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कठपुतली व्यवस्था में गणतंत्र पर खतरा

देश आज 77 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। इस बार यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो लुईस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि होंगे

कठपुतली व्यवस्था में गणतंत्र पर खतरा
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देश आज 77 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। इस बार यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो लुईस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि होंगे। अमेरिका की तरफ से थोपे गए टैरिफ और व्यापार समझौते को लेकर बनाए जा रहे दबाव के बीच यूरोपीय संघ से मुख्य अतिथि बनाने के फैसले को फिर से मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक करार दिया जा रहा है। खबर है कि यूरोपीय काउंसिल और यूरोपीय कमीशन के साथ भारत ऐसा व्यापार समझौता कर सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था को लाभ हो। ऐसा होता है, तो यह वाकई अच्छी बात होगी। वहीं गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार जिन हथियारों का प्रदर्शन किया जा रहा है, उनसे पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की रूह कांप जाएगी, ऐसे शीर्षकों से भी समाचार आ रहे हैं। इन सबके बीच राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाने और वंदे मातरम के लिए राष्ट्रगान जैसे नियम बनाने की भी खबरें हैं। सोचने वाली बात ये है कि क्या गणतंत्र दिवस व्यापार समझौतों और शक्ति प्रदर्शन का अवसर है, सरकारी विज्ञप्तियों में सत्ता के प्रचार का अवसर है या फिर संविधान को बचाए और बनाए रखने की प्रतिबद्धता दिखाने का अवसर है।

सत्ता के हक में चलाई जा रही प्रायोजित खबरों के बीच कुछ और खबरें भी आई हैं, जो संविधान पर बढ़ रहे खतरे को दिखा रही हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने प.बंगाल में चल रही एसआईआर की प्रक्रिया पर कहा है कि एसआईआर अगर सावधानी से और पर्याप्त समय लेकर किया जाए तो यह एक अच्छी लोकतांत्रिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इस समय पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं हो रहा है। यह न सिर्फ मतदाताओं के साथ अन्याय है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के साथ भी अनुचित है। गौरतलब है कि श्री सेन किसी पार्टी से संबद्ध नहीं हैं और उनका बौद्धिक स्तर भी काफी ऊंचा है, ऐसे में उनकी बात को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लेकिन अभी तो उन्हें ही चुनाव आयोग ने नागरिकता साबित करने का नोटिस भेज दिया है। एक खबर दक्षिण भारत के तीन गैरभाजपा शासित राज्यों से है। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक तीनों राज्यों में राज्यपालों ने सरकार के साथ सीधे टकराव का रास्ता चुना है। तमिलनाडु में राज्यपाल आर एन रवि ने विधानसभा में अभिभाषण पढ़ने से इंकार कर दिया। कर्नाटक में राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने राज्य विधानमंडल के संयुक्त सत्र में अपना परंपरागत अभिभाषण केवल तीन वाक्यों (सरकार द्वारा तैयार किए गए विस्तृत भाषण के पहले और आखिरी वाक्यों समेत) में समाप्त कर दिया। और केरल में राज्यपाल राजेन्द्र अर्लेकर ने अपने भाषण से उन हिस्सों को हटा दिया, जिनमें केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना थी। जाहिर है तीनों राज्यपालों ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों की जगह मोदी सरकार के प्रति वफादारी को निभाने की राह चुनी। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस पर लिखा, ''प्रधानमंत्री मोदी खुद को भारत का वायसराय मानते हैं- जो दिल्ली से राज्य सरकारों को रिमोट कंट्रोल से नियंत्रित करने के लिए राज्यपालों का इस्तेमाल करते हैं।

एक अन्य खबर न्यायपालिका पर सत्ता के बढ़ते दबाव की है। पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में प्रिंसिपल जी.वी. पंडित मेमोरियल लेक्चर में सुप्रीम कोर्ट के जज उज्ज्वल भुइयां ने इस बात पर चिंता जताई है कि आज न्यायपालिका पर सबसे बड़ा ख़तरा 'अंदर से' आ सकता है। उन्होंने कहा, 'अगर किसी केस का फ़ैसला सिर्फ यह जानकर तय हो जाए कि कौन सा जज या बेंच सुन रहा है, तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद होगा।' जस्टिस भुइयां ने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र और कानून के राज की रक्षा के लिए ज़रूरी है। इसके लिए ऐसे जज चाहिए जो समय की राजनीतिक हवाओं के खिलाफ सीधे खड़े रहें।

जस्टिस भुइयां को यह बात जजों के तबादले और कॉलेजियम व्यवस्था में सरकार की दखलंदाजी के कारण कहनी पड़ी। हाल ही में उत्तरप्रदेश के संभल में तीन-चार दिनों में दो बार सीजेएम के तबादले हो गए हैं। संभल हिंसा मामले में तत्कालीन सीजेएम विभांशु सुधीर ने 9 जनवरी को एएसपी अनुज चौधरी समेत 20 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया तो विभांशु सुधीर का अचानक तबादला हो गया उनकी जगह इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जज आदित्य सिंह को संभल का नया सीजेएम बनाया। आदित्य सिंह ने ही पहले संभल की जामा मस्जिद सर्वे का आदेश दिया था। लेकिन इस नियुक्ति पर भी विवाद हुआ तो कुछ घंटों में ही आदित्य सिंह को भी हटा दिया गया। अब नए सीजेएम को संभल भेजा गया है।

इससे पहले दिल्ली दंगों में भी भाजपा नेताओं के खिलाफ आदेश देने वाले जस्टिस मुरलीधरन का भी आधी रात को तबादला कर दिया गया था। हाल ही में राजस्थान में अडानी के खिलाफ फैसला सुनाने वाले जज दिनेश कुमार गुप्ता का भी ट्रांसफर कर दिया गया था।

मध्यप्रदेश में कर्नल सोफिया कुरैशी के अपमान पर एक मंत्री के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेने वाले जस्टिस अतुल श्रीधरन का भी इसी तरह तबादला हुआ, जिसका जिक्र करते हुए जज भुइयां ने कहा कि जस्टिस अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ट्रांसफर करने का प्रस्ताव किया था। लेकिन केंद्र सरकार की पुनर्विचार की मांग पर इसे बदलकर इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया। कॉलेजियम के रिकॉर्ड में खुद लिखा है कि यह बदलाव सरकार की मांग पर हुआ। क्या किसी जज को सिर्फ इसलिए ट्रांसफर किया जाए क्योंकि उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ कुछ असुविधाजनक फैसले दिए? क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती?

जस्टिस भुइयां ने कहा, 'कॉलेजियम सदस्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सिस्टम पर कोई दखल न हो। हम जजों ने संविधान की रक्षा की शपथ ली है - बिना डर, पक्षपात, स्नेह या द्वेष के। हमें अपनी शपथ पर खरा उतरना होगा।' उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता अटल है और इसे हर कीमत पर बचाना होगा।

न्यायपालिका, चुनाव आयोग, जांच एजेंसियां, संवैधानिक पद, जब सब को सत्ता कठपुतली की तरह इस्तेमाल करेगी, तो फिर संविधान कैसे बचेगा और गणतंत्र कैसे बचेगा, आज इस सवाल पर जनता को विचार करना चाहिए।


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