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विसंगतियों का शिकार नयी पीढ़ी

नरेन्द्र मोदी बार-बार देश के भविष्य की बात करते हैं, उसमें वे भाजपा की भूमिका भी रेखांकित करते हैं। लेकिन इस भविष्य में युवा कहां हैं, यह इस समय देश के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए।

विसंगतियों का शिकार नयी पीढ़ी
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नरेन्द्र मोदी बार-बार देश के भविष्य की बात करते हैं, उसमें वे भाजपा की भूमिका भी रेखांकित करते हैं। लेकिन इस भविष्य में युवा कहां हैं, यह इस समय देश के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए। क्योंकि असल में तो देश का भविष्य नयी पीढ़ी से ही बनेगा। लेकिन ये नयी पीढ़ी आज जिन समस्याओं और विसंगतियों का शिकार हो रही है, उस पर नरेन्द्र मोदी कुछ नहीं कह रहे हैं। ताजा उदाहरण नीट पेपर लीक मामले का है, जिस पर सीबीआई जांच आगे बढ़ाते हुए गिरफ्तारियां तो कर रही है, लेकिन अब तक शिक्षा मंत्री ने नैतिक आधार पर इस्तीफे की पेशकश नहीं की है। कई छात्रों ने पेपर लीक होने के अवसाद में आत्महत्या कर ली, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अफसोस के दो शब्द उनके लिए नहीं कहे। देश का मुखिया होने के नाते उन्हें सबसे पहले इस बात की फिक्र होनी चाहिए थी कि आखिर किसी भी नौजवान को इस बात की चिंता क्यों हुई कि एक परीक्षा रद्द हो गई तो उसके भविष्य का क्या होगा। सरकार युवाओं को इस बात की आश्वस्ति क्यों नहीं दे सकी कि आईंदा ऐसा नहीं होगा और न ही उसके भावी जीवन पर इससे कोई संकट आएगा।

राहुल गांधी समेत विपक्ष के लगभग तमाम नेता पेपर लीक के इस मामले में मोदी सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। लेकिन हमेशा की तरह सरकार विपक्ष की मांग की उपेक्षा कर रही है। मानो यह कोई राजनीति का विषय है, जिस में अपना वर्चस्व दिखाने के लिए विरोधी पक्ष को नीचा दिखाया जाए। सरकार इस नजरिए से क्यों नहीं सोच रही है कि पेपर लीक का शिकार बच्चे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का विषय नहीं हैं। पीड़ित बच्चे न किसी एक दल के समर्थक हैं, न उनके अभिभावक किसी दल विशेष के मतदाता, बल्कि ये तो देश का आने वाला कल हैं। ये बच्चे अगर आज अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं, अपने साथ हो रहे अन्याय पर हताश हो रहे हैं और ऐसे में विपक्ष उनके हक में आवाज उठाए तो कायदे से सरकार को इसमें विपक्ष का सहयोग लेकर व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहिए। लेकिन यहां सरकार से जिस उदार नजरिए की अपेक्षा है, वह पूरी तरह नदारद है। प्रधानमंत्री मोदी का यही रवैया पिछले 12 सालों से देश देख रहा है कि वे कभी भी पीड़ितों के पक्ष में खड़े नहीं दिखे। किसान, मजदूर, महिलाएं, आदिवासी, दलित, पिछड़े और अब छात्र, जिस भी वर्ग ने अपनी पीड़ा सरकार को बताने की कोशिश की, अपने हक की मांग सरकार के सामने रखी, उन्हें दमन का शिकार होना पड़ा।

सरकार अच्छे से जानती है कि नीट के पेपर पहली बार लीक नहीं हुए हैं, फिर भी उसका लापरवाह रवैया बना रहा, जबकि इससे लाखों छात्रों का भविष्य जुड़ा है। अभी सीबीआई जांच तो हो रही है, लेकिन व्यवस्था इससे सुधर पाएगी, यह सवाल उठ रहा है। क्योंकि सीबीआई जांच में जिस शिक्षिका मनीषा मंधारे को इस पूरे घोटाले का मास्टरमाइंड बताया गया है, वह नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) में पेपर सेटिंग कमेटी की सदस्य रही हैं। पिछले पांच-छह सालों से प्रश्नपत्र तैयार करने में उनकी भूमिका रही है। यानी पेपर लीक एक-दो दिनों का काम नहीं है, उसके लिए बाकायदा योजना बनाई गई होगी। आरोपी शिक्षिका पेपर सेटिंग में अगर संलग्न थी, तो उन्हें वहां तक पहुंचाने वाले और फिर उनके जरिए पेपर लीक करके कई छात्रों से लाखों वसूल करके उन्हें मेडिकल में प्रवेश दिलाने वालों तक का पूरा गिरोह बना होगा। क्या इस गिरोह की सच्चाई कभी सामने आएगी। मध्यप्रदेश में व्यापमं घोटाले को ही याद कर लें, जिसमें मामले को उठाने वालों, उस पर सवाल करने वालों की जान पर बन आई, लेकिन पीड़ितों को कोई इंसाफ नहीं मिला।

