज सरकारी प्रक्रिया नहीं है, यह एक मुसलमान महिला अधिकारी के प्रति सरकार की नफरत का निस्संकोच इज़हार है।
विपक्ष जब कहता है कि संविधान खतरे में है, राहुल गांधी जब कहते हैं कि नफरत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान खोलने वे निकले हैं, तो ये सब महज बयानबाज़ी नहीं है, इसके गहरे निहितार्थ हैं। संविधान ने सबको समानता का अधिकार दिया है। समानता का मतलब यह कि किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, भाषा, लिंग, आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। सत्ता पर बैठे लोगों से सबसे पहले उम्मीद की जाती है कि वे संविधान की गरिमा को हर हाल में बनाए रखेंगे, ताकि जनता भी उनसे प्रेरणा लेकर संविधान के अनुकूल व्यवहार करे। अगर ऐसा होने लगे तो देश को सही अर्थों में खुशहाल बनने में जरा वक्त नहीं लगेगा। लेकिन भाजपा की प्राथमिकता में देश की खुशहाली कहीं नजर नहीं आती। उसे केवल हिंदुत्व का आतंक कायम करना है, ताकि नफरत के दम पर उसकी सत्ता बची रहे। बुशरा बानो प्रकरण इसी आतंक की एक बानगी है।
दरअसल बुशरा बानो ने एक निजी वीडियो जारी किया, जिसमें उन्होंने यूपीएससी की तैयारी करने वालों का हौसला बढ़ाया। 13 सितंबर के वीडियो में, 2021 बैच की आईपीएस अधिकारी बुशरा बानो ने बताया कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की रेजिडेंशियल कोचिंग एकेडमी (आरसीए) ने उन्हें यूपीएससी की तैयारी में मदद की। उन्होंने कहा कि वे खुद से यूपीएससी की तैयारी कर रही थीं, लेकिन आरसीए ने जो पाठ्य सामग्री, परीक्षा के पर्चे आदि उपलब्ध करवाए, उससे उन्हें मदद मिली। उन्होंने यूपीएससी देने वाले अभ्यर्थियों को सलाह दी कि वे भी आरसीए की सुविधाओं का लाभ उठाएं और अपने वतन की खिदमत करें। इस वीडियो में बुशरा बानो ने वंदे मातरम या जय हिंद नहीं कहा, लेकिन शुरुआत उन्होंने अस्सलामुअलैकुम से की, बीच में कहीं इंशाअल्लाह कहा और आखिर में जज़ाकल्लाह कहा।
पाठकों जानते हैं कि नमस्कार, सतश्रीअकाल, हैलो, जय सियाराम, जय जिनेन्द्र की तरह अस्सलामुअलैकुम अभिवादन का एक तरीका है, इसका मतलब होता है 'आप सलामत रहेंÓ। इंशाअल्लाह का मतलब है 'भगवान की मर्जी हुई तो' यानी होइहि सोइ जो राम रचि राखा और जज़ाकल्लाह का मतलब है 'अल्लाह आपको (इसका) अच्छा इनाम दे यानी जुग जुग जियो, भगवान तुम्हारा भला करे, रब राखा जैसा सद्वचन।
अस्सलामुअलैकुम, इंशाअल्लाह और जज़ाकल्लाह में कुछ भी गैरकानूनी नहीं है। लेकिन दूसरे धर्मोर्ं खासकर इस्लाम से घृणा करने वाले चंद कट्टर हिंदुओं ने उर्दू, फारसी, अरबी भाषा को भी शायद गैरकानूनी मानना शुरु कर दिया है, इसलिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के एक हैंडल 'हिंदू लीगल फंड' ने इस वीडियो की शिकायत बंगाल के गृह सचिव से। उसने आरोप लगाया कि डॉ.बुशरा बानो ने अपनी बात की शुरुआत 'अस्सलाम-अलैकुम' से की, 'इंशाल्लाह' कहा, 'जज़ाकल्लाह' पर बात खत्म की। उन्होंने 'वंदे मातरम' या 'जय हिंद' का इस्तेमाल नहीं किया। इस हैंडल के मुताबिक भारतीय राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले एक कार्यरत अधिकारी को निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए और सार्वजनिक बातचीत में राष्ट्रीय शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए।
