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इस्लामाबाद वार्ता से निकला संदेश

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई।

इस्लामाबाद वार्ता से निकला संदेश
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पिछले 28 फरवरी से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। 21 घंटे की चर्चा के बावजूद ईरान और अमेरिका में आपसी सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने लाव-लश्कर के साथ अमेरिका वापस लौट गए और जाते-जाते कह गए कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है कि कोई समझौता नहीं हुआ। लेकिन जो ईरान 28 फरवरी को अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की शहादत से लेकर मिनाब में डेढ़ सौ बच्चियों की जान जाने तक कई बुरी खबरों को झेलकर भी अपनी शर्तों पर टिका हुआ है, उसे अमेरिका भला एक वार्ता के विफल होने से क्या हिला पाएगा। असल में तो इस्लामाबाद वार्ता की असफलता अमेरिका के लिए बुरी खबर है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य की चाबी अब भी ईरान के हाथ में ही है और इससे भी बढ़कर उसके पास सिर न झुकाने का जो जज्बा है, वो ट्रंप जैसे नेताओं के पास नहीं है। ट्रंप नेतन्याहू की मर्जी से युद्ध छेड़ते हैं और समझौता भी नहीं कर पाते, क्योंकि नेतन्याहू ऐसा नहीं चाहते।

बीते दिनों न्यूयार्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि बेंजामिन नेतन्याहू 11 फरवरी को अमेरिका में थे, जहां उन्होंने ट्रंप के सामने एक पूरी रणनीति बताई थी कि ईरान पर हमला करना चाहिए, क्योंकि वह अभी कमजोर है। इससे ईरान में सत्ता बदली जा सकती है और उसके संसाधनों पर कब्जा भी किया जा सकता है। नेतन्याहू ऐसे ही प्रस्ताव पहले बराक ओबामा, जो बाइडेन और जार्ज बुश को भी दे चुके थे, लेकिन इन तीनों राष्ट्रपतियों ने अपने कार्यकाल में ऐसा कोई फैसला नहीं लिया। यह खुलासा पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने हाल ही में किया है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप नेतन्याहू की बात मानने को मजबूर हो गए। क्या इसके पीछे एपस्टीन फाइल्स के खुलासे हैं, इस सवाल का जवाब अभी मिलना बाकी है। बहरहाल, यह वार्ता बेनतीजा रही, क्योंकि एक तरफ इजरायल लेबनान पर अपने हमले नहीं रोक रहा था, जबकि ईरान की 10 शर्तों में यह एक अहम शर्त थी कि लेबनान पर हमले रुकने चाहिए। दूसरी तरफ अमेरिका ने भी अपने रुख में इंच भर का बदलाव नहीं दिखाया।

गौरतलब है कि दोनों पक्षों के बीच 5 अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध की भरपाई, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना और ईरान के खिलाफ तथा पूरे क्षेत्र में चल रहे युद्ध को पूरी तरह खत्म करने जैसे विषय शामिल रहे। लेकिन इन मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई। अमेरिका न ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार हुआ, न उसने होर्मुज पर अपना रुख साफ किया। दरअसल पिछले दस दिनों में ही ट्रम्प दो बिल्कुल अलग-अलग बातें कह चुके हैं। पहले उन्होंने कहा था कि होर्मुज में अमेरिका की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, अमेरिका को वहां से गुजरने वाले तेल की जरूरत नहीं है। फिर कुछ ही दिनों बाद उन्होंने कहा कि यह अमेरिका की मांगों का सबसे जरूरी हिस्सा है, और अगर इसे खुला नहीं रखा गया तो कोई बातचीत नहीं हो सकती। वैसे यह तय है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका अपना कब्जा चाहता है, क्योंकि ईरान ने इस पर न केवल नाकेबंदी की है, बल्कि अब शुल्क वसूलने की शुरुआत भी कर दी है और ट्रंप इससे बुरी तरह चिढ़ गए हैं। ईरानी संसद से मंजूरी मिलने के बाद अब इस्लामिक रिवोलूश्यनरी गार्ड्स कॉर्प्स को होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने का अधिकार मिल गया है। हर एक बैरल तेल पर एक डॉलर ईरान वसूलेगा, साथ ही क्रिप्टो करेंसी में भुगतान की व्यवस्था भी होगी, ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का कोई असर न पड़े। ईरान की इस रणनीति से उसे आर्थिक मजबूती मिलेगी, अमेरिका को इस बात का अहसास हो चुका है। इसलिए अब उसने फिर से अपने पत्ते फेंटने शुरु किए हैं, ताकि युद्ध को जायज ठहरा सके।

