सत्य निकेतन हादसा और भाजपा की संवेदनहीनता
जिम्मेदारी के नाम पर कुछ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई होती है, लेकिन असल दोषियों को बचा ही लिया जाता है। इस बार भी ऐसा ही होता हुआ दिख रहा है।

देश की राजधानी दिल्ली में सत्यनिकेतन इलाके में एक बहुमंजिला इमारत भरभराकर गिर पड़ी, जिसके कारण कम से कम पांच लोगों की मौत की खबर है और 10 घायल हैं, जिनका अस्पताल में इलाज चल रहा है। लेकिन ये आंकड़े सरकारी हैं, असल में कितनी मौतें हुईं, यह शायद ही पता चले, क्योंकि सरकार अक्सर ऐसी आपदाओं की हकीकत को चालाकी से छिपा जाती है। जिम्मेदारी के नाम पर कुछ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई होती है, लेकिन असल दोषियों को बचा ही लिया जाता है। इस बार भी ऐसा ही होता हुआ दिख रहा है। रविवार दोपहर करीब 1.30 बजे ये हादसा हुआ। लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अब तक इमारत का मलबा हटाने का काम जारी ही है। कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के विनोद जाखड़ समेत तमाम कार्यकर्ता कुछ मिनटों के भीतर ही हादसा स्थल पर पहुंच गए थे और स्थानीय लोगों की मदद से वहां लगातार बचाव कार्य में लगे रहे। जबकि दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत कई अन्य भाजपा नेता काफी देर से वहां पहुंचे, पहले तो इन लोगों ने सोशल मीडिया पर अफसोस जाहिर कर अपना पल्ला झाड़ना चाहा, लेकिन जब इसी सोशल मीडिया पर यह नजर आने लगा कि कांग्रेस के लोग वहां सबसे पहले पहुंचे और लगातार लोगों की जान बचाने की कोशिश करते रहे, जबकि एंबुलेंस, पुलिस सबको पहुंचने में वक्त लगा तो लोगों ने भाजपा पर सवाल उठाने शुरु कर दिए। इसके बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उसी अंदाज में अपना वीडियो बनवाया, जैसे नरेन्द्र मोदी ने ओडिशा में ट्रेन हादसे के बाद बनवाया था।
अभी भी मोदीजी का असंवेदनशील रवैया जारी ही है। नरेन्द्र मोदी ने हादसे की रात यानी रविवार रात 11 बजे के आसपास ट्वीट किया जिसमें उन्होंने पेरिस में मंदिर के उद्घाटन पर ग्रेट जॉय यानी बड़ी खुशी जाहिर की और इसके लिए बाकायदा वीडियो भी जारी किया। घायल और मृत छात्रों के लिए तो खोखले शब्द मोदी ने लिखे, लेकिन मंदिर बनने पर वो जिस तरह गदगद दिखे, उससे समझ आना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता क्या है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी मोदी का ही अनुसरण किया। हादसे पर शोक व्यक्त करने की रस्म अदायगी के बाद नितिन नबीन ने भी रात साढ़े ग्यारह बजे एक ट्वीट में लिखा कि कल प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने विपक्ष के 'नाराज फूफाओं' को होम्योपैथी वाली मीठी और शांत दवा दी, लेकिन इसका असर ऐलोपैथी वाली हाई एंटीबायोटिक जैसा हुआ। कितने अफसोस की बात है कि देश की सबसे बड़ी, ताकतवर और सत्तारुढ़ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास ऐसी आपदा के मौके पर भी विपक्ष पर तंज कसने में व्यस्त हैं। ध्यान रहे कि एनएसयूआई ने दुर्घटना के बाद कुछ ही देर में अपना हेल्पलाइन नंबर तक जारी कर दिया था, ताकि जिन छात्रों को उनके परिजन तलाश रहे हैं, उनकी मदद हो सके। लेकिन न भाजपा न संघ के लोग इस तरह के काम करने के लिए आगे आए। हाल ही में मोहन भागवत ने दावा किया था कि किसी भी आपदा के वक्त संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचते हैं, लेकिन ये स्वयंसेवक सत्य निकेतन में क्यों नहीं दिखे, ये भी मोहन भागवत को बताना चाहिए। संवेदनहीनता की हद ये है कि गोवा में गृहमंत्री अमित शाह भाजपा के नए कार्यालय का उद्घाटन कर रहे थे, लेकिन बाद में खबर ये दी गई कि अमित शाह ने इस हादसे के बाद कार्यक्रम स्थगित कर दिया।
गौरतलब है कि हाल ही में जे पी नड्डा का एक बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि नरेन्द्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने, तब से देश भर में भाजपा के 290 कार्यालय बन चुके हैं, 115 निर्माणाधीन हैं और 123 के लिए जमीन अधिग्रहित की जा चुकी है। कहने की जरूरत नहीं कि हर भाजपा दफ्तर करोड़ों की लागत से बना है। भाजपा सबसे अमीर पार्टी है, तो उसके सामने अपने शानदार दफ्तरों पर खर्च करने की कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन इसी भाजपा के 12 साल के शासन में देश भर में कम से कम एक लाख स्कूल बंद हो चुके हैं। बाकी जो बचे हुए सरकारी स्कूल हैं, वो कितने बदहाल हैं, बताने की जरूरत नहीं। यही हाल कॉलेजों का भी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में ही कम से कम सात लाख छात्र पढ़ते हैं। 70 से अधिक कॉलेज डीयू के अंतर्गत आते हैं लेकिन हॉस्टल की सुविधा करीब 20 कॉलजों के पास ही है, जिसमें बमुश्किल 4 से 7 हजार बच्चों के रहने का इंतजाम होता है। इन हॉस्टल्स की जो दुर्दशा है, वो तो अलग मुद्दा है। लेकिन बाहर से आने वाले जिन बच्चों को हॉस्टल नहीं मिल पाता, वो सत्य निकेतन जैसे इलाकों में बनी इमारतों में बने छोटे-छोटे कमरों में रहने को मजबूर होते हैं। इन के मालिकान बच्चों से मनमाना किराया वसूलते हैं, लेकिन बदले में पानी, बिजली की सुविधाएं ठीक से नहीं मिलती और सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा की होती है। रविवार को हुई दुर्घटना इसकी गवाह है।
अभी 12 और 13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इसके सदस्य देशों के नेता यहां पहुंचेंगे, और उन्हें दिल्ली की चमक-दमक दिखाई जाएगी। और अपनी बदसूरत नाकामी को छिपाने के लिए मोदी सरकार पर्दे भी अच्छे से लगवा देगी। लेकिन अब मोदी और उनकी सरकार और भाजपा को समझ जाना चाहिए कि सोशल मीडिया के इस दौर में सच्चाई परदों से नहीं छिपाई जा सकती है।


