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वैश्विक व्यवस्था पर बड़ा खतरा

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की शनिवार को हत्या के बाद अब वैश्विक व्यवस्था बदलने का खतरा कई गुना बढ़ गया है

वैश्विक व्यवस्था पर बड़ा खतरा
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ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की शनिवार को हत्या के बाद अब वैश्विक व्यवस्था बदलने का खतरा कई गुना बढ़ गया है। ईरान पर इजरायल और अमेरिका ने मिलकर शनिवार सुबह-सुबह हमला किया और इसे अपने बचाव के लिए किया गया हमला बताया। हालांकि यह खोखले बहाने से ज्यादा कुछ नहीं है। असल बात यह है कि इजरायल और अमेरिका लंबे अरसे से ईरान पर हमले की योजना बना रहे थे। पिछले साल जून में किए हमले का तगड़ा जवाब ईरान ने दिया था। तब भी खामनेई को मारने की कोशिश की गई थी, हालांकि इसमें उसे सफलता नहीं मिली थी। जून के बाद ईरान को आर्थिक नुकसान हुआ था। इसके बाद इस साल की शुरुआत में ईरान में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, जिसकी वजह से आंतरिक तौर पर भी कमजोरी आई। अब इजरायल और अमेरिका ने इसी बात का फायदा उठाया। बहाना हमेशा की तरह आतंकवाद और परमाणु बम बनाने का खतरा रहा है। हालांकि अमेरिका अब तक यह साबित नहीं कर पाया है कि ईरान ने परमाणु हथियार बनाए हैं। क्योंकि परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को ईरान ने हमेशा नागरिक हितों के उद्देश्य के लिए बताया है। लेकिन यह अमेरिका की मर्जी है कि वह किसी देश की बात सुने या न सुने। तो उसने ईरान की नहीं सुनी और उसके सुप्रीम लीडर की हत्या कर दी। ठीक वैसे ही जैसे इससे पहले अरब के कई देशों में लोकतंत्र लाने के नाम पर पहले गृहयुद्ध छिड़वाए, फिर वहां तख्तापलट किए।

लीबिया में कर्नल गद्दाफी, मिस्र में होस्नी मुबारक, सीरिया में बशर अल असद ऐसे कई शासनाध्यक्ष अच्छे थे या बुरे थे, ये तय करने का हक वहां की जनता को था। लेकिन अमेरिका ने इसमें लगातार दखल दिया और अब उन देशों का क्या हाल है, ये पूरी दुनिया देख रही है। इनसे पहले इराक में भी विनाशकारी हथियारों की तलाश के नाम पर अमेरिका ने हमला किया था और सद्दाम हुसैन को फांसी तक दे दी। हालांकि वो हथियार कभी नहीं मिले और अब इराक भी तबाह है।

ईरान को भी अमेरिका उसी राह पर धकेल रहा है। इससे पहले ताजा उदाहरण वेनेजुएला का है। जहां डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पत्नी समेत अगवा ही करवा लिया और इसके लिए उन्हीं के सुरक्षाकर्मियों को रिश्वत भी दी। अब मादुरो और उनकी पत्नी पर अमेरिका में मुकदमा चल रहा है। लेकिन इसका नतीजा क्या होगा, ये कोई नहीं बता सकता।

तो दुनिया को एकधु्रवीय बनाने के लिए अमेरिका कितनी चालें चलता रहा है, यह खुली किताब में दर्ज है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका में एक हनक और सनक तारी है कि वर्ल्ड ऑर्डर, यानी दुनिया में क्या, किस तरह से होने चाहिए यह अमेरिका ही तय करेगा और वही होने देगा, जिसमें उसका फायदा रहे। अगर उसे ऐसा लगेगा कि कोई देश उसके कहे मुताबिक नहीं चल रहा है, तो वह सीधे आक्रमण करेगा या फिर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री किसी की भी हत्या करवा देगा। इजरायल भी यही करता रहा है और यह कहने में गुरेज नहीं कि इजरायल अमेरिका के लिए एनेक्सी यानी अतिरिक्त सहायक इमारत (देश) ही है। तीसरी दुनिया के कई देश अमेरिका की इस नीति के भुक्तभोगी रहे हैं। इसलिए नेहरूजी ने जब गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत दिया तो कई देशों ने इसका स्वागत और समर्थन किया। इस वजह से दुनिया में एक संतुलन वाली व्यवस्था बनी रही। बेशक रूस और चीन भी अपनी ताकत उन कमजोर देशों पर आजमाते रहे, जिनसे उन्हें तकलीफ थी, लेकिन अमेरिका जैसी बेशर्मी इन देशों ने भी नहीं दिखाई।