इसके बाद इस वीडियो को सुदर्शन टीवी ने दिखाया और फिर वही नफरती बातें की और कुछ ही वक्त में डॉ.बानो का तबादला हो गया। मतलब प.बंगाल की सुवेन्दु अधिकारी की भाजपा सरकार ने संविधान पर चलने की जगह कट्टरपंथी हिंदुओं की बातों को मान कर फैसला लिया। डॉ.बानो की शिकायत करने वालों का कहना है कि भारतीय राज्य के अधिकारी को निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए। तो फिर प्रधानमंत्री ने जब मंत्रोच्चार के बीच सेंगोल के साथ संसद के नए भवन में प्रवेश किया था, राम मंदिर का शिलान्यास किया था, उसकी प्राण प्रतिष्ठा में हिस्सा लिया था, जब अनगिनत मंचों से प्रधानमंत्री, गृहमंत्री जय श्रीराम कहते हैं, जब रक्षा मंत्री रफाएल विमानों पर नींबू-मिर्ची बांधते हैं, कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री कांवड़ियों के पैर छूने, उन पर फूल बरसाने का काम करते हैं, अपने पुलिस अधिकारियों को कांवड़ियों की सेवा में लगाते हैं, धार्मिक शोभायात्राओं में पुलिस अधिकारी कलावा बांध कर हिस्सा लेते हैं, कई बार पद ग्रहण करते वक्त पूजा पाठ करवाते हैं, तब क्या ये सब निष्पक्षता का परिचय देते हैं। ऐसी घटनाओं की सूची इतनी लंबी बन जाएगी कि जिससे पूरी पृथ्वी नापी जा सकेगी। लेकिन कभी किसी हिंदू हैंडल ने हिंदुत्व के भौंडे प्रदर्शन पर सरकार से शिकायत की हो, याद नहीं पड़ता।
लेकिन डॉ. बुशरा बानो का मुसलमान होना ही ऐसी दंडात्मक कार्रवाई के लिए पर्याप्त है। अगर बुशरा की जगह कोई हिंदू नाम होता, तो अब तक मोदी सरकार, भाजपा, संघ उनका सम्मान कर रहे होते, उनके जीवन को महिला सशक्तीकरण की मिसाल बताते। वैसे जिन्हें धर्म से फर्क नहीं पड़ता, उनके लिए बता दें कि कन्नौज के सौरिख गांव में जन्मीं बुशरा बानो ने महज 20 साल में एमबीए किया, फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी की, साथ ही नेट और जेआरएफ भी क्वालिफाई कर दिया। शादी के बाद वे अपनी पति के साथ सऊदी अरब चली गईं। वहां बतौर प्रोफेसर काम किया, लेकिन उनका मन अपने देश हिंदुस्तान में काम करने का था, तो यहां लौटीं और फिर साल 2018 में यूपीएससी की परीक्षा पास की थी। इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस के लिए उनका चयन हुआ, मगर उस समय दूसरे बच्चे से गर्भवती थी, इस वजह से वो सेवा में शामिल नहीं हो सकीं, बाद में उन्होंने 2019 में फिर से परीक्षा दी और ऑल इंडिया 234 रैंक हासिल की। इस बार उनका चयन भारतीय पुलिस सेवा में हुआ। गृहस्थ जीवन, दो बच्चों को संभालने के साथ उन्होंने यह सफलता हासिल की। तीन बड़े ऑपरेशन होने के बावजूद आईपीएस के कठिन शारीरिक प्रशिक्षण की चुनौती भी पार की और अंतत: 30 साल की आयु में प.बंगाल कैडर से पुलिस अधिकारी बनीं।
मानसिक और शारीरिक चुनौतियों को डॉ.बुशरा बानो ने आड़े आने नहीं दिया, उनके परिवार ने उनका साथ दिया और अपनी प्रतिभा के दम पर वे आगे बढ़ती रहीं, लेकिन भाजपा-संघ की नकारात्मक राजनीति ने एक मुसलमान महिला अधिकारी के साथ बिना गलती के कैसी नाइंसाफी की है, यह अब देश देख रहा है। डॉ.बुशरा बानो इस चुनौती को भी पार कर लेंगी, अब देश को देखना है कि वो किसके साथ खड़ा रहेगा और संविधान की रक्षा किस तरह करेगा।


