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शिक्षा पर जागरुक हुआ समाज

21 जून को नीट का पेपर दोबारा हो गया और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी इस बात का श्रेय ले सकती है कि इस बार पेपर लीक नहीं हुए

शिक्षा पर जागरुक हुआ समाज
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21 जून को नीट का पेपर दोबारा हो गया और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी इस बात का श्रेय ले सकती है कि इस बार पेपर लीक नहीं हुए। मोदी सरकार यह दावा कर सकती है कि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लिए बिना उसने फिर से पेपर करवाए और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा जैसा अहम मुद्दा बनाते हुए वायुसेना को प्रश्नपत्र पहुंचाने के काम में लगाया गया। शायद ही दुनिया के किसी और देश ने ऐसा दृश्य देखा हो, जो भारत में देखा गया कि वायुसेना के जहाजों में परीक्षा प्रश्नपत्र आए और पुलिस वाले कड़ी सुरक्षा में उन्हें केंद्रों तक ले गए। इसे जो लोग मोदी सरकार के प्रशासन की सख्ती और कड़े फैसले लेने की क्षमता समझ रहे हैं, वे एक बार यह भी सोचें कि पेपर लीक करवाने वाला माफिया कितना ताकतवर है, जिससे निपटने के लिए वायुसेना को मैदान में उतारना पड़ा। इस बात पर भी विचार कर लेना चाहिए कि आखिर ऐसे आपराधिक तत्वों की ताकत किस तरह इतनी बढ़ गई। क्या सरकार और तमाम जांच एजेंसियों का इतना भी इकबाल बाकी नहीं रहा है कि वे सड़क मार्ग से प्रश्नपत्र ले जा सकें या फिर अब यह पेपर लीक माफिया को चुनौती है कि हिम्मत है तो हवा में पेपर चुरा कर दिखाओ। खैर नीट का पेपर दोबारा हो गया और इसमें जो बच्चे बैठ पाए अब उनका भविष्य क्या होगा, यह परिणाम आने पर पता चलेगा। लेकिन 3 मई को परीक्षा में जितने बच्चे बैठे थे, उनमें से कई बच्चे इस बार परीक्षा नहीं दे पाए। रविवार को कई ऐसी तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जहां जरा सी देर होने पर बच्चों को परीक्षा केंद्र के भीतर नहीं जाने दिया गया।

कर्नाटक में कुछ छात्राएं रोती और मिन्नतें करती दिखीं कि उन्हें परीक्षा केंद्र के भीतर जाने दिया जाए, क्योंकि वे खराब यातायात व्यवस्था के कारण उन्हें देर हो गई। तो वहीं मध्यप्रदेश से एक हृदयविदारक दृश्य सामने आया, जिसमें अपनी बेटी को परीक्षा केंद्र के भीतर न जाते देख एक पिता इतना विचलित हो गए कि उन्होंने अपना सिर ही लोहे के गेट पर मार दिया और फिर तड़पते हुए सड़क पर गिर गए। एक तरफ अपने पिता की ऐसी हालत और दूसरी तरफ परीक्षा न दे पाने की तकलीफ में वो बच्ची इस तरह रोई कि किसी का भी दिल पिघल जाए। लेकिन शायद भाजपा सरकार में, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, धर्मेन्द्र प्रधान और राजनाथ सिंह के पास संवेदनशील हृदय है ही नहीं। वर्ना बच्चों की तकलीफ देखकर सांत्वना के दो बोल तो ये लोग कह ही सकते थे। लेकिन भाजपा को राजनैतिक लाभ की भाषा ही समझ आती है। इसलिए जब प्रधानमंत्री मोदी रविवार दोपहर कोलकाता से लौटकर दिल्ली पहुंचे और फिर एयरपोर्ट पर पौन घंटे रुके रहे ताकि नीट के परीक्षार्थी अपने केंद्रों तक पहुंच जाएं और यातायात प्रभावित न हो, तो इस खबर को भाजपा प्रचार तंत्र ने खूब प्रसारित करवाया। इसका मकसद यही दिखाना था कि मोदीजी को बच्चों की कितनी फिक्र है। लेकिन इस तंत्र ने कभी यह सवाल नहीं किया कि इतनी ही फिक्र थी तो बार-बार पेपर लीक की घटनाएं क्यों हुईं। मध्यप्रदेश में जो बच्चे परीक्षा नहीं दे पाए, उस पर भाजपा मौन है, लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि उसने यातायात व्यवस्था दुरुस्त नहीं करवाई। आरोप-प्रत्यारोप की ये खोखली राजनीति देश के भविष्य के साथ कितना गंभीर खिलवाड़ कर चुकी है, ये भाजपा तो नहीं समझेगी, लेकिन लोगों को समझना होगा।

