मीरा जैसी विद्रोही तीजनबाई
सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजनबाई ने लोककला के मंच को सूना करते हुए इस संसार से विदा ले ली है।

सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजनबाई ने लोककला के मंच को सूना करते हुए इस संसार से विदा ले ली है। हालांकि उनके तंबूरे की धुन और बुलंद लेकिन मधुर आवाज़ लोक कला संसार में उसी तरह गूंजती रहेगी, जैसे तानपूरा लिए मीरा बाई के भजन। कृष्ण की भक्ति में डूबी मीरा ने जमाने के बनाए नियमों के विरुद्ध जाकर अपने गिरधर गोपाल के भजन लिखे और गाए। भक्तिभाव हर इंसान का हक है और उसे जाहिर करने में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं होना चाहिए, इस बराबरी के सिद्धांत को मीरा ने सारे संघर्षों के साथ निभाया। तो उन्हीं की तरह तीजनबाई ने भी पंडवानी गायन की कला में स्त्री-पुरुष के भेद को चुनौती दी। और उस कापालिक शैली की पंडवानी को अपने जीवन से जोड़ा जो एक वक्त तक केवल पुरुषों के अधिकार क्षेत्र में थी। इस तरह तीजनबाई का जाना सिर्फ एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि लोककला में उस सांस्कृ तिक क्रांति के एक युग का अंत है जिसने आधी आबादी को खुलकर अपनी कला प्रदर्शित करने का हौसला दिया।
तीजनबाई को छत्तीसगढ़ के गांवों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक खूब सराहना मिली, उनकी कला की कद्र हुई। देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से उन्हें नवाजा गया। डी लिट् की उपाधि उन्हें मिली। इंदिरा गांधी से लेकर हबीब तनवीर तक कई अहम हस्तियां उनकी कला की प्रशंसक रहीं, इन सबके बावजूद तीजनबाई के जीवन संघर्ष खत्म नहीं हुए। लेकिन उन्होंने अपनी कला को जीवित रखने और आगे बढ़ाने का अद्भुत जज्बा दिखाया और किसी भी हाल में टूटी नहीं।
दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजनबाई 'पारधी' अनुसूचित जनजाति से आती थीं। इस जनजाति को अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 के तहत अपराधी जाति घोषित कर दिया था, बाद में जवाहर लाल नेहरू के प्रयास से 31 अगस्त, 1952 को यह अधिनियम निरस्त कर दिया गया। मगर वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के आ जाने से इस जाति के लोगों की रोज़ी-रोटी पर गहरा संकट छा गया। इस समुदाय के अधिकतर लोग दिहाड़ी मज़दूरी करके जीवनयापन करने को मज़बूर हो गए। ऐसे समुदाय से आने वाली तीजनबाई ने बचपन से ही पंडवानी के लिए अपना रुझान दिखाया और फिर इससे ऐसी पहचान बनाई कि पंडवानी और तीजनबाई एक-दूसरे के पूरक हो गए।
बचपन में तीजनबाई अपने नाना को पंडवानी गाते हुए सुनती थीं। एक बार नाना ने उन्हें सुनते देखा तो उन्होंने तीजनबाई को गाना सिखाया। यहीं से तीजन बाई का संगीत का सफर शुरू हुआ। 13 साल की उम्र में तीजनबाई ने पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी। लेकिन सबको चौंकाते हुए उन्होंने पंडवानी की कापालिक शैली को अपनाया, जिसमें खड़े होकर गाया जाता है। जबकि तब महिलाएं केवल बैठकर 'वेदमती शैली' में पंडवानी गाती थीं। तीजनबाई ने सामाजिक बंधनों और पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए हाथ में तंबूरा लेकर, खड़े होकर और गरजती हुई आवाज में महाभारत के प्रसंगों का ऐसा गान शुरू किया, जो इतिहास बन गया।
पाठक जानते हैं कि पंडवानी में महाभारत की कहानियां सुनाई जाती हैं। छत्तीसगढ़ की विशिष्ट लोक कला पंडवानी को पहले केवल पुरुष ही गाते थे, लेकिन स्त्रियों के लिए इसमें दरवाजा खोला लक्ष्मीबाई बंजारे ने, जिन्होंने वेदमती शैली में पंडवानी गाने का साहस दिखाया और उनके बाद तीजनबाई ने कापालिक शैली में यह काम कर दिखाया। तीजनबाई ने छत्तीसगढ़ के गांवों और दुर्ग-भिलाई के आसपास अपनी कला का प्रदर्शन शुरुआत में किया। फिर उन्हें भोपाल के भारत भवन से पंडवानी गाने का न्यौता मिला। यहां पंडवानी गायन के दौरान सुप्रसिद्ध नाटककार हबीब तनवीर तीजन बाई के अभिनय, गायन और गर्जन को देखकर काफ़ी प्रभावित हुए और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उन्हें पंडवानी गाने का मौक़ा दिलवाया। जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपने धारावाहिक 'भारत एक खोज' में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया। इस तरह तीजनबाई की कला घर-घर तक पहुंची। तीजनबाई की प्रतिभा को सम्मानित करते हुए भिलाई स्टील प्लांट ने उन्हें साल 1986 में नौकरी दी। देश में सार्वजनिक निकाय किस तरह रोजगार सृजन के अलावा खेल, कला जैसे क्षेत्रों की हस्तियों को आगे बढ़ाने का काम करते थे, यह उसी का एक उदाहरण था। निजीकरण की अंधी दौड़ में ऐसी जिम्मेदारियां कब तिरोहित कर दी जाती हैं, पता ही नहीं चलता। आईपीएल जैसे आयोजनों में खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त ही नव सामान्य बन चुका है।
बहरहाल, समाज ने तीजनबाई की कला को परखा और सराहा तो वहीं सरकार ने उन्हें पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा। 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी, 2003 में पद्मभूषण, 2018 में फुकुओका पुरस्कार और 2019 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। कला की ऊंचाइयों और इसके बूते समाज में अलग पहचान बनाने वाली तीजन बाई का निजी जीवन त्रासद ही रहा। उनके तीन असफल विवाह रहे। बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ में जब एक बार मंच पर तीजन पंडवानी गा रही थी तो अचानक उनके पति ने अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उनका अपमान किया और मंच पर खड़े हो गए। लेकिन तीजनबाई ने इसका प्रतिकार करते हुए ज़ोर से कहा, 'तुमने केवल मेरा ही नहीं बल्कि मेरी कला और इस मंच का भी अपमान किया है। इसलिए तुम अब माफ़ी के लायक नहीं हो, आज से तुम? मेरे कोई नहीं हो।' तो उनके पारिवारिक जीवन में संघर्ष कभी खत्म ही नहीं हुआ, लेकिन पंडवानी का अभ्यास और गायन नहीं छोड़ा।
महाभारत के पात्रों को मंच पर वे जीवंत करती थीं और इसमें साथ देता था उनका तंबूरा। तंबूरे को सह-कलाकार बताते हुए तीजन बाई ने कहा कि विभिन्न कहानियों में इसका किरदार बदल जाता है। भीम की कथा में यह गदा बन जाता है कि अर्जुन की कथा सुनाते समय धनुष बाण। द्रौपदी के दर्द को तीजनबाई पूरी जीवंतता के साथ बयां करती थीं। तीजनबाई ने कहा था कि द्रौपदी का दर्द उनसे सहन नहीं होता। महिला होकर उसने बहुत संघर्ष किया। शायद महिला होना भी वजह है कि मैं उसके दर्द से व्यथित हो जाती हूं, इसलिए कहानी सुनाते समय डूब जाती हूं।


