सवाल जंतर-मंतर का नहीं है
लोकतंत्र में जनता की नाराजगी की अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण स्थल बन चुके जंतर-मंतर पर अब मोदी सरकार की वक्र दृष्टि पड़ चुकी है।

लोकतंत्र में जनता की नाराजगी की अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण स्थल बन चुके जंतर-मंतर पर अब मोदी सरकार की वक्र दृष्टि पड़ चुकी है। दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर, 2026 के आदेश के तहत जंतर-मंतर रोड को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया गया। यानी पिछले दो-ढाई दशकों से कई अहम आंदोलनों का गवाह बन चुके जंतर-मंतर पर अब सरकार ने सभी तरह के विरोध-प्रदर्शन से रोक लगा दी है। दिल्ली में संसद और अन्य सरकारी दफ्तरों से कुछ ही दूरी पर बना जंतर-मंतर दो दशक से अधिक समय तक राजनीतिक विरोध, जन आंदोलनों और नागरिक प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र रहा है। पाठक जानते हैं कि पिछले 20-25 सालों में राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, ट्रेड यूनियनों, किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने इसी जंतर-मंतर से अपनी मांगें उठाईं और सरकारों को कई बार झुकने पर मजबूर कर दिया। लेकिन अब सरकार ने जंतर-मंतर की जगह रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली के शाहदरा में सीबीडी ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी ग्राउंड को विरोध-प्रदर्शन स्थल के तौर पर चिन्हित किया है।
दिल्ली में इस समय ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शनों के बीच इस फैसले के आने पर विपक्ष कई सवाल उठा रहा है। वैसे सरकार का कहना है कि इस फैसले का ज्ञानेश कुमार विरोधी आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। दिल्ली पुलिस का तर्क है कि जंतर-मंतर पर बार-बार होने वाले प्रदर्शनों से मध्य दिल्ली में यातायात, कारोबार और सामान्य गतिविधियां प्रभावित होती हैं। पूर्व आईपीएस और अब भाजपा नेता किरण बेदी का भी कहना है कि जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शन के लिए सही जगह नहीं है क्योंकि वहां के रास्ते संकरे हैं और आसपास कई संवेदनशील इमारतें व दफ्तर स्थित हैं। ऐसे लोगों की बात सुनने से समझ आता है कि भाजपा जनता के विरोध से अब कितना डर चुकी है कि प्रदर्शन के पर्याय बन चुके जंतर-मंतर पर ही लोगों को इकठ्ठा होने से रोक रही है। किरण बेदी ने बतौर पुलिस अधिकारी या उससे पहले आम आदमी पार्टी के नेता या उससे भी पहले अन्ना आंदोलन में हिस्सेदारी के वक्त तो इस बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन अब भाजपा में जाने पर उनके विचार बदल गए हैं।
वैसे विपक्ष का आरोप है कि जंतर-मंतर को हटाने से नागरिकों के लिए सरकार के सामने अपनी मांगें रखने और राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का एक महत्वपूर्ण मंच कमजोर होगा। अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार उन जगहों से लोगों को दूर रखना चाहती है, जहां सत्ता में बैठे लोगों तक जनता के गुस्से की आवाज सीधे पहुंच सकती है। वहीं आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह नयी पीढ़ी के विरोध प्रदर्शनों से घबराए हुए हैं। इधर कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने तो तंज कसते हुए इसे मोदी और शाह के लिए 'डेमोकुर्सी' का मामला बताया है और कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने कहा कि प्रदर्शन स्थल बदलने से असहमति की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की कि कल प्रधानमंत्री मोदी लोकतंत्र को ही प्रदर्शन स्थल की सूची से बाहर कर सकते हैं, क्योंकि समस्या प्रदर्शन की जगह नहीं, बल्कि लोगों के विरोध करने के विचार से है।
विपक्ष के इन आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता। क्योंकि पहले जुलाई में धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर हुए जेन ज़ी आंदोलन ने जंतर-मंतर पर ही अपना दम दिखाया और सरकार को झुकने पर मजबूर किया। अब भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर चल रहे प्रदर्शन में भी आंदोलनकारियों को लगातार जंतर-मंतर पहुंचने से रोकने की कोशिश भाजपा करती रही। मोदी अच्छे से समझ चुके हैं कि जब उनकी सत्ता से नाराज लोग एक साथ जंतर-मंतर पहुंचते हैं तो उनकी सरकार के लिए खतरा बढ़ सकता है। इसलिए विपक्ष का यह कहना सही है कि इस फैसले को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विरोध के लिए उपलब्ध स्थान और अवसर से जुड़े मुद्दे के तौर पर देखा जाना चाहिए।
रहा सवाल रामलीला मैदान या सीबीडी और बुराड़ी के मैदानों का, तो इनमें व्यावहारिक कठिनाइयां देखी जा रही हैं। रामलीला मैदान अक्टूबर से दिसंबर तक त्योहारों के मौसम में सांस्कृतिक और अन्य कार्यक्रमों के कारण उपलब्ध नहीं होता है। इसी तरह सीबीडी और बुराड़ी के मैदानों में भी व्यावहारिक दिक्कतें हैं। दिल्ली के लोग तो इन जगहों से वाकिफ हैं, लेकिन दिल्ली से बाहर के लोग प्रदर्शन स्थल के तौर पर जंतर-मंतर को ही पहचानते हैं। मुमकिन है कि वक्त के साथ इन जगहों की पहचान भी अच्छे से हो जाए, लेकिन तब तक शायद मोदी सरकार खुद को प्रदर्शनों से महफूज मान सकती है।
हालांकि मोदी और शाह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में प्रदर्शनों का महत्व, प्रदर्शन स्थलों से कहीं ज्यादा है। 2020 से 21 तक चले किसान आंदोलन में तो हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठे रहे, उन लोगों को जंतर-मंतर तक आने की जरूरत नहीं पड़ी और सरकार को फिर भी झुकना पड़ा। इसी तरह शाहीन बाग में भी महिलाएं सीएए के खिलाफ बैठ गईं, उन्हें भी जंतर-मंतर नहीं आना पड़ा।
वैसे जंतर-मंतर से पहले इंडिया गेट और विजय चौक के निकट बोट क्लब के लॉन आजादी के बाद कई दशकों तक बड़े राजनीतिक और जन प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र रहे। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हजारों किसान बोट क्लब पर ही जुटे थे। किसान अपने मवेशियों के साथ कई दिनों तक वहां डटे रहे और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर अपनी मांगें मानने का दबाव बनाया था।
मोदी याद रखें कि जब तक लोकतंत्र कायम रहेगा, विरोध-प्रदर्शनों का हक भी बना रहेगा, फिर चाहे वह जंतर-मंतर पर दर्शाया जाए या किसी नामालूम सी जगह पर।