जिन बच्चों को देरी की वजह से नीट देने से वंचित रह जाना पड़ा, उनके पास अगले साल फिर इसे देने का मौका होगा या उनके पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं, जिसमें वे भविष्य संवार सकते हैं। लेकिन जिन बच्चों ने दोबारा परीक्षा देने के तनाव से या पेपर लीक होने के अवसाद में अपनी जान दे दी, उनके साथ इंसाफ किस तरह होगा, यह एक बड़ा सवाल है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कम से कम 19 बच्चे अपनी जान ले चुके हैं और यह संख्या यहीं रुक जाए ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। बच्चों को लेकर यह डर इसलिए बन रहा है, क्योंकि शनिवार तक 17 बच्चों की आत्महत्या की खबर थी, लेकिन रविवार को इसमें दो का इजाफा हो गया। हमारी शिक्षा व्यवस्था ही इतनी त्रुटिपूर्ण और संवेदनहीन हैं कि बच्चों में प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही कुंठा भरनी शुरु हो जाती है। हर महीने लिए जाने वाले क्लास टेस्ट से लेकर छमाही और वार्षिक इम्तिहानों तक बच्चों पर दबाव बनाया जाता है कि अच्छे अंक लाना और प्रथम आना ही कामयाबी का एकमात्र रास्ता है, उसके अलावा जीवन में कुछ और बचा ही नहीं है। इस भावना के साथ पढ़ाई करने वाले बच्चों का मन हताशा की तरफ बढ़ने लगता है और यही हताशा बोर्ड परीक्षाओं या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने पर जीवन खत्म करने के विकल्प की तरफ धकेल देती है।

आजादी के इतने सालों में शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई किस्म के प्रयोग हुए, कई पद्धतियां अपनाई गईं, लेकिन राजनेताओं ने शिक्षा और परीक्षा की खामियों पर कभी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा करना जरूरी नहीं समझा। अब राहुल गांधी ने कोटा से इसकी शुरुआत की है। उनके भाषण में इसी बात पर जोर दिया गया कि हम बच्चों में रिजेक्शन यानी खारिज होने का डर भर देते हैं, जो गलत है। इधर कॉकरोच जनता पार्टी ने भी अब शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए जंतर-मंतर पर फिर धरना शुरु किया है। इस बार पुलिस की तय की गई समयसीमा को मानने से प्रदर्शनकारियों ने इंकार कर दिया और शनिवार से लेकर सोमवार को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक धरना जारी ही है। धरनास्थल पर खाने-पीने की व्यवस्था करने के लिए मोहम्मद जुनैद नाम के एक शख्स लगातार कर रहे हैं, सोमवार को उनके पैर छूकर अभिजित दिपके ने उन्हें शुक्रिया कहा। इस मौके पर हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आपस में हैं भाई-भाई के नारे लगे और साथ ही वंदे मातरम, इंकलाब जिंदाबाद, जय हिंद, जय लोकतंत्र की हुंकार भी भरी गई। गौरतलब है कि शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए शुरु किया गया आंदोलन सांप्रदायिक सौहार्द्र भी बढ़ा रहा है। वहीं दिपके ने इस आंदोलन से किसानों को भी जुड़ने की अपील की थी। अब भारतीय किसान यूनियन के चढ़ूनी समूह ने ऐलान किया है कि युवाओं के भविष्य और उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए भाकियू कॉकरोच जनता पार्टी का समर्थन करेगा।

मोदी सरकार और भाजपा की रणनीति के विपरीत विपक्ष और आम जनता का बड़ा वर्ग शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए साथ आ रहा है, इसे एक सकारात्मक बदलाव की तरह देखा जाना चाहिए।


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