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कॉकरोच जनता पार्टी का असल मकसद

देश में एक बार फिर २०११ वाला माहौल बनता हुआ दिख रहा है। तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे ने लोकपाल आंदोलन शुरु किया था।

कॉकरोच जनता पार्टी का असल मकसद
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देश में एक बार फिर २०११ वाला माहौल बनता हुआ दिख रहा है। तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे ने लोकपाल आंदोलन शुरु किया था। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले महंगाई, भ्रष्टाचार के कथित मामले, स्त्री सुरक्षा आदि पर एकदम से गुस्सा सतह पर दिखने लगा था। अब वैसी ही नाराजगी इस समय भी सरकार के खिलाफ दिखाई दे रही है। सोशल मीडिया पर भी एक नयी मुहिम चल पड़ी है, जिसे कॉकरोच जनता पार्टी नाम दिया गया है। दरअसल बीते दिनों भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक वकील की याचिका पर सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवकों का जिक्र करते हुए कॉकरोच वाली टिप्पणी की थी, जिस पर काफी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आईं और आलोचना इतनी बढ़ गई कि मुख्य न्यायाधीश को स्पष्टीकरण देना पड़ा कि उन्होंने नौजवानों के लिए ऐसा नहीं कहा था। बहरहाल, उनका इरादा जो भी रहा हो, लेकिन किसी की भी तुलना कॉकरोच से किए जाने पर समाज में नाराजगी देखी गई, जो स्वाभाविक है। इसी नाराजगी के चलते व्यंग्य करने की तर्ज पर अमेरिका के बोस्टन में पढ़ रहे अभिजीत दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी नाम का आंदोलन सोशल मीडिया पर खड़ा किया, जिसकी अब चारों तरफ चर्चा हो रही है। विपक्ष के कई बड़े नेताओं ने इस आंदोलन से खुद को जोड़ा। इंटरनेट पर कॉकरोच के मीम वायरल होने लगे। दिल्ली में यमुना नदी को साफ करने कुछ स्वयंसेवी आगे आए तो उन्होंने कॉकरोच की पोशाक पहनी। तुम राष्ट्रवादी कॉकरोच हो, या राष्ट्रविरोधी। पाकिस्तानी कॉकरोच हो या हिंदुस्तानी, ऐसे कार्टून बनने लगे। बहुत सारे एआई जनरेटेड वीडियो बने, जिसमें कहीं मेलोडी चॉकलेट को कॉकरोच कुतर रहे हैं, कहीं भ्रष्ट हो चुकी संस्थाओं पर हमला कर रहे हैं। गरज यह कि कॉकरोच इस समय भारतीय राजनीति का अहम किरदार बन गया है।

लेकिन २०११ और २०२६ के माहौल में सबसे बड़ा फर्क यही है कि इस वक्त नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने की कोई मुहिम नहीं चल रही है। अन्ना आंदोलन का प्रत्यक्ष मकसद तो भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने और व्यवस्था सुधारने के लिए लोकपाल को लाना था, लेकिन छिपा हुआ मकसद यही था कि किसी तरह कांग्रेस को सत्ता से दूर किया जाए। मगर अब जो सरकार से नाराजगी सोशल मीडिया के जरिए व्यक्त हो रही है, उसमें सवाल उठ रहे हैं कि क्या उसका भी मकसद कांग्रेस की बढ़ती ताकत को ही खत्म करना है। क्या कांग्रेस से खुद को बचाने के लिए भाजपा ने फिर कोई नया मुखौटा तैयार कर लिया है। क्योंकि भाजपा में भी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लेकर दो फाड़ दिख रही है। निशिकांत दुबे और किरण रिजीजू जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि सोशल मीडिया पर उभरे इस ट्रेंड के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है, जिसका मकसद भारत को अस्थिर करना है। किरण रिजीजू ने लिखा, 'मुझे उन लोगों पर तरस आता है जो सोशल मीडिया पर पाकिस्तान और जॉर्ज सोरोस गैंग से अपने फॉलोअर्स तलाशते हैं। भारत के पास अपनी पर्याप्त आबादी और अत्यधिक ऊर्जावान युवा हैं, जो वास्तविक और मूल्यवान फॉलोअर्स बन सकते हैं! भारत विरोधी गैंग से सत्यापन लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।' केंद्रीय मंत्री के इस बयान के बाद अभिजीत दिपके ने जवाब दिया है कि, 'डेटा के अनुसार हमारे ९४ प्रतिशत से अधिक फॉलोअर्स और दर्शक भारत से ही हैं। आखिर एक केंद्रीय मंत्री भारतीय युवाओं को पाकिस्तानी का टैग क्यों दे रहे हैं?' वहीं निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया कि यह आंदोलन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। लेकिन केरल भाजपा के नेता राजीव चंद्रशेखर ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को दिए एक इंटरव्यू में कहा, 'इसमें ऐसी कई निशानियां दिख रही हैं जो यह बताती हैं कि यह कोई सुनियोजित और पहले से तय की गई चीज है, न कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के किसी बयान के खिलाफ अचानक भड़का कोई गुस्सा। उन्होंने यह भी कहा कि हमें हर उस व्यक्ति पर शक नहीं करना चाहिए, जिसकी राय हमसे अलग है।'

