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सभ्य समाज में हिंसा की जगह नहीं

आखिरकार वे सारी आशंकाएं सही साबित हो रही हैं, जिनका डर विपक्ष खासकर कांग्रेस पार्टी बरसों से दिखा रही थी।

सभ्य समाज में हिंसा की जगह नहीं
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आखिरकार वे सारी आशंकाएं सही साबित हो रही हैं, जिनका डर विपक्ष खासकर कांग्रेस पार्टी बरसों से दिखा रही थी। भाजपा ने संविधान और लोकतंत्र को दांव पर लगा दिया, यह अब महज आरोप नहीं रह गया है। राहुल गांधी ने कहा था कि नफरत का केरोसिन पूरे देश में छिड़क दिया गया है और अब उसी से चिंगारी भड़काई जा रही है। प. बंगाल में विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस के दो सांसदों के साथ भीड़ ने जो हिंसा की, वह इसी चिंगारी भड़कने का नतीजा है। संविधान और लोकतंत्र को कुचलने की साक्षात तस्वीर है।

शनिवार को प.बंगाल के सोनारपुर में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी चुनाव बाद हुई हिंसा से प्रभावित परिवारों से मिलने जा रहे थे, तब उन पर पहले से इक_ा भीड़ ने अंडे और पत्थर फेंके, उनके साथ धक्का-मुक्की की। अभिषेक बनर्जी के किसी साथी ने उन्हें फौरन हेलमेट पहनने दिया, जिससे उनके सिर पर पत्थर नहीं लग सका। अन्यथा इस घटना के जो वीडियो सामने आए हैं, उनमें से एक में नजर आ रहा है कि एक व्यक्ति ने बड़ा सा पत्थर उन पर निशाना लगाकर फेंका है। इस घटना को चंद घंटे नहीं बीते थे कि टीएमसी के ही एक अन्य सांसद कल्याण बनर्जी पर इसी तरह हमला हुआ, जिसमें उनके सिर पर चोटें आई हैं। लोकतंत्र को लहूलुहान होते देखने को ही क्या अच्छे दिन कहना चाहिए, अब यह जनता को सोचना होगा।

प.बंगाल में चुनाव जीतने के फौरन बाद ही टीएमसी कार्यालयों में तोड़फोड़ और आगजनी की कई घटनाएं हुई थीं। टीएमसी के कई कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट भी हुई थी। हालांकि उस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि बदले की नहीं बदलाव की राजनीति होगी। तो क्या श्री मोदी के मुताबिक बदलाव की यही परिभाषा है कि अराजक भीड़ को हिंसा की छूट मिले और पुलिस प्रशासन मौके से गायब दिखें।

गौरतलब है कि भाजपा नेता अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हुए हमलों को गलत तो कह रहे हैं लेकिन साथ में यह जोड़ना नहीं भूल रहे कि बंगाल का यही रक्त चरित्र रहा है और टीएमसी के लोग भी इसी तरह की गुंडागर्दी किया करते थे। यह तो वही बात हुई कि एक गलत के बदले आप दूसरा गलत करें और उसे अतीत के आधार पर सही साबित करने की कोशिश करें। बंगाल की सुवेन्दु अधिकारी सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने तो यहां तक कह दिया कि जनता टीएमसी से नाराज है तो इन लोगों को घर से नहीं निकलना चाहिए। यानी भाजपा यह स्वीकार कर रही है कि भीड़ की हिंसा जायज है और उसे रोकने की क्षमता भाजपा सरकार में नहीं है। दिलीप घोष ने यह भी कहा कि अभिषेक बनर्जी को हीरो बनने की क्या जरूरत थी। कितनी अजीब बात है कि एक जनप्रतिनिधि अगर जनता के बीच जाए तो उसे हीरो बनना कहा जा रहा है। याद कीजिए कि नरेन्द्र मोदी को भी पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में ऐसे ही हीरो बनने का मौका मिला था, जब थोड़े से किसान उनके काफिले के रास्ते में थे और अपनी शिकायत दर्ज करवाना चाहते थे। तब तो श्री मोदी उनका सामना करने की जगह वापस लौट गए, अपनी रैली रद्द कर दी और पुलिस से कहा कि अपने मुख्यमंत्री से कहना मैं जिंदा लौट गया। देश ने पहली बार किसी प्रधानमंत्री को जनता से इस तरह बचकर लौटते देखा था। प्रधानमंत्री मोदी चाहते तो किसानों से मिलते, उनकी नाराजगी को सुनते और हीरो बन जाते। लेकिन मोदी न खुद हीरो बने न चाहते हैं कि दूसरा कोई इस तरह की हिम्मत दिखाए।

