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अदूरदर्शी सरकार होने का खामियाजा

इरतिज़ा निशात का लिखा ये शेर आज भारत के हुक्मरानों को बतौर नसीहत सुनाया जा सकता है।

अदूरदर्शी सरकार होने का खामियाजा
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कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है।

कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते।।

इरतिज़ा निशात का लिखा ये शेर आज भारत के हुक्मरानों को बतौर नसीहत सुनाया जा सकता है। या तो नरेन्द्र मोदी और उनके तमाम सिपहसालार देश और दुनिया की वास्तविकताओं से अनभिज्ञ हैं या उन्हें किसी गड़बड़ी का भान तभी होता है, जब पानी सिर के ऊपर से निकल जाए। 28 फरवरी को ईरान पर हमला बोलने के बाद मध्यपूर्व में एक बड़ी जंग शुरु हो गई थी, जिस की आंच भारत पर भी पड़ रही थी। तब 12 मार्च को राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा था कि पश्चिम एशिया में मौजूदा संघर्ष के कारण देश एलपीजी की कमी का सामना कर रहा है और इसके बावजूद प्रधानमंत्री लोकसभा में आकर इस मुद्दे पर बोलना नहीं चाहते। उन्होंने आरोप लगाया कि 'अमेरिका में अडानी पर आरोप तय होने और एपस्टीन फ़ाइल्स के चलते प्रधानमंत्री मोदी घबराहट में हैं।'

एपस्टीन और अडानी का नाम आते ही राहुल गांधी के भाषण में हंगामा शुरु हो गया और जब उन्होंने एलपीजी संकट पर बोलने की कोशिश की तो उन्हें रोक दिया गया। इसके बाद राहुल गांधी ने संसद के बाहर पत्रकारों से कहा था कि, 'मैंने देश में एलपीजी गैस और तेल की स्थिति पर बयान देने की अनुमति मांगी। लेकिन अब एक नई प्रक्रिया शुरू हो गई है, जिसमें पहले मंत्री तय करेंगे, फिर मैं बोलूंगा, उसके बाद मंत्री जवाब देंगे। असल बात यह है कि ईंधन एक बड़ी समस्या बनने वाला है, क्योंकि हमारी ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ा है। ग़लत विदेश नीति ने यह स्थिति पैदा की है। अब हमें तैयारी करनी होगी। हमारे पास अभी थोड़ा समय है। सरकार और प्रधानमंत्री को तुरंत तैयारी शुरू करनी चाहिए, वरना करोड़ों लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।' उन्होंने ये भी कहा था कि, 'यह कोई राजनीतिक बयान नहीं है। मुझे साफ़ दिखाई दे रहा है कि एक बड़ी समस्या आने वाली है। समस्या यह है कि प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री की तरह काम नहीं कर पा रहे हैं। इसके पीछे एक वजह है, वह फंसे हुए हैं। फिर भी उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत के लोग सुरक्षित रहें और हमारी ऊर्जा सुरक्षा हमारे नियंत्रण में रहे।'

राहुल गांधी के इस बयान पर भाजपा ने उन पर हमला बोला था कि वे बेवजह घबराहट फैला रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी उन दिनों तमिलनाडु और केरलम में चुनाव प्रचार करने पहुंचे थे और उन्होंने कहा था कि कहीं कोई संकट नहीं है और विपक्ष अफवाहें फैला रहा है। यह वैसा ही बयान था, जैसा कोरोना संकट के वक्त दिया गया था या उससे पहले गलवान पर हमले के वक्त कहा था कि कोई नहीं आया है। अगर प्रधानमंत्री को संदेह का लाभ दिया जाए तब भी यही समझ आता है कि उन्हें जब तक अहसास होता है कि कहीं कोई बड़ी समस्या खड़ी हो चुकी है, तब तक करोड़ों लोग उससे प्रभावित हो चुके होते हैं। इसलिए अगर प्रधानमंत्री से देश नहीं संभल रहा है, तो देशभक्ति की खातिर ही किसी सुपात्र को इस पद की जिम्मेदारी सौंप दें। लेकिन इस वक्त तो समूची भाजपा केवल प्रधानमंत्री के दिखाए को ही देख रही है, वो जो सुनाएं उसे सुन रही है। अपनी तर्कक्षमता और विवेक का इस्तेमाल करने वाले देश की सबसे बड़ी पार्टी में लगता है, हैं ही नहीं। भाजपा इसे भले अनुशासन माने, लेकिन असल में यह चाटुकारिता है कि प्रधानमंत्री को सही सलाह नहीं दे कर, केवल हां में हां मिलाया जा रहा है।

