हांफते-खांसते भाजपा का समर्थन
केंद्र में नरेन्द्र मोदी के बारह सालों के शासन का हासिल यह है कि सामान्य बुद्धि को ताक पर रखकर धर्म के नाम पर खुद को नुकसान पहुंचाने से भी लोग अब झिझक नहीं रहे हैं।

केंद्र में नरेन्द्र मोदी के बारह सालों के शासन का हासिल यह है कि सामान्य बुद्धि को ताक पर रखकर धर्म के नाम पर खुद को नुकसान पहुंचाने से भी लोग अब झिझक नहीं रहे हैं। चंद दिनों में दीपावली का पर्व शुरु हो रहा है। फसल कटाई के बाद का यह उत्सव अब प्रदूषण की कालिमा से घिर चुका है। बरसों से दीपावली के पहले और बाद में चिंता का एक बड़ा विषय वायु और ध्वनि प्रदूषण बन गया है। देश की राजधानी दिल्ली समेत तमाम बड़े शहरों में हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। पहले पानी इतना प्रदूषित कर दिया गया कि जल शुद्धिकरण यंत्र यानी वॉटर प्यूरीफायर अनिवार्यता बन चुके हैं। हर संपन्न, सक्षम घर में वॉटर प्यूरीफायर मिल जाएगा। जहां नहीं होगा, वहां बोतलों में बंद पानी खरीदा जाता है। गरीबों के लिए यह अब भी विलासिता की चीज है कि पानी शुद्ध करने वाली मशीन वे अपने घर में लगा सकें। उनके घरों में तो नल ही नहीं होता, तो उससे निकलने वाले पानी को शुद्ध करना तो दूर की बात है। वे अब भी नगर निगम के बनाए नलों, तालाबों या कुओं से पानी भरते हैं और कई इलाकों में दूर-दराज से पानी ढोकर लाते हैं। पानी के बाद अब अगला हमला हवा पर हुआ है।
प्रकृति के दिए अनमोल उपहारों यानी हवा और पानी पर अब अमीरों का कब्जा होता जा रहा है। हवा को बोतल में बंद करके तो अभी नहीं बेचा जा रहा, लेकिन अब एयर प्यूरीफायर खूब बिकने लगे हैं। जिन घरों में यह नहीं होते, वहां अंदर रखे पौधों से हवा को शुद्ध बनाने की कोशिश की जाती है। और इससे भी काम न बने तो फिर मास्क है ही। कोविड काल ने लोगों को मजबूरी में मास्क पहनना सिखाया, अब लोग इसे आदत की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि गरीबों के लिए यह भी एक विलासिता ही है।
भारत में पूंजीवाद का ऐसा घिनौना स्वरूप देखने मिलेगा, यह कल्पना तो पूंजीवाद के कट्टर समर्थकों ने भी नहीं की होगी। जिसमें गरीबों और असहायों से उनके जीने के मूल आधार हवा-पानी को ही उनके लिए अनुपलब्ध करा दिया जाए।
यह अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि कड़वा सच है कि देश के कई शहरों की हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। वायु गुणवत्ता इंडेक्स यानी एक्यूआई में दो सौ, तीन सौ के आंकड़े पार करना तो अब मामूली बात हो गई है, जबकि यह प्राणवायु नहीं जहरीली हवा होती है। हर साल अक्टूबर से लेकर दिसंबर-जनवरी तक यही हालात रहते हैं। दिल्ली के आसपास तो पराली जलाने को लंबे अरसे तक प्रदूषण का कारण बताया जाता रहा। पर जब पराली नहीं जलती, तब भी आकाश में धुएं और धुंध की मोटी परत दिखाई देती है। ऊपर से पटाखों को जलाने से हालात और गंभीर हो जाते हैं। प्रदूषण को देखते हुए अब कहा जाने लगा है कि दिल्ली में रहने वालों की औसत आयु में से आठ साल कम हो गए हैं। ऐसे में कायदे से समाज को ही पहल करनी चाहिए कि वह वायु शुद्ध बनाए रखने में अपना योगदान दे। लेकिन भाजपा ने इसमें भी धर्म को घुसा लिया है। मानो हिंदुत्व की माला जपने वालों को शुद्ध वायु मिलेगी और बाकी दमघोंटू माहौल में रहने को अभिशप्त रहेंगे।