बहरहाल, भाजपा चाहे न चाहे, लेकिन विपक्ष के तमाम बड़े नेता इसी तरह जनता के बीच जाते रहते हैं। उनकी विचारधारा कुछ भी हो और आपसी मतभेद चाहे जितने हों, लेकिन इन सबमें एक बात सामान्य है कि अपने विरोधियों को वे दुश्मन की तरह नहीं मानते हैं। लोकतंत्र में विचारों की असहमति पर विपक्ष के नेताओं का यकीन बरकरार है। प.बंगाल की इस घटना ने अब एक बार फिर समूचे विपक्ष को एक साथ आने और भाजपा के खिलाफ आवाज उठाने का मौका दिया है। शनिवार से लेकर रविवार तक इंडिया गठबंधन के लगभग तमाम बड़े नेताओं ने ममता बनर्जी से बात की, अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हुए हमले की निंदा की और भाजपा के शासन में बढ़ती हिंसा के मद्देनजर लोकतंत्र को लेकर चिंता व्यक्त की।

ध्यान रहे कि जून 2023 में विपक्ष के 16 दल बिहार में एक साथ बैठे थे और भाजपा के खिलाफ खड़े होने पर मंथन किया था तो इंडिया गठबंधन बनने की राह निकली, जिसने 2024 के चुनाव में भाजपा को महज 240 सीटों पर समेट दिया था। 2024 से 2026 तक इंडिया गठबंधन के दल आमतौर पर एकजुट ही रहे और संसद में भी कई मुद्दों पर उन्होंने मिलकर मोदी सरकार को झुकाया। विधानसभा चुनावों में थोड़ी-बहुत दूरी इंडिया के घटक दलों में नजर आई तो भाजपा और मीडिया दोनों ने इसे इंडिया गठबंधन का टूटना ही बताया। लेकिन यह उनकी खुशफहमी से ज्यादा कुछ नहीं था। बंगाल, बिहार जैसे राज्यों को जीतने के बाद भाजपा ने जिस तरह का नफरती माहौल विपक्ष के लिए बना दिया है, उसके बाद विपक्ष का यह दावा और सच साबित हो रहा है कि भाजपा से लोकतंत्र और संविधान दोनों को खतरा है। एसआईआर पर हाल में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है, उसमें भी विपक्ष अब और सावधान हो गया है। इंडिया गठबंधन यह जानता है कि उसकी मजबूती से ही भाजपा को हराया जा सकेगा। इसलिए चुनाव के वक्त ही ममता बनर्जी ने विपक्षी एकजुटता पर जोर दिया था और अब भी वो कह रही हैं कि उनका ध्यान अब विपक्ष को मजबूती से बांधने पर रहेगा, ताकि दिल्ली से भाजपा को हटाया जा सके। ममता बनर्जी का यह ऐलान अब और ज्यादा मायने रखता है।

हालांकि विपक्ष के सामने यह चुनौती अब भी बरकरार है कि उसे बड़ा मकसद हासिल करने के लिए छोटे-छोटे स्वार्थों और मतभेदों को किनारे करना होगा। एकजुटता तभी धरातल पर असर दिखाएगी, अन्यथा केवल बातों में उलझकर रह जाएगी।

नफरत के इस माहौल का बदलना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समूचा समाज एक भयंकर हिंसक प्रवृत्ति के जाल में उलझ चुका है। प.बंगाल में दो सांसदों पर हमले हुए तो घटना पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है, लेकिन भीड़ की हिंसा का शिकार पहले भी कई बार आम नागरिक हो चुका है। तब भी समाज को इतना ही विचलित होना चाहिए, जो वह नहीं हो सका। शाब्दिक या व्यावहारिक किसी भी किस्म की हिंसा के लिए सभ्य समाज में जगह नहीं होनी चाहिए इस बात पर हरेक व्यक्ति ध्यान दे तो माहौल बदलेगा। अन्यथा मोदी सरकार का हाल तो ऐसा है कि न लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने अपने सांसदों के साथ हुई हिंसा पर अफसोस जताया, न प्रधानमंत्री या गृहमंत्री ने।


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