अजित पवार के जाने के बाद का गुणा-भाग
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार सुबह बारामती में एक विमान हादसे में निधन हो गया

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार सुबह बारामती में एक विमान हादसे में निधन हो गया। उनके यूं इस तरह चले जाने से समूचा देश स्तब्ध है। वहीं महाराष्ट्र की राजनीति में भी नए सवाल खड़े हो गए हैं। क्योंकि अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति का एक ऐसा किरदार थे, जिनसे आप असहमत हो सकते हैं, उनके तौर-तरीकों से नाराज हो सकते हैं, उनके समर्थक और मुरीद हो सकते हैं, लेकिन उन्हें उपेक्षित नहीं कर सकते। अजित पवार का सियासी सफर काफी दिलचस्प था। हर दिग्गज नेता की तरह उनकी भी महत्वाकांक्षा शीर्ष पद पर पहुंचने की थी, यानी महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना उनका सपना था, जो अब अधूरा रह गया है। अजित पवार मुख्यमंत्री तो एक बार भी नहीं बन पाए, लेकिन छह बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड उनके नाम हैं। इसके अलावा कांग्रेस, शिवसेना, भाजपा के मुख्यमंत्रियों के साथ वे अलग-अलग मंत्री पद पर भी रहे। इसलिए कहा जाता है कि अजित पवार सत्ता में हमेशा ही बने रहे।
अपने चाचा शरद पवार की ऊंगली थामकर अजित पवार ने राजनीति शुरु की, लेकिन बाद में उनसे अलग होकर अपना दबदबा भी दिखाया। 22 जुलाई 1959 को जन्मे अजित पवार महज 23 साल की उम्र में कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में शामिल हो गए थे। इसके बाद 1991 में वे पुणे सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष बने और 16 सालों तक इस पद पर काबिज रहे। वे 1991 में ही बारामती से पहली बार सांसद चुने गए। लेकिन अपने चाचा शरद पवार के लिए उन्होंने सीट खाली की, इसके बाद 1995 में बारामती से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते फिर 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 में लगातार विधायक बने रहे।
शरद पवार के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को खड़ा करने और उसे महाराष्ट्र की अग्रणी पार्टियों में शुमार करने में अजित पवार का बड़ा हाथ रहा। लेकिन इस बीच शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के भी राजनीति में सक्रिय होने के बाद अजित पवार अपनी उपेक्षा का दर्द जाहिर करते रहे। एक बार उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर मैं शरद पवार का बेटा होता तो मुख्यमंत्री बन जाता। हालांकि चाचा-भतीजे के बीच सीधी तकरार 2022 में देखने मिली। जब अजित पवार ने शरद पवार से अलग होकर अपनी राजनीतिक लकीर खींची और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। हालांकि हाल ही में संपन्न हुए नगरीय निकाय चुनावों में एनसीपी के दोनों गुट एक साथ आए और खबरें थीं कि चाचा-भतीजा के साथ आने से भाजपा को काफी तकलीफ है। लेकिन नगरीय निकाय चुनावों में एनसीपी को बड़ा झटका लगा और उसके कई गढ़ हाथ से निकले भी। इसके बाद अजित पवार जिला पंचायत चुनाव की तैयारियों में जुटे थे। लेकिन उनकी मौत के साथ ही उनकी तैयारियां भी अधूरी रह गईं।
करीब 4 दशकों के सियासी सफर में एक बार सांसद और सात बार विधायक रहे अजित पवार ने राज्य सरकार में कई अहम मंत्री पद संभाले। 2010 में वे पहली बार उपमुख्यमंत्री बने और फिर छह बार इसी पद पर काबिज हुए। 2019 में तो दो अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के अधीन उन्होंने उपमुख्यमंत्री की शपथ ली। 23 नवंबर 2019 की सुबह उन्होंने देवेंद्र फडनवीस के साथ उपमुख्यमंत्री की शपथ ली। लेकिन, सदन में फडनवीस बहुमत साबित करने में नाकाम रहे। इसके बाद उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री की शपथ ली तो उन्हें एक बार फिर उपमुख्यमंत्री बनाया गया। आखिरी बार 2024 में वो एक बार फिर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने और उनकी मौत इसी पद पर बने रहते हुए हो गई।
