दलबदल का खेल और राजनैतिक ईमानदारी
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर उथल-पुथल दिखाई दे रही है। शिवसेना को एक बार फिर तोड़ने की खबरें हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर उथल-पुथल दिखाई दे रही है। शिवसेना को एक बार फिर तोड़ने की खबरें हैं। जाहिर है यह टूट शिंदे गुट में नहीं, उद्धव ठाकरे गुट में करवाई जा रही है और इसके पीछे भी भाजपा का ही हाथ है, ऐसे आरोप लग रहे हैं। कम से कम छह सांसदों के शिंदे गुट में जाने की खबरें हैं। सांसद संजय राउत ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि इन सांसदों को 15-15 करोड़ दिए गए हैं। यानी खुल कर खरीद-फरोख्त की बातें हो रही हैं। कुछ जगहों पर बाकायदा पोस्टर लगे हैं, जिसमें एकनाथ शिंदे की तस्वीर के साथ ऑपरेशन टाइगर लिखा हुआ है, साथ ही लिखा है वेट एंड वॉच, यानी देखो और इंतजार करो। याद रहे कि कुछ दिनों से ऑपरेशन टाइगर शब्द महाराष्ट्र के राजनैतिक गलियारों में घूम रहा है।
टाइगर यानी शेर बाला साहेब ठाकरे की खड़ी की हुई शिवसेना की पहचान रहा है। एकनाथ शिंदे खुद को बाल ठाकरे का असली उत्तराधिकारी बताते हुए शिवसेना के नाम और निशान पर तो कब्जा कर ही चुके हैं, अब ऑपरेशन टाइगर कहकर वे यह बताना चाह रहे हैं कि शिवसेना के असली शेर उनके साथ ही रहेंगे। वैसे ये अब शिंदे गुट के कार्यकर्ताओं के सोचने की बात है कि वे सर्कस में रिंग मास्टर के इशारों पर चलने वाले शेर को असली शेर मानते हैं या फिर जंगल में अपनी मर्जी से चलने वाले शेर को असली मानते हैं। शिवसेना का प्रतीक अब कौन सा शेर रहेगा, यह तो उसके कार्यकर्ता तय करेंगे। लेकिन इस देश की जनता को अब वाकई गंभीरता से सोचना होगा कि राजनैतिक दलों में टूट का जो सिलसिला नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से शुरु हुआ है, वो कहां जाकर थमेगा और तब तक क्या लोकतंत्र जिंदा रह पाएगा।
चार साल पहले जब शिवसेना को पहली बार तोड़कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भाजपा ने बिठाया था, तब इसे ऑपरेशन लोटस नाम दिया गया था। कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि में भी यही नाम चला, जबकि यह प्रकृ ति की एक अनुपम रचना कमल के फूल का अपमान था। भाजपा ने कमल के फूल को अपना प्रतीक चिह्न बनाया है, तो कम से कम उसकी विशेषता को अपनाने की कोशिश भी करती कि कीचड़ में खिलकर भी वह बेदाग रहता है और इस खूबसूरती के साथ खिलता है कि देवताओं के अर्पण के योग्य रहे। कमल जैसे सकारात्मक, सुंदर प्रतीक के साथ ऑपरेशन नाम जोड़कर उसके कोमल सौंदर्य पर आघात किया जाता है, जिसमें लोकतंत्र का भी अपमान होता है। किसी दल के विधायकों या सांसदों को लालच और दबाव बनाकर अपने दल में केवल इसलिए शामिल करना, ताकि सत्ता पर कब्जा किया जा सके, राजनैतिक भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण है। भाजपा यही उदाहरण बार-बार लगातार पेश कर रही है। राजनैतिक विश्लेषक और मीडिया के कई लोग इसे मास्टर स्ट्रोक बता कर भ्रष्टाचार को सही ठहराने में लगे हैं।
