आंदोलन के बाद अगला कदम या जश्न
कॉकरोच जनता पार्टी की पहल पर जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन शुरु हुआ, जिसमें स्वत:स्फूर्त लोग जुड़ते गए।

कॉकरोच जनता पार्टी की पहल पर जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन शुरु हुआ, जिसमें स्वत:स्फूर्त लोग जुड़ते गए। सोनम वांगचुक जैसे सामाजिक कार्यकर्ता इस आंदोलन का अहम चेहरा बन गए, क्योंकि उन्होंने छात्रों को इंसाफ दिलाने के लिए अनशन किया। कॉकरोच जनता पार्टी या सीजेपी के दो प्रमुख प्रवक्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के आधिकारिक एक्स एकाउंट पर सोनम वांगचुक की ही तस्वीर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक लगी हुई है। अब धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन खत्म हो गया है, सोनम वांगचुक को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, तो राजघाट पर प्रणाम कर वे लद्दाख जा चुके हैं। अनशन तो उन्होंने प्रधान के इस्तीफे से पहले ही खत्म कर दिया था, वो भी केन्द्रीय मंत्री के हाथ से जूस पीकर और भगवा पटका ओढ़कर। इधर जंतर-मंतर पर साफ-सफाई भी हो चुकी है। लिहाजा पिछले सवा महीने से धरने के मंच पर बैठे सीजेपी के लोगों को भी फुर्सत मिल गई है। शायद प्रधान के इस्तीफे की खुशी में या शायद आंदोलन की थकान उतारने के लिए इन लोगों ने एक पार्टी की, जिसकी तस्वीरों और वीडियो पर अब सवाल उठ रहे हैं, जो लाजिमी भी हैं।
दिल्ली में कथित तौर पर किसी पांच सितारा होटल में सौरव दास, आशुतोष रांका समेत सीजेपी के कई लोगों के नाचते-गाते वीडियो आए हैं। ये पार्टी बिल्कुल वैसी ही है, जैसी नयी पीढ़ी यानी जेन ज़ी की होती है। डीजे पर एक के बाद एक बजते पार्टी सांग्स और उस पर थिरकते युवा। नए साल या जन्मदिन अथवा किसी और मौके पर आज के बच्चे ऐसे ही जश्न मनाते हैं। लेकिन इनकी मुहिम क्या यहीं तक थी। ध्यान रहे कि धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के अलावा अब तक सरकार ने इनकी बाकी मांगों पर केवल आश्वासन ही दिया है, उन पर अमल नहीं हुआ है। पेपर लीक के कारण जिन बच्चों ने अपनी जान गंवाई, उनके परिजनों के लिए पहले एक करोड़ के मुआवजे की मांग थी, जो सरकार की तरफ से उचित मुआवजा दिया जाएगा में बदल दी गई। ये भी कहा गया था कि आंदोलन के कारण जिन लोगों पर मामले दर्ज हुए हैं, वो वापस किए जाएंगे। लेकिन क्या सरकार के कहने को ही पर्याप्त माना जाए। क्योंकि सरकार ने तो यह भी कहा था कि पेपर लीक के दोषियों पर कार्रवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर दिया गया है। सोमवार को राउज एवेन्यू कोर्ट में फास्ट ट्रैक अदालत बैठी भी, लेकिन सीबीआई के वकील पहुंचे नहीं तो अब ये सुनवाई 3 अगस्त तक टाल दी गई है। क्या फास्ट ट्रैक अदालतें ऐसे ही चलेंगी। सीबीआई भी सरकार से बाहर तो नहीं है, ऐसे में सवाल तो उठेगा ही सीबीआई ने फास्ट ट्रैक को अहमियत क्यों नहीं दी। क्यों उसके वकीलों ने तय तारीख पर उपस्थित होना जरुरी नहीं समझा।
इधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ्रैंड्स कहते हुए एक और रील बना दी, इस बार खड़े होकर इंस्टाग्राम पर संदेश दिया है कि नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में छह सदस्यों वाली उच्च अधिकार समिति बनाई गई है, जो परीक्षा में सुधार पर काम करेगी और इसमें तकनीकी के सर्वोत्कृष्ट उपयोग पर खास ध्यान दिया जाएगा। इन्हीं श्रीमान नीलेकणि ने यूपीए सरकार में आधार कार्ड की अवधारणा पर काम किया था, तब भाजपा को इस पर घोर आपत्ति थी। बहरहाल, ये उच्चाधिकार समिति चाहे जितने सुधारों की सिफारिश कर ले और अच्छी से अच्छी तकनीक से परीक्षाएं करवाने के सुझाव दे, लेकिन जिन लोगों को इस पर असल में काम करना है, उसे व्यवहार में उतारना है, क्या वे सब एकदम से सौ प्रतिशत ईमानदार हो जाएंगे। फास्ट ट्रैक अदालत का पहला हश्र देखकर ही यह आशंका उठ रही है।
पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं था, देश के बाकी शहरों में भी यह उतनी ही तीव्रता के साथ खड़ा हुआ। बिहार में भी दिल्ली की तरह पुलिस की दमनकारी नीति सामने आई। बल्कि सीवान में अभिषेक पटेल नाम के पुलिसकर्मी ने एके 47 जैसे हथियार से आंदोलनकारियों पर गोली चलाई, इसका वीडियो सामने आया है। जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने इस पर आवाज उठाई तो अभिषेक पटेल को निलंबित किया गया है। लेकिन इससे पहले भाजपा नेता संबित पात्रा राहुल गांधी पर इस बारे में झूठ बोलने के आरोप लगाते हुए माफी की मांग कर चुके थे। जबकि पुलिसकर्मी पटेल का निलंबन बताता है कि विपक्ष ने केवल तथ्य सामने रखा था। बिहार की जेलों में अब भी बहुत से आंदोलनकारी बंद हैं और उन पर मामले दर्ज किए गए हैं। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा उन प्रदर्शनकारियों का साथ देने बिहार जा रही हैं। नेहा ने भी 23 दिनों तक अनशन किया था और सोनम वांगचुक की तरह न उन्हें मेदांता में भर्ती किया गया, न सरकार के मंत्रियों ने उनका अनशन खत्म करवाया। नेहा ने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद वैसी पार्टी नहीं की, जैसी सौरव दास और आशुतोष रांका ने की है। हालांकि पार्टी करने पर सवाल उठे तो सौरव दास का कहना है कि हम जितने दिन ज़रूरत होगी, उतने दिन सड़क पर बैठ सकते हैं। हम नाचते-गाते हुए भी प्रदर्शन कर सकते हैं। हम हाथ में कोल्ड कॉफी लेकर भी आंदोलन को संगठित कर सकते हैं। बदलाव के लिए लड़ने के लिए हमारा वैसा दिखना ज़रूरी नहीं है, जैसा पिछली पीढ़ियां किसी आंदोलन से उम्मीद करती हैं। सौरव दास ने यह भी कहा कि अंकल-आंटी चाहे जितनी शिकायत करते रहें, उन्हें हमारी इस पीढ़ी के साथ जीना और हमें स्वीकार करना ही होगा।
संभवत: सौरव दास यहां भी पीढ़ियों के अंतर को प्राथमिकता दे रहे हैं और मौके की नजाकत उनके लिए दोयम है। आप बेशक कोल्ड कॉफी पिएं या बर्गर खाएं, नाच-गाकर जश्न मनाएं, लेकिन उससे पहले अपने संघर्ष को अंजाम तक तो पहुंचाएं। जब इंसाफ की आवाज उठाए लोगों को जेल में भरा गया है, आंदोलनकारियों के लिए लगातार भोजन का इंतजाम करने वाले मो.जुनैद जैसे मददगारों को पुलिस तंग कर रही है, कई गरीब छात्र जो खाली जेब और खाली पेट जंतर-मंतर पर आए और वैसे ही लौट गए, उनमें अब तक निराशा भरी हुई है, तब मंच पर बैठने वालों का जश्न मनाना सही है, यह सवाल सीजेपी के लोगों को खुद से पूछना चाहिए। उस मंच पर महात्मा गांधी, डा. अंबेडकर और भगत सिंह तीनों महान नायकों की तस्वीरें प्रेरणा लेने के लिए लगाई गई थीं, ये लोग आज इस आंदोलन का हिस्सा होते तो आंदोलन के दौरान पीड़ितों की खैर-खबर लेने किसी गली-कूचे में भटकते, होटल में आराम फरमाते नहीं दिखते।
वैसे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक खबर है कि कॉकरोच जनता पार्टी अब वकीलों की मदद से उन लोगों की कानूनी मदद करेगी, जिन्हें आंदोलन में शामिल होने के कारण पुलिसिया कार्रवाई झेलनी पड़ रही है।


