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बेलगाम महंगाई, बेपरवाह सरकार

केंद्र सरकार के तमाम दावों के विपरीत देश में महंगाई एक भयंकर समस्या की तरह छा चुकी है और ऐसा लग रहा है कि देश गंभीर आर्थिक संकट का शिकार होने जा रहा है।

बेलगाम महंगाई, बेपरवाह सरकार
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केंद्र सरकार के तमाम दावों के विपरीत देश में महंगाई एक भयंकर समस्या की तरह छा चुकी है और ऐसा लग रहा है कि देश गंभीर आर्थिक संकट का शिकार होने जा रहा है। नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा के तमाम नेता केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों के लिए डबल इंजन सरकार का विशेषण इस्तेमाल करते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि एक इंजन जितनी क्षमता से गाड़ी खींचेगा, डबल इंजन दोगुनी ताकत लगाएगा, यानी हर चीज में रफ्तार बढ़ेगी। कायदे से इस विशेषण का सकारात्मक असर दिखना चाहिए था, लेकिन फिलहाल डबल इंजन सरकारों के दौर में महंगाई का 'डबल अटैक' यानी दोगुना वार देखा जा रहा है। पहले खुदरा महंगाई दर के बढ़ने की खबर आई और अब सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि थोक महंगाई दर भी उम्मीद से ज्यादा बढ़ गई है। मंगलवार को सरकार की ओर से जून का होलसेल प्राइस इंडेक्स (डब्ल्यूपीआई) यानी थोक महंगाई का आंकड़ा जारी किया गया, जिसके मुताबिक, थोक महंगाई जून में बढ़कर ९.८७ प्रतिशत पर जा पहुंची, जो इससे पहले मई महीने में ९.६८ प्रतिशत थी। इससे पहले सोमवार को सरकार ने खुदरा महंगाई दर का आंकड़ा जारी किया था। जिसमें पता चला कि जून में खुदरा महंगाई तेजी से बढ़ते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के तय ४ प्रतिशत के लक्ष्य के पार निकल गई है। ये लगातार छठा महीना है, जबकि महंगाई दर में बढ़ोतरी हुई है।

खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी महीने दर महीने ३.७५ प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है, जबकि जबकि गैर-खाद्य पदार्थों की कीमतों में १.४३ प्रतिशत का इजाफा हुआ। सरकार के पास इस महंगाई को सही ठहराने के तर्क भी मौजूद हैं, जो बाकायदा अर्थशास्त्रियों की जुबान से समझाए जाने लगे हैं। जैसे बताया जा रहा है कि इस बार थोक महंगाई को बढ़ाने में सबसे बड़ा हाथ खाद्य उत्पादों और गैर-खाद्य वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों का रहा है। बारिश की कमी और अल नीनो के प्रभाव के कारण फसलों को नुकसान पहुंचा है, जिससे जून में खाद्य महंगाई दर बढ़कर ५.४९ प्रतिशत पर पहुंच गई, जो मई में महज ३.६० प्रतिशत थी। इसके साथ ही, गैर-खाद्य वस्तुओं की थोक महंगाई दर भी उच्च स्तर पर यानी ११.०७ प्रतिशत दर्ज की गई। हालांकि जून में ईंधन महंगाई दर घटकर २७.४१ प्रतिशत रह गई, जो मई में ३०.३३ प्रतिशत के चरम स्तर पर थी। इसके पीछे कारण यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा हुई तो जून में वैश्विक कमोडिटी और कच्चे तेल की कीमतों को थोड़ी राहत मिली थी, जिसका असर घरेलू स्तर पर भी दिखा। लेकिन अब तो फिर जंग छिड़ गई है, लिहाजा ईंधन महंगाई दर भी अब बढ़ेगी और उस वजह से फिर सारी चीजों को महंगा करने का अच्छा बहाना मिल जाएगा।