युद्ध और प्रेम में सब जायज है, जैसे वाक्य अनैतिकता को बढ़ावा देने वालों ने अपनी सुविधा से गढ़े हैं, जिसे नकारना चाहिए। सही केवल वही है जो नैतिकता और कानून की कसौटी पर खरा उतरे। इस लिहाज से देखें तो भाजपा के चलाए दल-बदल ऑपरेशन सही नहीं हैं। अगर किसी की विचारधारा बदल जाए और फिर वह पार्टी बदले तो वह ठीक है। लेकिन आप किसी पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर लड़ते हैं, जीत हासिल करते हैं और कुछ वक्त के बाद धुरविरोधी पार्टी में चले जाते हैं तो यह सीधे-सीधे उस जनता के साथ धोखा है जिसने आपको जिताया। जैसे प.बंगाल में इस समय तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने एक अनजानी पार्टी एनसीपीआई में विलय का ऐलान किया, ताकि वे एनडीए का समर्थन कर सकें। ये 20 सांसद कम से कम एक करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और 2024 में इन लोगों को भाजपा के खिलाफ लड़ते हुए ही जीत मिली थी। अब ये सांसद भाजपा का विरोध नहीं करेंगे और इस तरह अपनी क्षेत्र की जनता के साथ धोखा करेंगे।
2024 में भाजपा चार सौ पार का नारा दे रही थी ताकि संविधान बदल सके, इंडिया गठबंधन ने इसके खिलाफ लड़ने का ऐलान किया था और इसी वजह से भाजपा को 240 सीटों पर रुकना पड़ा था। तब संविधान पर आया खतरा कुछ वक्त के लिए टल गया था। लेकिन अब भाजपा ने उस खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। संसद में इंडिया गठबंधन के सांसदों को तोड़ा जा रहा है, क्योंकि मोदी सरकार को यह समझ आ गया है कि अभी जो बहुमत उसके पास है, उसमें मनमर्जी नहीं की जा सकती है। बीते 17 अप्रैल को संसद के विशेष सत्र में संविधान संशोधन विधेयक सरकार इंडिया ब्लॉक की एकजुटता के कारण ही पारित नहीं करवा पाई थी। इसके बाद बंगाल में उसकी जीत तो हो गई, लेकिन वहीं इंडिया गठबंधन में आपसी मजबूती भी बढ़ी। क्योंकि सभी दलों को यह समझ आ गया कि भाजपा अब विपक्ष को किसी हाल में चुनाव नहीं जीतने देगी। भाजपा इंडिया गठबंधन में दरार नहीं डाल पा रही है तो अब उसके दलों को तोड़ने में लगी है। टीएमसी में उसे काफी हद तक सफलता मिल गई है। लेकिन संसद में एकाधिकार के लिए उसे और संख्याबल चाहिए, तो अब फिर से शिवसेना निशाने पर है।
हालांकि शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर मांग की है कि शिवसेना (यूबीटी) को ही संसद में एकमात्र आधिकारिक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी जाती रहे। किसी भी अलग गुट, बागी गुट या स्वतंत्र समूह को कोई पहचान, दर्जा, सुविधा या विशेषाधिकार न दिया जाए। पत्र में यह भी लिखा है कि ऐसी किसी भी मांग पर फैसला लेने से पहले उद्धव ठाकरे गुट को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत उपलब्ध प्रावधानों का उपयोग करने का अधिकार सुरक्षित रखती है। अब ओम बिड़ला क्या फैसला लेते हैं यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन दलबदल के लगातार हो रहे प्रकरणों में यह विचारणीय है कि आखिर भाजपा को ऐसा करने का मौका क्या राजनैतिक दलों के नेता खुद नहीं दे रहे हैं। राजनीति में जो भ्रष्टाचार व्याप्त हो चुका है, उस में जांच एजेंसियों के सियासी इस्तेमाल की गुंजाइश बढ़ गई है।
जैसे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कई विधायक एमएलसी राज्यसभा सांसद भाजपा ने तोड़े थे। क्या स्वार्थ रहा होगा? क्या लालच रहा होगा? क्या डर रहा होगा? स्वार्थ, लालच और डर ही वे कारक हैं, जिनके बूते दल-बदल संभव हो पा रहा है। आज भाजपा यह कर रही है, मुमकिन है कल कोई दूसरा सत्ताधारी दल यही करे। इसे तभी रोका जाएगा जब ईमानदार राजनीति को पुनसर््थापित किया जाए। काम कठिन है, असंभव नहीं।