प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक या अन्य घोटालों के अलावा अभी जिस तरह स्कूली शिक्षा का हाल चल रहा है, वह भी सीधे बच्चों के भविष्य और उनके कोमल मन के साथ खिलवाड़ ही है। पाठ्यपुस्तकों को राजनैतिक एजेंडा पूरा करने का जरिया तो बना ही लिया गया है, प्रयोग के नाम पर बच्चों पर कभी भाषा, कभी नए विषयों का दबाव डाला जा रहा है। नए जमाने के हिसाब से अगर बच्चों को तैयार करना है तो इसके लिए शिक्षकों को पहले तैयार करना होगा, लेकिन कम अनुभवी, अप्रशिक्षित शिक्षकों के हवाले बच्चों को सौंपा जा रहा है। इसके अलावा जिस तरह बोर्ड परीक्षाएं ली जा रही हैं, वह भी बच्चों के भविष्य के साथ जुआ खेलने जैसा है।

अभी बुधवार को सीबीएसई ने 12वीं कक्षा के नतीजे जारी किए, जिसमें 85.20 प्रतिशत छात्र ही उत्तीर्ण हो पाए हैं, यह पिछले साल के 88.39 प्रतिशत की तुलना में क़रीब तीन प्रतिशत कम है। इस बार सीबीएसई ने उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए पहली बार ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली लागू की। इसके तहत लगभग 98.67 लाख कॉपियों को स्कैन कर डिज़िटल रूप से जांचा गया। बोर्ड का दावा है कि इससे मूल्यांकन प्रक्रिया तेज़, पारदर्शी और त्रुटिरहित हुई, और इसी वजह से परिणाम भी कम समय में घोषित किए जा सके। अब सोचने वाली बात यह है कि सीबीएसई परीक्षा करवाने और पेपर जांच कर समय पर परिणाम निकालने के लिए सुविस्तृत और सुविचारित योजना क्यों नहीं बनाती, ताकि उसे किसी बात की हड़बड़ी न रहे।

डिजीटली पेपर जांच होना सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन क्या इतने बड़े देश में जहां कुछ छात्रों को स्मार्ट कक्षाओं की विलासिता मिली है और कुछ के पास स्कूल में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं, क्या सारे बच्चों के पेपर इतने एक समान तरीके से हो पाए होंगे कि उन्हें डिजीटल जांचा जाए। इस काम में जितने भी शिक्षक लगे थे, क्या वे पूरी तरह से इसके लिए प्रशिक्षित थे। वैसे सीबीएसई ने दावा किया है कि इसकी मॉक ड्रिल कराई गई थी, लेकिन उसकी प्रभावोत्पादकता कितनी रही, यह कैसे तय किया गया। कई छात्रों का आरोप है कि डिज़िटल मूल्यांकन में उनके विस्तृत उत्तरों का सही आकलन नहीं हुआ। वहीं सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ एक ऑनलाइन याचिका पर 24 घंटे के भीतर 10 हज़ार से अधिक हस्ताक्षर किए जा चुके हैं, इससे समझ आता है कि छात्र और उनके अभिभावक इस नयी प्रणाली से संतुष्ट नहीं हैं। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक कृष्णा कुमार का कहना है कि ओएसएम को जल्दबाज़ी में लागू किया गया और स्कैन की गई कॉपियों की गुणवत्ता व मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल हैं।

डिजीटली पेपर जांच के अलावा स्कूलों में पढ़ाई का गिरता स्तर, नए तरीकों से बच्चों का सामंजस्य न बिठा पाना, कोचिंग कक्षाओं का दबाव जैसे कई कारक हैं जिनकी वजह से बारहवीं का परिणाम खराब हुआ और अब उसका असर बच्चों को स्नातक कक्षाओं में प्रवेश लेने के वक्त भुगतना पड़ेगा। यानी बड़ों की गलती का खामियाजा बच्चे लगातार भुगत रहे हैं, क्या ऐसे हम देश का भविष्य बनाएंगे।


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