इसलिए अभी से बताया जा रहा है कि जुलाई २०२६ में थोक महंगाई दर १० प्रतिशत के पार जा सकती है। थोक महंगाई का सीधा असर खुदरा महंगाई पर पड़ता ही है। आरबीआई ने भी चालू वित्त वर्ष के लिए अपने महंगाई अनुमान को ४.६ प्रतिशत से बढ़ाकर ५.१ प्रतिशत कर दिया है, क्योंकि ईंधन की ऊंची वैश्विक कीमतों का असर अब खुदरा पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दिखने लगा है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम है और आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ सकता है। थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर उत्पादन क्षेत्र पर बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो उत्पादक इसका बोझ ग्राहकों पर डाल देते हैं। यहीं सरकार की भूमिका अहम हो जाती है कि वह कीमतों को नियंत्रित करने के लिए शिद्दत से कोशिश करती है या नहीं।

ऐसा तो नहीं है कि महंगाई आसमान से टपकती है। वह इसी दुनिया के व्यापारियों और सरकारों के बनाए नियमों से संचालित होती है और उसमें कहां, कितना सुधार किया जा सकता है यह हरेक देश की सरकारों को सोचना होता है। बुनियादी जरूरत, सुविधाएं और विलासिता इनमें हमेशा से फर्क रहता आया है। इसी वजह से दुनिया में वर्ग विभेद कायम हुआ और बना ही रहा। भारत भी इनसे अछूता नहीं था। लेकिन पहले कम से कम रोटी, कपड़ा और मकान विलासिता की श्रेणी में नहीं आते थे। अब बढ़ती महंगाई यही असर दिखा रही है। सरकार दावा कर सकती है कि उसने गरीबों के लिए आवास योजना चलाई है, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से देश के लगभग ८० करोड़ (८१.३५ करोड़) से अधिक लोगों को हर महीने मुफ्त राशन उपलब्ध करा रही है। कोविड लॉकडाउन में शुरु हुई इस योजना की अवधि बार-बार बढ़ाई जाती रही। १ जनवरी २०२४ से योजना को अगले ५ साल यानी दिसंबर २०२८ तक के लिए बढ़ा दिया है। इस योजना का उद्देश्य देश के गरीब और जरूरतमंद परिवारों को खाद्य और पोषण सुरक्षा प्रदान करना है। लेकिन पांच किलो गेहूं या चावल से कौन से पोषण की भरपाई हो रही है और इस योजना की जमीनी हकीकत क्या है, यह सब जानते हैं। यह सही बात है कि इसमें अत्यंत गरीब लोगों को भुखमरी का डर नहीं रहा, लेकिन क्या यही हमारे विकास की परिभाषा है।

महंगाई की तुलना रामचरितमानस में वर्णित सुरसा राक्षसी से की जाती है, क्योंकि यह एकतरफा वार नहीं करती है, कहीं से, किसी भी तरह से और कितने भी विकराल रूप में आक्रमण करती है।

इसलिए महंगाई के आंकड़े जारी कर यह बताना कि इस बार थोक महंगाई इतनी बढ़ी और इसके कारण खुदरा महंगाई बढ़ गई और इन दोनों के पीछे ऐसे हालात जिम्मेदार हैं, तो केवल इतनी सूचना से सरकार की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती है। बल्कि उसकी जिम्मेदारी यहीं से शुरु होती है कि अब वो हालात सुधारने के लिए कौन से कदम उठाती है ताकि आम आदमी को तत्काल राहत मिल सके।

जब होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद होने के कारण तेल की कीमतें बढ़ाई गईं थीं और आपूर्ति पर भी संकट था, तो कुछ दिन तमाम भाजपा नेताओं की तस्वीरें आती रहीं कि फलाने ने साइकिल चलाई, ढिकाने ने मेट्रो से सफर किया, किसी ने ऑटोरिक्शा चलाया, तो किसी ने ई रिक्शा, लेकिन फोटो-वीडियो बन जाने के बाद वही ढाक के पात दिखाई दे रहे हैं। सरकारी आयोजनों में बेहिसाब खर्च सजावट पर ही कर दिया जाता है, वहां चाय-नाश्ता-खाने-पीने पर होने वाला खर्च तो छोड़ ही दें। निजी तौर पर तो नेताओं से उम्मीद नहीं की जाती कि वे किफायत का परिचय देंगे, लेकिन जनता के धन पर सरकारी काम में ऐश उड़ाने पर क्या रोक नहीं लगाई जा सकती। उस धन का कहीं और बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। ऐसे मु_ी भर उपाय भी सरकार कर ले तो अगली बार थोक और खुदरा दोनों तरह की महंगाई के आंकड़े डराएंगे नहीं।


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