खतरे में देश की सुरक्षा और विकास
मणिपुर के बाद अब अरुणाचल प्रदेश के हालात बिगड़ रहे हैं।

पिछले तीन सालों से मणिपुर में जारी हिंसा पर मोदी सरकार अब तक रोक नहीं लगा पाई है। मुख्यमंत्री का इस्तीफा, राष्ट्रपति शासन और फिर नए मुख्यमंत्री के आने के बावजूद कुकी और मैतेई समुदायों के बीच जो जातीय हिंसा शुरु हुई, वो किसी भी तरह रुकने का नाम नहीं ले रही है। अभी अक्टूबर महीने में ही कम से कम 14 लोगों की जान इस हिंसा में चली गई है। लेकिन पुलिस का कहना है कि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी ज़रूरी उपाय किए जा रहे हैं। मुमकिन है पुलिस अपनी हद में संभव सारे उपायों को आजमा भी रही हो, लेकिन जब तक सरकार नहीं चाहेगी, शांति कायम नहीं होगी, यह तथ्य है। राज्य और देश में पुलिस का नहीं भाजपा का शासन है, लिहाजा पहली जिम्मेदारी उसी की बनती है। मगर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने पूर्वोत्तर राज्यों को उनके हाल पर छोड़ दिया है, यह लगातार नजर आ रहा है।
मणिपुर के बाद अब अरुणाचल प्रदेश के हालात बिगड़ रहे हैं। एक तरफ चीन की तरफ से अतिक्रमण रुक नहीं रहा है और दूसरी तरफ सियांग बांध परियोजना के विरोध में स्थानीय लोग उतर आए हैं। देश के मीडिया का वह हिस्सा जो खुद को मुख्यधारा कहता है, उसका भी रवैया पूर्वोत्तर को लेकर सरकार से अलग नहीं है। यहां की खबरें उसके लिए तभी मायने रखती हैं, जब उनसे कुछ सनसनी फैलाने की गुंजाइश उसे नजर आए। वर्ना क्या कारण है कि अरुणाचल प्रदेश के लोग जब लगातार चीन की घुसपैठ को लेकर आवाज उठा रहे थे, यहां तक कह रहे थे कि कुछ दिन में हम चीनी कहलाएंगे, भारतीय नहीं, तब भी मीडिया में इन खबरों को प्रमुखता से दिखाकर सरकार से सवाल नहीं पूछे गए। किसी भाजपा प्रवक्ता को बिठाकर एंकर्स ने यह नहीं कहा कि जो ऐसे वीडियो आ रहे हैं, उन पर आपका क्या कहना है। पाकिस्तान ने कब, कहां से घुसपैठ की योजना बनाई, देश में कौन लोग हैं जो पाकिस्तान का प बोलते हैं, इन सब पर तो मीडिया खूब खबरें चलाता है और खबरें न हों तो किसी न किसी तरह बनवा लेता है। अभी छात्र आंदोलन या वोट चोरी के खिलाफ हो रहे आंदोलन में भी पाकिस्तानी मदद का षड्यंत्र इस तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने पकड़ लिया है। लेकिन चीन किस तरह अरुणाचल प्रदेश पर अपना कब्जा बढ़ाता जा रहा है, यह अरुणाचल प्रदेश के लोग लगातार बता रहे हैं, वहां का मीडिया इस पर खबरें बना रहा है, मगर उन पर न दिल्ली में बैठे सेलिब्रिटी एंकर्स बात कर रहे हैं, न उनकी मालिक सरकार कुछ कह रही है।
लेकिन सच बहुत वक्त तक छिपता नहीं है। हाल ही में आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने बताया है कि अरुणाचल प्रदेश में चीन के साथ लगातार मुठभेड़ हो रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अब पारंपरिक तरीकों से चीन का मुकाबला करना संभव नहीं है। कायदे से इस भाषण के बाद रक्षा मंत्री, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री तीनों को वस्तुस्थिति बतानी चाहिए थी। संसद सत्र में तो विपक्ष इस पर सवाल पूछेगा ही, लेकिन देश की सीमा पर क्या चीन से खतरा बढ़ा है, यह जानकारी देने के लिए सत्र का इंतजार नहीं किया जा सकता। मगर बजाए स्पष्टीकरण देने के सरकार ने इस भाषण को ही आईटीबीपी के हैंडल से हटवा दिया है। याद कीजिए जब राहुल गांधी ने लोकसभा में पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनीÓ का जिक्र कर बताया था कि 31 अगस्त 2020 को लद्दाख के रेचिन ला पास पर चीनी सेना के चार टैंकों और सैनिक आगे बढ़ रहे थे, तो कार्रवाई के लिए जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से बात की थी, तब उन्हें ऊपर यानी प्रधानमंत्री कार्यालय से यह निर्देश मिला था कि-'जो उचित समझो, वो करोÓ। राहुल गांधी के इस खुलासे पर भाजपा फंस गई तो उसने फिर इस मुद्दे पर राहुल को बोलने ही नहीं दिया और न ही नरवणे की किताब को प्रकाशन की अनुमति मिली।
मोदी सरकार का तरीका यही है कि न खुद सच बताओ, न किसी और को बताने दो। लेकिन सच फिर भी सामने आ जाए, तो उसे दबा दो। सच को दफ़्न कर-कर के ही पिछले 12 सालों से मोदी सरकार चली जा रही है। लेकिन इसका खामियाजा अब उन राज्यों को ज्यादा भुगतना पड़ रहा है, जो पहले दिल्ली से भौगोलिक तौर पर दूर थे और अब भावनात्मक तौर पर भी अलग-थलग किए जा रहे हैं। इन राज्यों में भाजपा को सत्ता तो चाहिए, लेकिन केवल इसलिए ताकि यहां की प्रचुर प्राकृतिक संपदा का मनचाहा दोहन उसके चहेते उद्योगपति कर सकें। लद्दाख को भी जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया, वहां भी विशिष्ट खनिज पदार्थों की लूट का खतरा बढ़ा है। इधर अरुणाचल प्रदेश में स्थानीय लोगों को भरोसे में लिए बिना 11,200 मेगावाट की सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना शुरु की गई। शुरुआत से ही स्थानीय किसान संगठन और 'सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरमÓ इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस विशाल बांध के बनने से लगभग 27 से अधिक गांव और पुश्तैनी कृषि भूमि डूब क्षेत्र में आ सकते हैं, जिससे स्थानीय आबादी के बड़े पैमाने पर विस्थापित होने का डर है। वो सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस आबादी का पुनर्वास कैसे होगा, क्या ये अपने ही घर में शरणार्थी बना दिए जाएंगे। ग्रामीणों का आरोप है कि इस परियोजना की प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट और सर्वेक्षण से पहले स्थानीय लोगों, पारंपरिक ग्राम परिषदों (केबांग) और प्रभावित परिवारों को भरोसे में नहीं लिया गया और उनकी सहमति के बिना जबरन सुरक्षा बल तैनात किए गए। जिससे विरोध और बढ़ गया है। सरकार इस बांध को राष्ट्रीय हित में बता रही है और कह रही है कि चीन जो बड़े बांध बना रहा है, उससे मुकाबले के लिए यह जरूरी है। लेकिन स्थानीय समुदाय इसे अपनी आजीविका और संस्कृति पर सीधा संकट मान रहे हैं, और साथ ही जैव विविधता, वनों और स्थानीय पारिस्थितिकी को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है।
ठीक ऐसा ही विरोध अंडमान-निकोबार के आदिवासी भी ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर कर रहे हैं। उसमें भी हजारों सालों में बने जंगल एयरपोर्ट और उर्जा संयंत्र बनाने के नाम पर काट दिए जाएंगे। तर्क वही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के लिए यह जरूरी है। मोदी सरकार लगातार यही दिखाते आई है कि देश के विकास और सुरक्षा की फिक्र उसके अलावा और किसी ने नहीं की। लेकिन देश पहले भी आगे बढ़ा, हमारी सीमाएं सुरक्षित भी रहीं। कभी घुसपैठ हुई भी तो सरकार ने उसे छिपाया नहीं और दुश्मनों को माकूल जवाब भी दिया। मगर अब सरकार की चुप्पी ही देश के विकास और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।


