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गर्मी की मार, कौन जिम्मेदार!

जब सरकारें काम करना छोड़कर हिंदू-मुसलमान करने में समय बिताती हैं और जनता इस बात से खुश रहती है कि धर्म की रक्षा हो रही है,

गर्मी की मार, कौन जिम्मेदार!
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जब सरकारें काम करना छोड़कर हिंदू-मुसलमान करने में समय बिताती हैं और जनता इस बात से खुश रहती है कि धर्म की रक्षा हो रही है, तो कैसे सारी व्यवस्था बिगड़ती है और किस तरह जनता ही इसमें सबसे ज्यादा शोषण का शिकार होती है, इसकी ताजा मिसाल गर्मी में लू और बिजली कटौती से मचे हाहाकार के रूप में सामने आई है। देश के बड़े हिस्से में इस समय तापमान चढ़ा हुआ है। जानकार इस गर्मी की तुलना आग के गोले में फंसे होने से कर रहे हैं। लेकिन गर्मी में आम जनता को राहत दिए जाने की जगह बिजली कटौती की दोहरी मार दी जा रही है। प्रधानमंत्री तो पांच देशों में सात दिन बिताकर लौट आए हैं और अब वो अपने वातानुकूलित दफ्तर में रहेंगे, ए सी वाली कार में चलेंगे, जिसमें कितना पेट्रोल खर्च होगा उसका कोई हिसाब नहीं देगा। लेकिन लोग न पेट्रोल-डीजल खरीदने की हालत में बचे हैं, न उन्हें गैस सिलेंडर मिल रहे हैं और न बिजली मुहैया हो रही है। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर से तस्वीरें सामने आई हैं, जहां लोग रसोई गैस के लिए रात भर लाइनों में लगे हैं। गर्मी और मच्छरों से जूझ रहे हैं और सड़क पर मच्छरदानी लगाकर सो रहे हैं। ऐसा ही हाल देश के कई शहरों का है।

दिल्ली में बिजली कटौती पर पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाजपा की रेखा गुप्ता सरकार पर सवाल उठाए हैं। इधर लखनऊ की फैजुल्लागंज से भाजपा विधायक डॉ. नीरज बोरा ने तो राज्य के ऊर्जा मंत्री एके शर्मा को पत्र लिखकर अपने क्षेत्र में बिजली की अघोषित कटौती की समस्या बताई कि पिछले तीन दिनों से लोग बिना बिजली के बेहाल हैं। सोचने वाली बात है कि जब सत्तारुढ़ दल के विधायक भी बिजली कटौती की शिकायत कर रहे हैं, तो हालात कितने बुरे होंगे। लखनऊ में तो बिजली न मिलने से गुस्साए लोगों ने बीते दिनों सीतापुर हाईवे जाम कर विरोध जताया। जब मुसीबत सिर पर आई तो लोग अपना गुस्सा निकाल रहे हैं और बिजली विभाग को कोस रहे हैं। लेकिन असल बात यह है कि सरकार का ध्यान बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं सुलभ करवाने की जगह इस बात पर है कि सड़क पर नमाज पढ़ने से लोगों को कैसे रोकना है। बकरीद से पहले पशु बचाओ मुहिम को कैसे तेज करवाना है। पूरे देश में भाजपा सरकारों का यही रवैया है। लेकिन यह लोगों के समझने की बात है, जो चुनाव के वक्त अपने जीवन स्तर में सुधार लाने के मुद्दे से ज्यादा धार्मिक मुद्दों पर बंटने के लिए तैयार हो जाती है, या फिर मुफ्त योजनाओं के फेर में पड़ती है। लेकिन असल में मुफ्त कुछ भी नहीं मिलता, सब चीजों की कीमत सरकार कहीं न कहीं से वसूल ही लेती है।

जेठ के महीने में गर्मी पड़ना कोई अनूठी बात नहीं है। हमेशा से वैशाख और जेठ के महीने तपते हैं, नौतपा में आसमान से आग बरसती है। लेकिन उनसे बचने के लिए पहले पेड़-पौधे, तालाब आदि बने रहते थे, जो बड़ी तेजी से गायब कर दिए गए हैं। मौसम विभाग के मुताबिक 20 मई को कम से कम 27 शहरों में तापमान 45 डिग्री से ऊपर रहा। इसमें वर्धा, नागपुर, अमरावती, चंद्रपुर, अकोला, यवतमाल छह शहर तो विदर्भ के ही हैं, वहीं बुंदेलखंड क्षेत्र के 4 शहरों बांदा, खजुराहो, दमोह, सतना में भी जबरदस्त गर्मी रही। बांदा में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो पूरे देश और दुनिया में सबसे अधिक रहा। ये दोनों क्षेत्र मध्य भारत के सूखे और अर्ध-सूखे पठारी इलाकों में आते हैं। विदर्भ सतपुड़ा पर्वतमाला के दक्षिण में स्थित है, जहां गर्म हवाएं आसानी से प्रवेश करती हैं। वहीं बुंदेलखंड में चट्टानी जमीन, कम जलसंग्रहण की कम क्षमता और तेज जल निकासी होती है। दोनों जगहों पर मिट्टी नमी को लंबे समय तक नहीं रोक पाती, जिससे सतह तेजी से गर्म हो जाती है। लेकिन इन प्राकृतिक कारणों के अलावा अब मानव निर्मित कारण भी तपिश को और बढ़ा रहे हैं। जिनमें सबसे ज्यादा असर जंगलों के कटने से हो रहा है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड ऐसे तमाम राज्यों में घने जंगलों को विकास कार्यों के नाम पर काट दिया गया।

जिससे इन क्षेत्रों में स्थानीय तापमान को काफी बढ़ गया है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (डब्ल्यू आर आई) के 2023 की स्टडी के मुताबिक, ट्रॉपिकल इलाकों में जंगलों की कटाई से दैनिक अधिकतम तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। विदर्भ में औद्योगिक विस्तार और खनन के कारण वन क्षेत्र तेजी से घटा है, तो बुंदेलखंड में कृषि विस्तार और खदानों ने जंगलों को नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा बुंदेलखंड में बड़े पैमाने पर पत्थर खनन, बालू निकासी और खदानों ने पूरे इलाके को आग के गोले जैसा बना दिया है। खदानों के कारण पेड़ कटाई, मिट्टी का क्षरण और भूजल स्तर के गिरने से जमीन के प्राकृतिक तौर पर ठंडा करने की प्रक्रिया पूरी तरह बिगड़ चुकी है। पेड़ काटने या खनन का काम आम जनता नहीं करती है, सरकार और प्रशासन के संरक्षण में बाकायदा शक्तिशाली लोग यह सब करते हैं। काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की हीटवेव रिस्क स्टडी के अनुसार, ग्लोबल वॉर्मिंग इन सूखाग्रस्त क्षेत्रों को और संवेदनशील बना रही है। पिछले 20-30 वर्षों में इन इलाकों में हीटवेव की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ी है। लेकिन जिस तरह सरकार ने इस तरफ से आंखें मूंद ली हैं और जो कुछ बिगड़ा है, उसे बनाने की कोई कोशिश नहीं हो रही, उससे नजर आ रहा है कि आने वाले सालों में गर्मी और तबाही लाएगी।


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