सोनिया की सही सलाह
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल द्वारा छेड़ा गया युद्ध अब गंभीर मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है

ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल द्वारा छेड़ा गया युद्ध अब गंभीर मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। इसमें फिलहाल तसल्ली इसी बात की नजर आ रही है कि आशंकाओं के विपरीत अब विश्वयुद्ध जैसे हालात नहीं बने हैं। नाटो देशों ने इस युद्ध से एक दूरी बनाई है, जिससे युद्ध का दायरा वैश्विक स्तर पर नहीं बढ़ रहा है। हालांकि इजरायल ने ईरान का साथ देने वाले हिज्बुल्ला पर हमला बोलने के लिए लेबनान पर ही मिसाइलें दागना शुरु किया है। जबकि लेबनान खुद हिज्बुल्ला के साथ नहीं है। मगर युद्धपिपासु नेतन्याहू अपने आक्रमणों का दायरा बढ़ाते जा रहे हैं। वहीं अमेरिका की भी कोशिश यही है कि किसी भी तरह उसे बाकी देशों का साथ मिले। फ्रांस, इटली, ब्रिटेन जैसे देश साफ कर चुके हैं कि उन्हें इस युद्ध का सहभागी बनने में कोई रुचि नहीं है। वहीं कई देश ऐसे हैं, जिन्होंने न ईरान न इजरायल और अमेरिका किसी की भी तरफ झुकाव दिखाया, लेकिन दोनों पक्षों से युद्ध रोकने की अपील की। मगर नरेन्द्र मोदी ने पहले दिन से इजरायल और अमेरिका के लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर दी। जिस पर विपक्ष ने सवाल उठाए तो भाजपा की पूरी ब्रिगेड नरेन्द्र मोदी के बचाव में उतर गई और साथ ही सोशल मीडिया की सेना भी इस काम में लगा दी गई है। ईरान में अयातुल्लाह खामेनेई के कारण महिलाओं को कितना दबाया जा रहा था, उनके अधिकारों का हनन हो रहा था, स्त्रियां सुरक्षित नहीं थीं, ऐसे तमाम आरोपों के साथ वीडियो शेयर किए जा रहे हैं। अब सवाल ये है कि क्या ईरान की महिलाओं की चिंता करने वालों ने अपने देश में मनुस्मृति को पूरी तरह भुला दिया है, जिसने स्त्री अधिकारों को हर तरह से खारिज किया है। रहा सवाल ईरानी सरकार से वहां की जनता की नाराजगी का, तो उसे बनाए रखना या सत्ता से हटाना या उसके खिलाफ आंदोलन करना या उसके फैसलों को चुपचाप बर्दाश्त करना, यह सब केवल और केवल उसी का अधिकार है। इसमें अमेरिका या इजरायल का तो कोई लेना-देना ही नहीं होना चाहिए। मगर भाजपा यही साबित कर रही है कि ईरान पर आक्रमण करना सही था।
विदेश नीति में किए गए इस आमूलचूल बदलाव पर चिंता जाहिर करते हुए कांग्रेस सांसद और संसदीय दल की अध्यक्षा सोनिया गांधी का एक आलेख मंगलवार को 'इंडियन एक्सप्रेस' में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने लिखा कि एक मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सर्वोच्च नेता की हत्या एक दिन पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए लक्षित हमलों में हुई। यह हत्या तब हुई जब वार्ताएं जारी थीं। सोनिया गांधी ने कहा कि किसी सत्तारूढ़ राष्ट्राध्यक्ष की इस तरह की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर विघटन का संकेत है। उन्होंने इस पूरे मुद्दे पर संसद में चर्चा की मांग की।
सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने न तो इस हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में अमेरिका-इजरायल के हमलों का उल्लेख किए बिना केवल ईरान की संयुक्त अरब अमीरात पर जवाबी कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने यह भी कहा कि बाद में प्रधानमंत्री ने गहरी चिंता जताई और संवाद और कूटनीति की सामान्य बात कही, जबकि हमलों से पहले यही प्रक्रिया जारी थी।
सोनिया गांधी ने अपने लेख में संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का जिक्र किया। उनके मुताबिक, बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के और कूटनीतिक प्रक्रिया के दौरान किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या करना उस भावना के विपरीत है, जो किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग पर रोक लगाती है। उन्होंने तर्क दिया कि अगर ऐसे मामलों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की ओर से सिद्धांत आधारित आपत्ति दर्ज नहीं होती, तो अंतरराष्ट्रीय मानकों का क्षरण सामान्य होता जाएगा। सोनिया गांधी ने यह भी लिखा कि जब वैश्विक दक्षिण के कई देश और ब्रिक्स साझेदार दूरी बनाए हुए थे, उस समय भारत का यह रुख गलत संदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि इससे भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
नरेन्द्र मोदी या भाजपा में उनके आज के सलाहकारों की लोकतंत्र में जरा सी भी आस्था होती तो सोनिया गांधी के इन विचारों पर गौर किया जाता। मगर अब उल्टा उन्हीं पर आक्रमण शुरु हो गए हैं। एक नेता ने कहा कि हमें विदेश नीति आपसे सीखने की जरूरत नहीं है, आप अपनी पार्टी संभालिए, जिसे लगातार हार मिल रही है। वहीं एक अन्य नेता ने याद दिलाया कि पं. नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी गुटनिरपेक्षता पर चल रहे थे और अब भी वही हो रहा है। इस तर्क के बाद तो लगता है कि या तो भाजपा को गुटनिरपेक्षता का मतलब नहीं समझता या उसने इसकी भी नयी परिभाषा गढ़ ली है।
बहरहाल, इस तरह सत्ता को खुश करने के लिए दिया जा रहा अंधा समर्थन आज भले थोड़ा फायदा इन लोगों को दे जाए, लेकिन भविष्य के भारत के लिए यह कितना खतरनाक हो सकता है, सोनिया गांधी ने यही समझाया है। भाजपा के भीतर मोदी का समर्थन करने वाले लोग इसे केवल सोनिया गांधी के विचार के तौर पर देख कर विरोध कर रहे हैं, लेकिन राजद सांसद मनोज झा ने बिल्कुल सही फरमाया है कि यह लेख कांग्रेस नहीं भारतीय दृष्टिकोण को प्रदर्शित कर रहा है। इसमें वही विचार हैं जो हमारी वसुधैव कुटुंबकम की पारंपरिक वैचारिकी के हैं। कुटुंब में सीढ़ीनुमा बंटवारा नहीं होता, एक समभाव होता है। काश नरेन्द्र मोदी भी इस बात पर गंभीरता से विचार करें। सोशल मीडिया पर लगभग रोज सुभाषितम के तहत वे वेदों, महाकाव्यों के श्लोक उद्धृत कर ज्ञान देते हैं। कम से कम उसी ज्ञान को वे आत्मसात कर लें।


