लोकतांत्रिक गिरावट की पराकाष्ठा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में अनेक ऐसे कारनामे किये गये हैं जो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी किसी सरकार के लिये बहुत शर्मनाक है।

वैसे तो 2014 में सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी लोकतंत्र को लगातार गर्त में ले जा रही है, परन्तु पश्चिम बंगाल में वहां की सत्ता से हट गयी तृणमूल कांग्रेस पार्टी को रातों-रात तोड़कर उसका जो हश्र किया गया है, वह शायद गिरावट का सबसे निचला स्तर है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में अनेक ऐसे कारनामे किये गये हैं जो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी किसी सरकार के लिये बहुत शर्मनाक है।
इस बात का लम्बा हिसाब लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार में आने के बाद अपनी जांच एजेंसियों, अलग-अलग ढंग से जुटाये गये पैसों और बेहिचक गैर-लोकतांत्रिक तरीके अपनाते हुए भाजपा ने कई राज्यों में गैरभाजपा सरकारों में तोड़-फोड़ की, अनैतिक तरीकों से केन्द्र के अधीन मौजूद ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हुए भारतीय लोकतंत्र की नींव को हिलाकर रख दिया है।
वैसे तो प. बंगाल में भाजपा बड़े अंतर से न केवल जीती वरन सरकार बनाने के लिये उसके पास साफ बहुमत भी उपलब्ध हो गया है। ऐसे में सवाल हो सकता है कि इसके बावजूद टीएमसी को संसद में तोड़ने की ज़रूरत है? यह अन्य दलों को साफ संकेत हैं कि आगे जाकर उनका भी यही हश्र होगा। इसे अगले वर्ष होने जा रहे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से भी जोड़ा जा रहा है।
यह भी साफ हो गया है कि भाजपा अब न केवल विपक्षी दलों को तोड़ेगी वरन हर पार्टी के कथित बागी उम्मीदवारों को निर्दिष्ट भी करेगी कि उन्हें फिलहाल किस दल में शामिल होना है। अब तक तो यही होता आया है कि अपनी पार्टी को किसी भय या लालच के चलते छोड़ने वाले विधायक या सांसद सीधे भाजपा का रुख करते थे। चाणक्यगिरी का सम्भवत: यह नवाचार है कि टीएमसी के बागी 19-20 सांसदों को कुछ वक्त पहले हावड़ा में बनी और त्रिपुरा में चुनाव लड़ने वाली नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होने के लिये कहा गया। इस घटनाक्रम से एनसीपीआई का नाम लोग जान पाये हैं। राज्य में वह भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का घटक दल है। हालांकि इसकी संस्थापक अध्यक्ष शिवली कुंडू और संगठन सचिव शांतनु डे का कहना है कि इसकी जानकारी उन्हें सोशल मीडिया के जरिये मिली। वैसे शिवली का कहना है कि काफी अरसा पहले वे इस पद को छोड़ चुकी हैं तथा अब उसका अध्यक्ष कौन है- वे नहीं जानतीं। हालांकि शांतनु ने टीएमसी से आने वाले बागी सदस्यों का अपनी पार्टी में स्वागत किया है।
अगर एनसीपीआई की राजनीतिक ताकत की बात करें तो इस दल के केवल दो सदस्यों ने 2023 के विधानसभा चुनाव में भागीदारी की थी। दोनों को मिलाकर कुल 822 वोट मिले थे। स्वाभाविकत: उसके किसी भी सदस्य को विधानसभा में प्रवेश नहीं मिला था। दोनों की जमानत जब्त हो गयी थी। कल्पना कीजिये भारतीय लोकतंत्र की विद्रूपता का जहां ऐसी पार्टी के 19-20 लोकसभा सदस्य हैं जिसे कुल प्राप्त मतों की संख्या तिहाई में सिमटी हुई है। जैसा अक्सर कहा जाता है कि किसी पार्टी को छप्पर फाड़ पैसे या वोट मिलते हैं, एनसीपीआई के बारे में कहा जा सकता है कि उसे छप्पर फाड़ सांसद मिले हैं। शायद अपनी राजनीति के बल पर उसे यह उपलब्धि कभी हासिल नहीं हो सकती थी। बस, यही वह 'चाणक्यगिरी' है जो देश के लोकतंत्र को मटियामेट कर रही है।
टीएमसी के सदस्यों पर गाज गिरेगी- यह तो पहले से ही तय था। इन ज्यादातर सांसदों में बेहद तेज़-तर्रार लोग हैं जिनके पिछले एक या दो कार्यकाल बेहद उपयोगी रहे हैं। वे न सिर्फ जनता की आवाज उठाते थे, बल्कि वे सशक्त प्रतिरोध के सच्चे प्रतिनिधि लगते थे। विपक्षी दलों की कम संख्या के बावजूद टीएमसी के कई सदस्यों की ओर पूरा देश आशा भरी निगाहों से देखा करता था। ममता के खुद का विधानसभा चुनाव हारने के बाद यहां तक कहा जाने लगा था कि सायोनी घोष पार्टी की भावी नेता हैं। उनसे उम्मीद थी कि ममता की तरह न केवल उनकी आक्रामकता बरकरार रहेगी बल्कि वे टीएमसी की धार को और चमकाएंगी।
मजेदार यह है कि जिस धर्मनिरपेक्ष चरित्र व विश्वासों के चलते ममता ने तीन मुस्लिमों को सांसद बनाया था, वे भी एनसीपीआई का दामन थाम चुके हैं। इन सभी लोगों ने विधानसभा अध्यक्ष ओम बिरला से दिल्ली जाकर न केवल खुद को टीएमसी से अलग होने की घोषणा की, वरन सदन में अलग बैठने की भी मांग की है। कहना न होगा कि ऐसे मामलों में बिरला वही फैसला करते हैं जो भाजपा के अनुकूल होते हैं। एक-दो दिनों में शायद इसकी विधिवत घोषणा भी हो जाये- मोदी-शाह की मंशा व निर्देशों के अनुकूल।
टीएमसी के थोड़े-बहुत बचे हुए लोगों को डराने के लिये प.बंगाल की नयी भाजपा सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही है। चुनावी नतीजों की रात को टीएमसी, कांग्रेस व साम्यवादी दलों के दफ्तरों को जलाया गया, सांसदों के घरों में जांच एजेंसियों की छापेमारी जारी है, फाल्टा से हारने वाले जहांगीर खान को पुलिस उनके क्षेत्र में सरेआम परेड करा रही है तो ये बचे-खुचों को एनसीपीआई में शामिल होने का संदेश है।
भाजपा जो करेगी वह करेगी ही, इंडिया गठबन्धन से न जुड़ने अथवा मिल-जुलकर चुनाव न लड़ने का भारी खामियाजा टीएमसी को भुगतना पड़ा है। यह संदेश सभी विपक्षी दलों के लिये है।


