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खाड़ी देशों में फूट

यूएई का ओपेक छोड़ने का यह फै़सला लगभग 59 साल बाद आया है और इसे सऊदी अरब के नेतृत्व वाले तेल कार्टेल ओपेक के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

खाड़ी देशों में फूट
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प.एशिया में चल रहे तनाव के कारण जो ऊर्जा संकट कायम हुआ है, उसमें पहले ही दुनिया की सांसें अटकी हुई हैं और इस बीच संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई ने मंगलवार को घोषणा की है कि वह 1 मई से ओपेक यानी ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ और उसके व्यापक ओपेक+ समूह से अलग हो जाएगा। जानकारी के लिए बता दें कि ओपेक मुख्य रूप से खाड़ी के तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन है, जिसने कई दशकों तक उत्पादन घटा-बढ़ाकर और कोटा तय करके वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की क़ीमतों को नियंत्रित किया है। ओपेक की स्थापना 1960 में पांच देशों ईरान, इराक़, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने मिलकर की थी, ताकि उत्पादन का तालमेल बैठाकर तेल निर्यातकों के हितों की रक्षा की जा सके और सदस्यों के लिए स्थिर आय सुनिश्चित हो। लेकिन वक्त के साथ इसके सदस्य देश बढ़े और अब ओपेक प्लस में ऐसे देश भी शामिल हैं जो ओपेक के सदस्य नहीं हैं।

यूएई का ओपेक छोड़ने का यह फै़सला लगभग 59 साल बाद आया है और इसे सऊदी अरब के नेतृत्व वाले तेल कार्टेल ओपेक के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। यूएई के ऊर्जा मंत्रालय ने कहा, 'यह फैसला हमारे देश की लंबी अवधि की रणनीतिक और आर्थिक नजरिए को लेकर है। हम अब अपनी ऊर्जा क्षमता को और बढ़ा रहे हैं और घरेलू ऊर्जा उत्पादन में तेजी से निवेश कर रहे हैं। हम वैश्विक ऊर्जा बाजार में जिम्मेदार, भरोसेमंद और भविष्य की ओर देखने वाली भूमिका निभाते रहेंगे।Ó यूएई ने यह भी कहा कि बाहर निकलने के बाद भी वह जिम्मेदारी से काम करेगा और बाजार की मांग के अनुसार धीरे-धीरे अतिरिक्त तेल उत्पादन बढ़ाएगा।

दरअसल, यूएई ने अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है। लेकिन, वह ओपेक के लगाए गए उत्पादन में कटौती के प्रतिबंध के कारण अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है। इससे उसकी राजस्व क्षमता घट रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, यूएई लगभग 2.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल का उत्पादन करता है। जबकि उसकी वर्तमान क्षमता 4.85 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक है। अब उसका लक्ष्य 2027 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का है। ऐसे में ओपेक से बाहर निकलने के बाद, यूएई अब बिना किसी कोटा प्रतिबंध के अपनी इस पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा।

ऊपरी तौर पर यही समझ आ रहा है कि यूएई लंबे समय से ओपेक के उत्पादन प्रतिबंधों से परेशान था, इसलिए उसने संगठन छोड़ने का फैसला किया। हालांकि इस फैसले के पीछे सऊदी अरब के साथ बढ़ते विवाद प्रमुख कारण लग रहे हैं। यूएई और सऊदी अरब, ये दोनों देश कई मोर्चों पर आमने-सामने हैं। ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। यूएई ने पाक-सऊदी अरब गठबंधन के खिलाफ अपना विरोध खुलकर दिखा दिया है। यूएई इसलिए नाराज़ है कि हालिया संघर्ष में ईरान ने यूएई पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। यूएई के मुताबिक, उसके एयर डिफेंस ने सैकड़ों मिसाइलें और हजारों ड्रोन रोकें। लेकिन जीसीसी यानी खाड़ी सहयोग परिषद के दूसरे देशों से खास समर्थन नहीं मिला। यूएई ने पाकिस्तान से ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने को कहा, लेकिन पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इससे यूएई नाराज हो गया। यूएई ने जब पाकिस्तान से साढ़े तीन अरब डॉलर का कर्ज समय से पहले वापस मांगा तो उधर सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज दिया और और 5 अरब डॉलर की मदद का वादा किया। इसके अलावा सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने रक्षा समझौता किया, जिसमें पाकिस्तान सऊदी की सुरक्षा में मदद कर सकता है। पाकिस्तान के पास इस्लामी देशों में एकमात्र परमाणु हथियार हैं। ऐसे में यूएई को इस बढ़ते गठबंधन से असुविधा हो रही है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि यूएई भारत के साथ अच्छे संबंध रखता है, जबकि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक नया गठबंधन बनता दिख रहा है।

इसके अलावा दोनों देशों में यमन और सूडान में सैन्य टकराव और क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर होड़ है। सऊदी अरब ने यूएई पर अपनी सुरक्षा को गंभीर खतरा पहुंचाने का भी आरोप लगाया है। इससे आशंका जताई जा रही है कि दुनिया में तेल को लेकर संकट और ज्यादा गंभीर हो सकता है, जिसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। वैसे यूएई के इस फैसले को खाड़ी देशों में फूट के तौर पर भी देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सऊदी अरब के नेतृत्व से कुछ हद तक स्वतंत्रता दिखाने का भी संकेत है।

ध्यान रहे कि यूएई जब एक देश के तौर पर अस्तित्व में नहीं आया था, तब से वह ओपेक का सदस्य रहा है, पहले 1967 में अपने अमीरात अबू धाबी के माध्यम से और बाद में जब संयुक्त अरब अमीरात 1971 में एक स्वतंत्र देश बन गया, तब भी वह ओपेक का सदस्य रहा। इसलिए अब उसके अलग होने को भू राजनैतिक में बदलाव की एक बड़ी घटना की तरह देखा जा रहा है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे।

फिलहाल आशंका बढ़ रही है कि ओपेक से अलग होने के बाद जब यूएई अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाएगा तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों पर नए किस्म की जंग छिड़ेगी, जिसमें सऊदी अरब भी जवाब देने उतर जाएगा। बड़े देश तो इस संकट से पार पा जाएंगे, लेकिन दुनिया के अविकसित और विकासशील देशों के साथ-साथ ओपेक के ग़रीब सदस्यों को भी इसमें तकलीफ होगी। अब देखना होगा कि सऊदी अरब और अन्य सदस्य देश इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। जहां तक भारत का सवाल है तो कम से कम इस बार भारत को अमेरिका की तरफ से इशारा मिलने का इंतजार किए बिना अपने स्तर पर आकलन करके प्रतिक्रिया देनी चाहिए। सऊदी अरब ने खुलकर अमेरिका और पाकिस्तान दोनों के लिए अपने झुकाव का इजहार किया है, यूएई ने इस माहौल में नए समीकरण बनाने की कोशिश की है। गुटनिरपेक्ष भारत ने हमेशा ऐसे हालात में संतुलन बनाए रखा ताकि न वैश्विक मोर्चे पर, न घरेलू स्तर पर उसे परेशानियां उठानी पड़ें। खाड़ी देशों में फूट उनके अपने हित में नहीं है, और भारत के लिए भी सही नहीं है, क्योंकि अमेरिका या चीन जैसी ताकतें ऐसे ही मौकों की तलाश में रहती हैं। लिहाजा यहां भारत किसी तरह से संतुलन साधने में काम आ सके, तो सरकार को विचार करना चाहिए।


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