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नीतीश-डीजीपी के सिपाही बनने की कहानी

बिहार में 20 सालों तक सत्ता का निर्बाध आनंद लेने के बाद नीतीश कुमार अब फिर दिल्ली की राजनीति में लौट रहे हैं

नीतीश-डीजीपी के सिपाही बनने की कहानी
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बिहार में 20 सालों तक सत्ता का निर्बाध आनंद लेने के बाद नीतीश कुमार अब फिर दिल्ली की राजनीति में लौट रहे हैं। 2005 में बिहार का मुख्यमंत्री बनने से पहले नीतीश कुमार छह बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं, लेकिन अब सातवीं बार सांसद बनने के लिए उन्होंने राज्यसभा को चुना। बिहार में नीतीश कुमार समेत एनडीए के पांचों उम्मीदवारों ने राज्यसभा चुनाव जीत लिया है। मजेदार बात ये है कि तीन विभिन्न पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष इनमें शामिल हैं। नीतीश कुमार जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उपेन्द्र कुशवाहा राष्ट्रीय लोकमोर्चा के अध्यक्ष हैं और नितिन नवीन बिहार और केंद्र में सत्तारुढ़ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वैसे बिहार में राज्यसभा चुनावों की सबसे खास बात यही रही कि पहली बार किसी मौजूदा मुख्यमंत्री ने राज्य की सत्ता छोड़कर राज्यसभा को चुना हो। राज्य की सत्ता छोड़कर नरेन्द्र मोदी भी आए थे, लेकिन उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा था और सामने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी थी। जबकि नीतीश कुमार ने तो इंडिया गठबंधन इसी नाम पर छोड़ा था कि उन्हें विपक्षी मोर्चे की तरफ से प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया गया था। केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा अगर प्रधानमंत्री बनने की थी, तो उसमें न कुछ गलत है, न आश्चर्य है। लेकिन असली हैरानी इसी बात पर है कि आखिर राज्यसभा के लिए 20 सालों की राज्य की सत्ता को कौन ठुकराता है। अभी तो ये भी तय नहीं है कि नीतीश कुमार को कौन सा मंत्री पद मिलता है, या अगले साल उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाता है। वैसे इतना तो तय है कि इस समय नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से जदयू के लोग तो खुश नहीं ही हैं, बिहार के लोगों को भी भाजपा का ये राजनीतिक खेल समझ नहीं आ रहा है, कि एकदम से उन्हें नीतीशविहीन क्यों किया जा रहा है। उनके पैतृक गांव कल्याण बिगहा में एक व्यक्ति ने बीबीसी से कहा कि यह तो डीजीपी के सिपाही बनने जैसा है। वहीं जदयू में नीतीश के पुराने साथी के सी त्यागी ने तो अब पार्टी ही छोड़ दी, जबकि बहुत से कार्यकर्ताओं ने निशांत कुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की। ये मांग तो शायद ही पूरी हो, लेकिन परिवारवाद की माला जपते हुए नीतीश कुमार ने बेटे निशांत का राजनीति में प्रवेश करा ही दिया है। निशांत कुमार क्या अपने पिता की तरह बिहार के लोगों के दिल में जगह बना पाएंगे, क्या नीतीश कुमार को किसी भी खेमे में रहने के बावजूद जो समर्थन मिलता रहा, वैसा ही समर्थन निशांत कुमार को मिलेगा, नीतीश को इसकी चिंता भी करना चाहिए।

लेकिन नीतीश कु मार के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता बिहार में भाजपा का वर्चस्व कायम होने की होनी चाहिए। एनडीए का सहयोगी होने के बावजूद नीतीश कुमार ने भाजपा को कभी बिहार में बड़ा भाई नहीं बनने दिया था, लेकिन 2025 के चुनावों में भाजपा बड़े भाई से आगे बढ़कर मोहल्ले का दादा ही बन चुकी है। कहा जा रहा है कि अब भाजपा अपने मुख्यमंत्री बनाने का सपना पूरा कर लेगी, इसके लिए शायद पिछले साल चुनावों में ही सौदेबाजी कर ली गई थी कि जनता को दिखाने के लिए नीतीश कुमार को कुछ दिन मुख्यमंत्री बनाया जाए और फिर धीरे से उनसे ये पद ले लिया जाए। अगर इस दावे में दम है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि अक्सर ऐसी सौदेबाजियां भष्ट तरीकों से सत्ता हासिल करने का रास्ता बनाती हैं।

नीतीश कुमार के दिल्ली आने से बिहार में एक बड़ा बदलाव यह होगा कि राज्य से जे पी आंदोलन की बची-खुची यादों की भी विदाई हो जाएगी। शरद यादव रहे नहीं, लालू प्रसाद यादव भी राजनीति में कम ही सक्रिय हैं, उनकी जगह तेजस्वी ने पार्टी संभाल ली है और अब नीतीश कुमार भी पूरी तरह भाजपा के रंग में रंग चुके हैं। 2005 में जब उन्होंने लोकसभा सीट छोड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि वे इतने लंबे समय तक राज्य की राजनीति के केंद्र में रहेंगे। 24 नवंबर 2005 को जब उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तब उन्होंने बिहार को 'जंगलराजÓ से बाहर निकालने का संकल्प लिया था। जिसे जनता ने हाथोंहाथ लिया। हालांकि अब जब उनकी विदाई हो रही है, तब भी हालात सुधरे नहीं हैं, बल्कि जिस सांप्रदायिक धु्रवीकरण से लालू प्रसाद ने बिहार को दूर रखा, वो अब सिर चढ़कर बोल रहा है। नरेन्द्र मोदी की इस राजनीति का विरोध करने के लिए एनडीए से 17 साल पुराना गठबंधन तोड़कर लालू यादव के साथ महागठबंधन नीतीश ने बनाया और तब भी बिहार के मुख्यमंत्री वही रहे। बस थोड़े वक्त के लिए जीतनराम मांझी मुख्यमंत्री रहे, उसमें भी सरकार की डोर नीतीश के पास ही रही। हालांकि 2017 में नीतीश फिर भाजपा के साथ हो लिए, मगर इसके बाद वर्ष 2022 में फिर पाला बदल लिए और साल 2024 के चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर एनडीए में शामिल हो गए।

यह शायद आखिरी मौका था जब नीतीश कुमार ने अपनी मर्जी से फैसला लिया, क्योंकि इस बार भाजपा ने उन्हें ऐसे जकड़ कर रखा कि मोदी सरकार की बहुत सी बातों से असहमत होते हुए भी नीतीश कुमार हामी भरने पर मजबूर रहे। मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा आना भी संभवत: भाजपा की जकड़न का ही परिणाम है।


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