नौबत ऐसी आ गई है कि पुलिस भी अब भाजपा के दबाव में दिख रही है। बीते 25 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने से नो टू क्रैकर्स, यस टू ग्रीनर दीवाली यानी पटाखों को कहें ना, हरित दिवाली को हां और जानवरों की सुरक्षा से जुड़ा एक संदेश/वीडियो पोस्ट किया था। लेकिन 4-5 घंटों के भीतर इसे सोशल मीडिया हैंडल से हटा लिया गया। यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली प्रशासन ने दिवाली के दौरान पटाखों को लेकर अपना रुख बदला है। 2024 की दीपावली से पहले, दिल्ली सरकार ने 1 जनवरी, 2025 तक सभी पटाखों को बनाने, बेचने, स्टोर करने और फोड़ने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध को ठीक से लागू न करने की आलोचना की और सुझाव दिया कि सरकार इसे स्थायी करने पर विचार करे। दिसंबर 2024 में, दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने पटाखों पर साल भर का बैन लगा दिया है। लेकिन, जल्द ही स्थिति बदल गई। अप्रैल 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध में ढील देने से मना कर दिया, लेकिन अक्टूबर में उसने दिवाली के दौरान कुछ समय के लिए दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखे बेचने और इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी। कोर्ट ने कहा कि इन पटाखों को नेशनल एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) के तय मानक को पूरा करना होगा, और सिर्फ़ तय समय के दौरान ही इनके इस्तेमाल की इजाज़त दी। दिल्ली सरकार और केंद्र ने इस ढील का समर्थन किया।
उस समय शहर का एक्यूआई लगभग 500 तक पहुंच गया, जो गैस चेंबर जैसा खतरनाक था। अब भी हालात उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इधर मुंबई में भी हवा खराब हो चुकी है। ऐसे में हाईकोर्ट और बीएमसी ने पर्यावरण के अनुकूल दीपावली मनाने की मुहिम छेड़ी और कुछ चर्चित लोगों से इसके लिए वीडियो बनवाए। दीया मिर्जा, अभिनेत्री माधुरी दीक्षित और निशिगंधा वाड, तथा क्रिकेटर अजिंक्य रहाणे इसमें शामिल थे। इसमें दीया मिर्जा की पटाखों रहित दीपावली मनाने की अपील पर विवाद खड़ा हो गया है। क्योंकि मुंबई भाजपा के प्रमुख अमित सातम को यह रास नहीं आया।
सातम ने लिखा, 'हमें दिया मिर्जा से यह सीखने की जरूरत नहीं है कि दीवाली कैसे मनानी है। हमारी परंपराएं हमारी संस्कृति में गहराई से रची-बसी हैं।Ó उनके पोस्ट के कुछ ही घंटों के भीतर म्युनिसिपल कमिश्नर अश्विनी भिड़े के नेतृत्व वाली बीएमसी ने मिर्जा का वीडियो हटा दिया। हालांकि, माधुरी दीक्षित, निशिगंधा वाड और अजिंक्य रहाणे वाले कैंपेन वीडियो नगर निकाय के एक्स और इंस्टाग्राम पेज पर बने रहे।
अब मुंबई की मेयर रितु तावड़े ने दीया मिर्जा पर कहा कि, 'हम उन्हें किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं करेंगे खासकर बीएमसी के आधिकारिक पोर्टल पर तो बिल्कुल नहीं। वह हमारे द्वारा आयोजित किसी अन्य कार्यक्रम में भी हिस्सा नहीं ले सकतीं, क्योंकि वह हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्रोल करती हैं...Ó।
हालांकि दीया मिर्जा का कहना है कि 'वायु प्रदूषण चिंता का विषय है और प्रदूषण कम करने के सभी प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि यह जनस्वास्थ्य से जुड़ा मामला है।' बीएमसी विवाद पर मिर्जा ने कहा, 'मैंने कोई पैसे नहीं लिए हैं। अब भलाई का जमाना ही नहीं रहा।'
दिल्ली और मुंबई के ये प्रसंग बताते हैं कि भाजपा हिंदुत्व की राजनीति के चलते लोगों को साफ हवा से भी वंचित रखेगी और धर्म बचाने की खातिर लोग हांफते-खांसते अगर उसका समर्थन करेंगे, तो भी कितने दिन जिंदा रहते हुए कर पाएंगे, यह सोच लेना चाहिए।