तो यह नजर आ रहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी और ताकतवर पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा, जो पिछले १२ सालों से सत्ता पर बनी हुई है, जो नरेन्द्र मोदी को महामानव की तरह पेश करती है, वो कॉकरोच जनता पार्टी से असहज महसूस कर रही है। हालांकि लोगों को अपना गुस्सा जाहिर करने का जो मंच सोशल मीडिया पर छेड़े गए एक आंदोलन से मिला, कांग्रेस वही मंच बरसों से जनता को देती आ रही है। राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा में आम जनता को सुना और अब भी सुन रहे हैं। नीट पेपर लीक, मनरेगा हटाना, संविधान बचाने की लड़ाई, महंगाई, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, एसआईआर, किसान-मजदूर के हक, स्त्री सशक्तीकरण हर मुद्दे पर कांग्रेस बार-बार सड़क पर उतरी है। सोचने वाली बात यह है कि जब कांग्रेस पिछले कई सालों से लगातार जनहित के मुद्दों को उठाती आ रही है, तब उसकी कोशिशों की चर्चा उतनी क्यों नहीं होती, जितनी अभी कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी की हो रही है। सीजेपी के कितने इंस्टाग्राम फॉलोअर हैं, उसने भाजपा को कैसे पछाड़ा, युवा कैसे सीजेपी से जुड़ रहा है, ये सारी चर्चा सोशल मीडिया और मीडिया पर है।

सत्ता के खिलाफ नाराजगी कोई नयी बात नहीं है। बल्कि यह तो स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है कि जनता बेखौफ सरकार से अपने गुस्से और शिकायतों का इजहार कर सके। लेकिन सवाल यह है कि क्या सीजेपी की मुहिम भी भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए है, या फिर ध्यान भटकाने के लिए है। क्योंकि कांग्रेस के खिलाफ जब भी मुहिम चली, उसे सत्ता से हटाने के लिए ही चली। ८० के दशक में इंदिरा गांधी को हटाने के लिए जेपी आंदोलन चला था, फिर राजीव गांधी को हटाने के लिए कांग्रेस विरोधी शक्तियों ने फिर से हाथ मिलाया। जब सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद से दूर रहीं और डॉ.मनमोहन सिंह के हाथ में सरकार का नेतृत्व सौंपा, तब भी कांग्रेस को हटाने की इकतरफा मुहिम अन्ना हजारे को सामने रखकर छेड़ी गई, जिसके निशाने पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही रहे। यानी जब भी कांग्रेस सत्ता में रही और गांधी परिवार उसका हिस्सा रहा तो सरकार गिराने की चालें चली गईं। जब गांधी परिवार सत्ता का हिस्सा नहीं रहा, जैसे १९९१ से ९६ तक, तो कोई मुहिम नहीं चलाई गई। यानी सरकार से नाराजगी एक बात है और सरकार बदलने के लिए समाज को तैयार करना दूसरी बात है। इसलिए अभी मोदी सरकार के खिलाफ पर्याप्त नाराजगी, असंतोष और शिकायतों के बावजूद नए आंदोलन खड़े करने वाले भाजपा को हटाने की मुहिम नहीं चलाते हैं, तो इसे रेखांकित करना जरूरी है कि आखिर उनका असल मकसद क्या है।


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