पत्रकार से अभद्रता और सही जवाब
पुराने साल के बीतने और नए साल के आने के दरम्यान मध्यप्रदेश से एक अच्छी और एक बुरी खबर आई

पुराने साल के बीतने और नए साल के आने के दरम्यान मध्यप्रदेश से एक अच्छी और एक बुरी खबर आई। बुरी खबर यह कि देश के स्वच्छतम शहरों में शुमार राज्य की आर्थिक राजधानी इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी की वजह से फैले संक्रमण ने गंभीर रूप ले लिया है। पिछले लगभग एक हफ्ते से दूषित पानी से बीमार होने की खबर आ रही थी। फिर पता चला कि मुख्य जल आपूर्ति लाइन में लीकेज के कारण सीवरेज का पानी मिलने से सैकड़ों लोग उल्टी-दस्त के शिकार हो गए हैं। कम से कम 13 लोगों की तो जान ही जा चुकी है और कई अब भी अस्पताल में भर्ती हैं।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में लगातार भाजपा का शासन बना हुआ है। 2018 में कांग्रेस ने चुनाव जीता भी था, लेकिन कमलनाथ सरकार को ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद से भाजपा ने गिरवा दिया और फिर से अपनी सरकार बना ली। इंदौर के सभी 9 विधायक भाजपा से हैं, सांसद भी भाजपा के हैं, महापौर भी भाजपा के हैं और सबसे बढ़कर शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी भाजपा से ही हैं। इसके बावजूद अगर इतने लोग दूषित जल से मर जाएं, तो फिर नैतिकता यही कहती है कि जिम्मेदार लोगों को फौरन इस्तीफे की पेशकश कर देनी चाहिए। लेकिन मोदीजी के नए भारत में इस्तीफे नहीं होते, ये बात तो खुद राजनाथ सिंह कह चुके हैं।
इस नए भारत में जनप्रतिनिधि मीडिया को सवाल पूछने का हक भी नहीं देते हैं, यह बात भी अब मोदी सरकार को और भाजपा को आधिकारिक तौर पर कह देनी चाहिए। क्योंकि लगातार ऐसे प्रकरण हो रहे हैं जिसमें सवाल पूछने वाले पत्रकार से बदसलूकी हो रही है। तो इस बुरी खबर के बीच अच्छी खबर ये है कि भाजपा भले ही सवाल पूछने का हक न दे, लेकिन देश में अभी कुछ पत्रकार बचे हैं जो न केवल सवाल पूछ रहे हैं, बल्कि मंत्री की तरफ से गलत भाषा के इस्तेमाल पर खुल कर विरोध भी कर रहे हैं।
दरअसल कैलाश विजयवर्गीय से एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने दूषित जल प्रकरण पर सवाल किए तो उन्होंने झल्लाते हुए कहा कि फोकट के प्रश्न मत पूछो, श्री द्वारी इस पर भी नहीं रुके और उन्होंने प्रतिवाद किया, साथ ही कहा कि मैं वहां होकर आया हूं, तो उन्होंने कहा कि क्या घंटा होकर आए हो। इस निम्नस्तरीय भाषा पर अनुराग द्वारी ने कैलाश विजयवर्गीय को सीधे-सीधे भाषा की तमीज का पाठ पढ़ा दिया और कहा कि वो अपना काम कर रहे हैं, हालांकि इसके बाद भी श्री विजयवर्गीय के साथ के लोगों ने अनुराग द्वारी को ही रोकने की कोशिश की कि हमारे नेता हैं, उनसे ऐसी बात नहीं की जा सकती।
दरअसल मोदी-शाह के युग की भाजपा के कई नेताओं को यह खुशफहमी है कि उनसे सवाल नहीं किया जा सकता, या उनकी सरकार की खामियों पर टोका नहीं जा सकता। पूर्व सांसद स्मृति ईरानी ने अमेठी में एक पत्रकार को डपटते हुए कहा था कि मैं आपके मालिक से बात करूंगी। ये सीधे-सीधे पत्रकार को धमकी ही थी और इसमें जितनी गलती नेता की है, उतनी ही गलती उन मीडिया मालिकान की भी है, जो सत्ता से नजदीकी बढ़ाकर अपने लिए वित्तीय, सियासी या अन्य किस्मों के लाभ लेते हैं और बदले में आदर्शों को गिरवी रख देते हैं। मीडिया घरानों ने जिस तरह सत्ता के चरणों में खुद को झुका दिया है, उसी का नतीजा है कि अब पत्रकारों के सवालों का जवाब देना तो दूर उनसे शिष्टाचार से बातें भी नहीं की जातीं। अभी दो दिन पहले प.बंगाल में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक पत्रकार से कहा कि तुम बंगाल की चिंता करो, हमारी पार्टी की चिंता मत करो। जबकि उन पत्रकार ने केवल यही पूछा था कि 75 साल में मार्गदर्शक मंडल में भेजने का नियम अभी के नेताओं पर भी लागू होगा। पत्रकार ने इशारों में नरेन्द्र मोदी के रिटायरमेंट की बात छेड़ी थी, जिस पर अमित शाह बिफर पड़े। वे चाहते तो सीधे-सीधे इसका जवाब दे सकते थे। लेकिन सत्ता की हनक ही इतनी है कि वे हर किसी को अपने से निम्नतर समझने लगे हैं। पत्रकार उनकी पार्टी का कार्यकर्ता नहीं है कि उससे तुम कहकर बात की जाए, लेकिन अमित शाह और कैलाश विजयवर्गीय दोनों ने यही किया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि लगातार हो रहा है, जिससे देश में मीडिया की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा दोनों पर आंच आई है।
लेकिन इस दौर में जब अनुराग द्वारी जैसे लोग संयमित तरीके से अपना विरोध दर्ज कराते हुए पत्रकारिता के मापदंडों को ऊंचा उठाए रखते हैं, तो फिर उम्मीद जागती है कि मीडिया को पूरी तरह गुलाम होने से बचाया जा सकता है।
रहा सवाल मध्यप्रदेश के इंदौर वाटरगेट का, तो इसमें फिलहाल सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे का ऐलान किया है। एक सोशल मीडिया पोस्ट में कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि, 'मैं और मेरी टीम पिछले दो दिनों से बिना सोए प्रभावित क्षेत्र में लगातार स्थिति सुधारने में जुटी हुई है। दूषित पानी से मेरे लोग पीड़ित हैं और कुछ हमें छोड़कर चले गए, इस गहरे दुख की अवस्था में मीडिया के एक प्रश्न पर मेरे शब्द गलत निकल गए। इसके लिए मैं खेद प्रकट करता हूं। लेकिन जब तक मेरे लोग पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ नहीं हो जाते, मैं शांत नहीं बैठूंगा।
पहली बात तो यह कि अपने ही शहर और क्षेत्र में काम करने पर यह गिनाने की बात नहीं है कि आप कितने दिन से नहीं सोए। क्योंकि अभी तक शायद सरकार और प्रशासन नींद में ही थे जो इतनी जानलेवा चूक हुई। इससे पहले कफ सिरप कांड में भी कई मासूमों की मौत हो गई और तब भी सरकार की तरफ से अफसोस और मुआवजे से आगे बात नहीं बढ़ पाई। दूसरी बात यह कि गलत शब्द निकलने पर खेद प्रकट करना तो ठीक है, लेकिन क्या कैलाश विजयवर्गीय या अमित शाह या अन्य भाजपा नेता इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि आईंदा किसी पत्रकार के सवाल पर बदसलूकी नहीं होगी।