सिंचाई घोटाले से लेकर अपनी पार्टी को तोड़ने और भाजपा से हाथ मिलाने जैसे कई विवाद अजित पवार के साथ चस्पां रहे। अब उनकी मौत पर भी सवाल उठ रहे हैं। दरअसल तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संकेत दिया कि अजित पवार महायुति गठबंधन से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए इस हादसे के पीछे कोई साजिश हो सकती है। उन्होंने कहा- 'आज जो हुआ, वह गंभीर सवाल खड़े करता है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच ही विश्वसनीय होगी। हमें सिर्फ सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है, किसी अन्य एजेंसी पर नहीं।' उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है। वहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने भी कहा है कि राजनीति में स्पष्ट बोलने की कीमत चुकानी होती है, पता नहीं अजित पवार को कितनी चुकानी पड़ी होगी। गौरतलब है कि कांग्रेस, एनसीपी और आरजेडी भी विमान हादसे की जांच की मांग कर रहे हैं।
खबर ये भी है कि पिछले महीने नगरीय निकाय चुनावों के प्रचार में अजित पवार ने भाजपा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। अजित पवार ने 1995 से 1999 के बीच शिवसेना-भाजपा की संयुक्त सरकार में मराठवाड़ा में सिंचाई परियोजना में कथित भ्रष्टाचार का जिक्र करते हुए भाजपा पर आरोप लगाए थे और यहां तक कहा था कि उनके पास इसकी मूल फाइलें हैं। बता दें नगरीय निकाय चुनावों में एनसीपी ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा था। भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने दोस्ताना मुकाबले की पहल की थी, लेकिन अजित पवार ने इसे स्वीकार नहीं किया था। वहीं इन चुनावों में उन्होंने अपने चाचा शरद पवार से हाथ मिला लिए थे। हालांकि एनसीपी के एक साथ आने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। इसके बाद से कयास थे कि अजित पवार फिर से शरद गुट में शामिल हो सकते हैं, क्योंकि वे अपना अलग दमखम भी अब तक दिखा चुके थे। लेकिन महायुति टूटती या एनसीपी एक होती, इससे पहले ही अजित पवार का आकस्मिक निधन हो गया।
अब महाराष्ट्र की राजनीति में फिर से सियासी समीकरण बदलने के संकेत हैं। एक तो बारामती से विधानसभा सीट खाली हो गई है, जिसमें अब पवार परिवार से किसे मौका मिलता है, यह देखना होगा। पिछले चुनाव में तो अजित पवार ने अपने ही भतीजे युगेन्द्र पवार को हराया था, जो शरद गुट में थे। लेकिन अब क्या भाजपा पवार परिवार के गढ़ में सेंधमारी की कोशिश करेगी, ये देखना होगा। इस बीच सवाल शरद पवार पर भी उठ रहे हैं कि क्या वो महायुति में शामिल एनसीपी के बाकी नेताओं को अपनी तरफ मिलाकर भाजपा को धक्का देते हैं या फिर महाविकास अगाड़ी छोड़कर खुद भी महायुति का हिस्सा बनते हैं। उनका उपमुख्यमंत्री पद खाली होने से क्या उनकी पत्नी राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार और बड़े बेटे पार्थ पवार को भाजपा अपनी तरफ कर इस पद पर बिठाती है या प्रफुल्ल पटेल जैसे वरिष्ठ नेता को यह मौका मिलता है। फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत सा गुणा-भाग होना बाकी है, हालांकि अजित पवार के निधन से उपजे शून्य से सभी दुखी है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।


