सेवानिवृत्ति पर सुनीता विलियम्स का बड़ा संदेश
भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स इन दिनों भारत दौरे पर हैं। 22 से 25 जनवरी तक चलने वाले केरल साहित्य महोत्सव में शामिल होने के लिए सुनीता देश आई हुई हैं।

भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स इन दिनों भारत दौरे पर हैं। 22 से 25 जनवरी तक चलने वाले केरल साहित्य महोत्सव में शामिल होने के लिए सुनीता देश आई हुई हैं। 20 जनवरी को सुनीता विलियम्स ने दिल्ली के अमेरिकन सेंटर में 'आंखें सितारों पर, पैर जमीं पर' सेमिनार में हिस्सा लिया, इस दौरान उन्होंने एक अहम बात कही कि इस समय दुनिया में अंतरिक्ष को लेकर एक तरह की होड़ चल रही है। कई देश चांद और अंतरिक्ष में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। लक्ष्य सिर्फ पहले पहुंचना नहीं है, बल्कि यह है कि इंसान सुरक्षित, टिकाऊ और लंबे समय तक रहने लायक तरीके से चांद पर जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यह काम सबके फायदे, सहयोग और पारदर्शिता के साथ, लोकतांत्रिक तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि किसी एक देश का दबदबा न हो और पूरी मानवता को इसका लाभ मिले। एक अनुभवी अंतरिक्ष यात्री के तौर पर सुनीता विलियम्स की यह बात उन तमाम सरकारों और अंतरिक्ष को अपने कारोबार का हिस्सा बनाने वाले धनपशुओं को सुननी चाहिए, जिनके लिए अंतरिक्ष भी धन कमाने और दुनिया पर दबदबा बनाने का जरिया बन गया है। जबकि शोध और अनुसंधान के नाम पर इस ब्रह्मांड से खिलवाड़ का हक उन्हें नहीं है।
सुनीता विलियम्स का यह दौरा भारत के लिए खुशी का अवसर है। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां समूची मानवता को गौरवान्वित करने वाली हैं ही, देश इस बात पर और गर्व कर सकता है कि सुनीता विलियम्स की जड़ें भारत से जुड़ी हैं। खास बात ये है कि सुनीता विलियम्स ऐसे वक्त भारत आई हैं, जब नासा से उनकी सेवानिवृत्त होने की सूचना आई है। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा में 27 साल की सेवाएं देने के बाद 27 दिसंबर, 2025 को सुनीता विलियम्स सेवानिवृत्त हुई हैं। उनका अंतिम मिशन मार्च 2025 में पृथ्वी पर लौटने के साथ पूरा हुआ। इसके बाद उन्होंने यह फैसला लिया कि अब नयी पीढ़ी के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए रास्ता खोलने का समय आ गया है। सुनीता का कहना है कि अंतरिक्ष उनका 'सबसे पसंदीदा स्थानÓ रहा है, लेकिन अब चांद और मंगल की ओर बढ़ते मानव मिशनों में उनकी भूमिका एक प्रेरणा के रूप में रहेगी।
एक अंतरिक्ष यात्री के तौर पर सुनीता विलियम्स का जीवन साहस, भरोसे और वैज्ञानिक समर्पण की मिसाल है। उनका रिटायरमेंट किसी डर का नतीजा नहीं, बल्कि एक गौरवशाली अध्याय के सम्मानजनक समापन की कहानी है। यहां डर की बात इसलिए कही गई है क्योंकि डेढ़ साल पहले जून 2024 में जब महज 8 दिनों के मिशन पर सुनीता बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुईं तो 8 दिन करीब 9 महीनों तक खिंच गए। लेकिन धरती के पार अंतरिक्ष में बैठी सुनीता विलियम्स ने अद्भुत हिम्मत के साथ इस मिशन को भी पूरा किया। यह स्टारलाइनर का पहला क्रू मिशन था और इसे एक टेस्ट फ्लाइट के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन तकनीकी खराबियों के चलते मिशन तय समय पर पूरा नहीं हो सका। हालात ऐसे बने कि स्टारलाइनर बिना क्रू के वापस लौट आया और सुनीता विलियम्स को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर ही रुकना पड़ा। इस दौरान सोशल मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में 'फंस' गई हैं। अंग्रेजी वेबसाइट एनडीटीवी के साथ बातचीत में जब उनसे इस बारे में पूछा गया कि क्या उन्होंने खुद को फंसा हुआ महसूस किया, तो उन्होंने साफ कहा, 'मैं खुद ऐसा महसूस नहीं करती। मुझे प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है' हम स्पेसक्राफ्ट कैसे बनाते हैं, कैसे लॉन्च करते हैं और कैसे फैसले लेते हैं।' नासा के मुताबिक स्टारलाइनर मिशन में आई दिक्कतें भविष्य के कमर्शियल स्पेस मिशनों के लिए अहम सबक साबित हुईं। खुद सुनीता ने कहा कि वे पहले से जानती थीं कि यह एक टेस्ट फ्लाइट है और इसमें दिक्कतें आ सकती हैं। ऐसे में आईएसएस क्रू का हिस्सा बनना योजना का ही हिस्सा था।
सुनीता विलियम्स की केवल यही उपलब्धि नहीं है, बल्कि उनके नाम कई और रिकॉर्ड भी शामिल हैं। 1998 में नासा के लिए चुनी गईं सुनीता विलियम्स ने तीन स्पेस मिशन में कुल 608 दिन अंतरिक्ष में बिताए, जो किसी भी नासा अंतरिक्ष यात्री के लिए दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। उन्होंने इस दौरान 9 स्पेसवॉक किए, जिनकी कुल अवधि 62 घंटे 6 मिनट रही। यह किसी भी महिला अंतरिक्ष यात्री द्वारा किया गया सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। वे अंतरिक्ष में मैराथन दौड़ने वाली दुनिया की पहली इंसान भी बनीं हैं। इसके साथ ही सुनीता विलियम्स आईएसएस की कमांडर भी रहीं जिसका मौका बहुत कम महिलाओं को मिला है।
नासा के प्रशासक जेरेड आइज़कमैन ने सुनीता विलियम्स की सेवानिवृत्ति पर कहा कि, 'सुनीता विलियम्स इंसानी स्पेसफ्लाइट में एक अग्रदूत रही हैं। विज्ञान और तकनीकी को आगे बढ़ाने में उनके काम ने चांद पर आर्टेमिस मिशन और मंगल की ओर बढ़ने की नींव रखी है। उनकी असाधारण उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों को बड़े सपने देखने, उसकी सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।' जेरेड आइज़कमैन की ये बात शब्दश: सही है। सुनीता विलियम्स से पहले कल्पना चावला ने भी भारत का नाम रौशन किया था। वे अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं। फरवरी 2003 में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। अगर कल्पना चावला आज होतीं तो शायद वो भी ऐसे ही अनूठे रिकार्ड रचकर भारत का परचम लहरातीं। हालांकि सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला दोनों ही युवा पीढ़ी और विशेषकर लड़कियों के लिए मिसाल हैं कि हिम्मत और लगन हो तो अंतरिक्ष को छूना भी मुमकिन है।