तभी तो केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने सदन में कहा था कि हमारी रिफ़ाइनरियां उच्च क्षमता उपयोग के साथ काम कर रही हैं। कई मामलों में यह 100 प्रतिशत से भी अधिक पर चल रही हैं। पेट्रोल, डीजल, केरोसीन, एटीएफ़ या फ्यूल ऑयल की कोई कमी नहीं है। अगर 12-13 मार्च तक सरकार को कोई कमी महसूस नहीं हुई तो क्या सड़कों पर कतार में खाली सिलेंडर लेकर खड़े लोग भी दिखाए नहीं दिए। और अब प्रधानमंत्री क्यों यह कह रहे हैं कि पश्चिम एशिया का संकट भारत के लिए चिंता का कारण है। सोमवार को लोकसभा में दिए अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा था कि इस संकट का सामना देशवासियों को कोरोना संकट की तरह ही करना होगा। और फिर मंगलवार को उन्होंने फिर कहा कि अगर यह जंग जारी रही, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम होंगे। उन्होंने कहा, 'भारत हर सेक्टर में यह प्रयास कर रहा है कि किसी भी सेक्टर में दूसरे देशों पर बहुत अधिक निर्भरता न हो।' यानी आत्मनिर्भर बनाने के दावे कम से कम दस साल से हो रहे हैं और अब कहा जा रहा है कि हम प्रयास कर रहे हैं।

वहीं जिस समस्या को राहुल गांधी ने 12 मार्च को संसद से बताया था, उस पर 12 दिन बाद राज्यसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि तीन सप्ताह से अधिक समय हो चुका है तथा इस युद्ध ने विश्व में गंभीर ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है। इस युद्ध से हमारे व्यापार के रास्ते प्रभावित हो रहे हैं। इससे पेट्रोल, डीजल, गैस और उर्वरक जैसे जरूरी सामान की नियमित आपूर्ति प्रभावित हो रही है। हम सभी संभव स्रोतों से गैस, कच्चा तेल खरीदने की कोशिश कर रहे हैं, आने वाले दिनों में प्रयास जारी रहेंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं, वहां काम करते हैं। उन्होंने कहा कि उनका जीवन एवं आजीविका भारत के लिए बहुत बड़ी चिंता का कारण है। प्रधानमंत्री ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में दुनिया के कई जहाज फंसे हुए हैं। उनमें भारतीय चालक दल की संख्या भी बहुत अधिक है तथा यह भी भारत की एक बड़ी चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि ऐसी विकट परिस्थिति में आवश्यक है कि भारत की संसद के इस उच्च सदन से शांति एवं संवाद की एकजुट आवाज पूरे विश्व में जाए।

यानी अब जाकर सरकार की नींद खुली है और उसे समझ आ रहा है कि कभी ट्रंप, कभी नेतन्याहू से जाकर मोदी गले मिलें तो उससे देश की वास्तविक समस्याएं दूर नहीं होंगी। अब खबर तो यह भी है कि सरकार ने बुधवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। लेकिन इस सरकार में जिस तरह विपक्ष का तिरस्कार होता रहा है, उसमें सर्वदलीय बैठक से कुछ खास हासिल होगा, इसकी उम्मीद कम ही है। देश एक अदूरदर्शी प्रधानमंत्री होने का खामियाजा भुगत रहा है।


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