हालांकि इस युद्ध ने एक तरफ ईरान और खाड़ी देशों समेत पूरी दुनिया में घोर तबाही मचाई है, वहीं एक नयी वैश्विक व्यवस्था भी तैयार की है, जिसमें ईरान निस्संदेह एक आदर्श की तरह उभरा है। ईरान ने संदेश दे दिया है कि महाशक्ति की अवधारणा और उसके हौव्वे को आत्मबल से कैसे तोड़ा जा सकता है। अब अन्य देशों को भी यह प्रेरणा मिली है कि वे अमेरिकी शर्तों के आगे झुकने से इंकार करने की हिम्मत दिखाएं। वहीं इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक अहम किरदार की तरह उभरा है। पाकिस्तान ने पहले भी दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की थी और अब वार्ता की मेज पर ईरान और अमेरिका को लाकर उसने वैश्विक समुदाय में अपनी महत्ता बना ली है। आखिर दो युद्धरत देशों को एक मेज पर लाने का काम आसान नहीं होता। पाकिस्तान अपनी भूमिका जहां तक निभा सकता था, उसने निभाई। घोड़े को खींचकर तालाब तक लाया जा सकता है, लेकिन पानी पीना या न पीना उसकी मर्जी होती है, उसमें कोई जबरदस्ती नहीं करवाई जा सकती। इसलिए वार्ता बेनतीजा रहने के बाद भी पाकिस्तान ने कहा है कि वह आगे भी अपनी भूमिका निभाता रहेगा और आने वाले दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत और संवाद को आगे बढ़ाने में मदद करता रहेगा। पाक विदेश मंत्री इशाक डार ने उम्मीद जताई कि अमेरिका और ईरान 'सकारात्मक भावनाÓ से बात करना जारी रखेंगे, जिससे कि क्षेत्र और उससे परे स्थायी शांति और समृद्धि हासिल की जा सके।

भारत भी ये काम कर सकता था, लेकिन मोदी सरकार इसमें क्यों चूक गई, ये भी बड़ा सवाल है। याद कीजिए 2008 में मुंबई हमलों के बाद डा.मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान को अलग-थलग करने में असरकारी सफलता हासिल की थी। दुनिया की नजरों में उसे आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश के रूप में दर्शाया गया था। पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद मोदी सरकार ने भी यही कोशिश की। दुनिया के अलग-अलग देशों में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजा था ताकि पाकिस्तान के खिलाफ और भारत के पक्ष में माहौल बनाया जा सके। भारत को पीड़ित बताने पर देशों को सहमत किया जा सके। लेकिन मोदी किस कदर नाकाम रहे, यह बात अब पाकिस्तान की ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ बनने से समझी जा सकती है। मोदी चाहते तो 28 फरवरी को ही ट्रंप और नेतन्याहू के खिलाफ बयान देते, अयातुल्लाह अली खामेनेई के लिए शोक संदेश देते। मोदी चाहते तो 26 फरवरी को इजरायल में नेतन्याहू से गले नहीं मिल रहे होते। लेकिन मोदी ने ऐसा नहीं चाहा और अब पूरी दुनिया देख रही है कि इस्लामाबाद शांतिवार्ता से पाकिस्तान ने अपने लिए कैसा इतिहास बना लिया है और कैसे मोदी ने भारत के गौरवशाली इतिहास को धूमिल किया है।


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