मगर अब न नेहरूजी भारत का नेतृत्व कर रहे हैं, न उनके विचारों पर देश और दुनिया चल रहे हैं और न अमेरिका में लोकतंत्र का थोड़ा बहुत लिहाज रखकर चलने वाला नेता है। वहां खांटी व्यापारी डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में है, जिनके लिए हर चीज एक सौदा ही है। अफसोस इस बात का है कि भारतीय नेतृत्व भी इस समय व्यापारी मानसिकता से ही संचालित हो रहा है। जिसमें नैतिकता, मानवता, पारंपरिक नीतियां, पुरानी दोस्ती हर बात को ताक पर रखकर अमेरिका की जी हुजूरी करने को मास्टर स्ट्रोक मान लिया गया है। वर्ना क्या कारण है कि ईरान पर हमले और खामनेई की हत्या के 12-14 घंटे बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अफसोस का एक वाक्य जाहिर नहीं किया। क्या ईरान से बरसों पुरानी दोस्ती को भारत सरकार ने इतनी आसानी से खत्म कर दिया है या इजरायल और अमेरिका ने अपने ख्याली आरोपों की आड़ में जिन मासूमों को मारा, उसमें प्रधानमंत्री मोदी को कोई आपत्ति नहीं है। मोदी इस समय किस तरफ हैं, यह देश को खुलकर बताना चाहिए। ध्यान दीजिए कि ईरान पर यह हमला तब हुआ जब दो दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी इजरायल के दौरे पर थे और वहां की संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने हमेशा इजरायल का साथ देने का ऐलान किया था। उस समय ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने इजरायल में फ़िलीस्तीनियों के अधिकारों की बात उठाने की अपील की थी, लेकिन मोदी ने इस बारे में कोई बात नहीं की। व्यक्तिगत तौर पर वे चाहे जिसके मुरीद रहें, लेकिन देश का प्रधानमंत्री वैश्विक संकट के ऐसे मौके पर किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह जानने का हक जनता को है।

भारत के लिए ईरान पर मंडरा रही अस्थिरता इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि जिस तरह से डोनाल्ड ट्रंप हमारे मामले में दखल देते रहे हैं, उसमें यह संप्रभुता कब तक बरकरार रहेगी, यह सोचने वाली बात है। मई में ऑपरेशन सिंदूर के जरिए जब पाकिस्तान पर भारत निर्णायक बढ़त बना सकता था, तब ट्रंप के कहने पर ऑपरेशन रोक दिया गया। इसके बाद अनगिनत बार ट्रंप ने कहा है कि मैंने युद्ध रुकवाया। ट्रंप खुलकर पाक प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की तारीफ करते हैं। जबकि ये दोनों भारत को तबाह करने के सपने पालते हैं। कश्मीर अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच का ही मुद्दा है और इस द्विपक्षीय मुद्दे में तीसरे की दखंलदाजी भारत ने कभी मंजूर नहीं की। लेकिन पाकिस्तान के जरिए ट्रंप कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय पटल पर ले जाएंगे, और मोदी तब भी चुप ही रहेंगे, इस बात का पूरा अंदेशा है।

ईरान में मची राजनैतिक उथल-पुथल से अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है, क्योंकि भारत के लिए तेल की 50 प्रतिशत आपूर्ति यहां के होर्मुज़ जलडमरूमध्य मार्ग से होकर ही आती है। अब तेल महंगा होगा, तो महंगाई भी बढ़ेगी। इस युद्ध के जवाब में मध्यपूर्व के देशों पर ईरान ने हमले किए, जिससे वहां रह रहे करीब 93 लाख भारतीयों की जान अटकी है। इनकी सुरक्षा के लिए मोदी क्या कर रहे हैं, यह भी बताना होगा। कुल मिलाकर चुप्पी तोड़ने का वक्त है, मगर मोदी मन की बात किए जा रहे हैं।


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